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दिल्ली बचाओ - दिल्ली बची तो सब कुछ बचेगा

Bhola Tiwari Jul 05, 2020, 6:50 AM IST कॉलमलिस्ट
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राकेश दुबे

(वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार एवं मीडिया विशेषज्ञ)

मुंबई : हमेशा से दिल्ली की किस्मत में राजनीति रही है, फिर वह कोरोना काल के पहले की दिल्ली हो या कोरोना काल की या कोरोना काल के बाद की दिल्ली होगी। दुनिया भर में फैली महामारी का असर दिल्ली में बखूबी दिखने लगा है। पिछले तीन-चार दिनों से महामारी के संक्रमण से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है और दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का दावा है कि दिल्ली में कोरोना संक्रमण अब सामूहिक रूप से फैल चुका है। दिल्ली  की जनता राजनेताओं के जाल में चकरघिन्नी बन गई है। पॉलिटिक्स में दिल्ली फंस गई है। दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश और दिल्ली से ही सटा है पंजाब और  हरियाणा। इन तीनों में 2 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो एक में कांग्रेस की। अब सवाल उठता है कि इन राज्यों से लोग दिल्ली में इलाज कराने आएंगे तो क्या उन राज्यों में चिकित्सा की सुचारु व्यवस्था नहीं है? कोरोना अभी फरवरी-मार्च में दिखा। उसके पहले से ही पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बीजेपी की। ये सरकारें  प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था की सुविधाएं क्या अपने प्रदेश में बना पाई अब उजागर हो गया।  दिल्ली के अंदर इलाज कराने के लिए बाहरी लोगों का आना यह साबित करता है कि इन राज्यों में चिकित्सा व्यवस्था की समुचित व्यवस्था नहीं है। जिसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों के ऊपर है। अब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दोष देने की बजाय सरकारों को अपनी गलती माननी चाहिए। फिर चाहे वह बीजेपी हो या कांग्रेस। 

दिल्ली से सटे यह तीनों राज्य संपन्न हैं। उत्तर प्रदेश का नोएडा, गाजियाबाद यूपी सरकार को राजस्व देने वालों में प्रमुख हैं, तो हरियाणा का गुड़गांव हरियाणा के राजस्व का मुख्य स्रोत माना जाता है। फिर ऐसी क्या मजबूरी है? दिल्ली में दिल्ली वालों के इलाज के अलावा बाहरी का इलाज होगा? अब जब दिल्ली में कोरोना का संक्रमण जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए अंदाज लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में दिल्ली की हालत क्या होगी? दिल्ली हमेशा राजनेताओं की चौसर पर मात खाती रही है। मुगल काल से लेकर मोदी काल तक दिल्ली हमेशा ठगी गई। दिल्ली में जब बाहरी आकर अस्पतालों में इलाज करवाएंगे तो दिल्ली वाले कहां जाएंगे? इसका जवाब ना तो भाजपा के पास है न कांग्रेस के पास। ये दिल्ली सरकार की नाकामियों को गिनाने में लगे हैं। यह अरविंद केजरीवाल की वकालत नहीं है कड़वी बात है, वह सच्चाई है जिसे लोग देख तो रहे हैं लेकिन कह नहीं रहे। दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों को केजरीवाल ने फटकारा तो वे केजरीवाल के खिलाफ हो गए। आखिर केजरीवाल ने कुछ गलत नहीं कहा था। एक मुख्यमंत्री को जो कहना चाहिए था वही बात केजरीवाल ने कही।

दिल्ली में  उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच तू - तू मैं - मैं तो हमेशा से चलती आ रही है। अब वह  कोरोना काल में भी जारी है। जिसका खामियाजा दिल्ली की जनता को भुगतना पड़ेगा। दिल्ली में कोरोना का प्रभाव बढ़ेगा तो दिल्ली की आम जनता के साथ-साथ खास लोग भी प्रभावित होंगे, क्योंकि यह कोरोना है जो अमीरी - गरीबी में भेद नहीं करता। यह साधारण व्यक्ति और राजनेता को नहीं देखता। इसकी चपेट में जो आया सबको लपेट लेता है। इसलिए दिल्ली को बचाओ, दिल्ली बचाना जरूरी है। दिल्ली बचेगी तो हिंदुस्तान का दिल तंदुरुस्त रहेगा। दिल्ली बचेगी तो हिंदुस्तान की शान और तिरंगे का मान मजबूत होगा। कोरोना के संकट में सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्षी दलों से कम से कम यही उम्मीद की जा सकती है कि एक साथ मिलकर दिल्ली बचाओ। अगर दिल्ली रही तो तुम भी रहोगे, दिल्ली नहीं रही तो तुम कहां जाओगे। दिल्ली की गलियों में कोरोना फैलने से रुकेगा तो ही दिल्ली के विधानसभा का रास्ता आसान होगा। दिल्ली में कोरोना वायरस संक्रमण कम होगा तो संसद जाने वाली सड़कों पर भी आसानी होगी। सुप्रीम कोर्ट जाने वाली सड़कों पर भी आसानी होगी और राष्ट्रपति भवन की ओर जाने वाली सड़कों पर भी आसानी होगी, करोल बाग और सफदरगंज में, कनॉट प्लेस में,पहाड़गंज में, बसंत कुंज में कोरोना अगर नियंत्रित रहेगा, दस जनपथ और लोधी रोड में कोरोना संक्रमण नियंत्रित रहेगा, तो सब कुछ आसान होगा। 

दुनिया में जब अमेरिका कोरोना के संक्रमण को नियंत्रित करने में नाक रगड़ रहा है तो फिर दिल्ली के लिए सोचना पड़ेगा। वाशिंगटन और दिल्ली में अंतर है। लोगों के रहन-सहन में अंतर है, खानपान में अंतर है, समानता है तो आज दोनों जगह कोरोना का होना। दिल्ली को वाशिंगटन बनने से बचाना है। दिल्ली से सटे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने राज्यों में इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। अगर वह नहीं कर पाए तो इसकी जिम्मेदारी लें। हम नाकाम हैं दिल्ली के भरोसे ना रहे। घर में जब आग लगती है तो लोग पहले अपना घर बचाते हैं, पड़ोसी के घर पर पानी बाद में डालते हैं। दिल्ली में दिल्ली वालों का इलाज होगा तो एलजी ने सीएम का फैसला पलट क्यों दिया? उनका मकसद क्या है? दिल्ली में तमिलनाडु भी बसता है, केरल भी बसता है,अरुणाचल प्रदेश, असम और कोलकाता भी बसता है, यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश भी बसता है। दिल्ली में हिंदुस्तान के हर राज्य के लोग बसते हैं। लेकिन आज दिल्ली में आग लगी है। इस आग को नियंत्रित करना है तो उसके लिए पहले अपने घर को सुरक्षित करना होगा। दिल्ली सुरक्षित रहेगी तो देश के तमाम प्रमुख संस्थानों के मुख्यालय सुरक्षित रहेंगे। देश की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। यह बातें बहुत गंभीर हैं। देश के भाग्य विधाताओं को आने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी रोककर दिल्ली की सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए। जब दिल्ली में केसेस कम थे तो लॉक डाउन था और जब दिल्ली में कोरोना संक्रमण प्रतिदिन हजारों के औसत से आ रहा है तो अनलॉक है। सीएम केजरीवाल ने पहले दारू की दुकानें खोली, तो छुपा कोरोना सड़कों पर लाइन में लगे दिल्लीवालों पर हाबी हुआ। जिसका परिणाम अब दिख रहा है। अब तो पूरी दिल्ली खुली है। फिर ऐसा क्या है? सरकार क्या चाहती है? महीना डेढ़ महीना दिल्ली में लॉकडाउन और रहता तो ना तो दिल्ली के ऊपर कोई असर पड़ता न दिल्ली वालों के ऊपर। असर पड़ता तो कोरोना के वॉर पर। इण्डिया फाइट कोरोना का नारा बुलंद करने से कोरोना का असर कम नहीं होने वाला। आने वाले दिन बरसात के हैं। बरसात में तो संक्रमण वैसे भी आसानी से फैलता है। एम्स के डायरेक्टर गुलेरिया साहब, पद्मश्री  अवार्डी डॉक्टर केके अग्रवाल के मुताबिक अब से डेढ़ महीने कोरोना संक्रमण के लिए बेहद अहम हैं। जब कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या दिल्ली में सौ डेढ़ सौ में थी, तब लॉकडाउन था, जब संक्रमितों की संख्या हजारों में आ रही है तो अनलॉक है। ना तो मुख्यमंत्री का मकसद समझ में आ रहा है और ना ही गृह मंत्रालय का। इस मसले पर केंद्र सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है। राष्ट्रपति महोदय का हस्तक्षेप जरूरी है। अब जरूरी है सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली की स्थिति पर फैसला लेने का। दिल्ली को बचाओ। हिंदुस्तान का दिल है दिल्ली।  प्राइम मिनिस्टर के जनता कर्फ्यू के आवाहन से लेकर लॉकडाउन के अंतिम चरण तक दिल्ली में अनुशासन बना रहा, जिसका असर भी दिखा। कोरोना का संक्रमण तब नियंत्रित था। अनलॉक होते ही कोरोना का संक्रमण तेजी से फैलता है। केंद्र सरकार के नीति निर्धारण करने वाले और राज्य सरकार की नीति निर्धारण करने वाले लोगों को अब इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। राजस्व के लिए दारू की लाइन में खड़ा कर दिया देश की जनता को। महात्मा गांधी के सपने को चकनाचूर कर दिया। गुजरात में दारू नहीं बिकती है तो क्या वहां राजस्व कम है। दारू की दुकानों को खोलने का तो बहाना था और अब मंदिर खोले गए, मॉल खोले गए हैं, पहले गो कोरोना गो कोरोना तो अब कम कोरोना कम कोरोना हो रहा है। इसलिए दिल्ली को बचाओ। ऐसा कुछ मुश्किल भी नहीं है कि दिल्ली में घर-घर कोरोना की जांच न हो सके बस सरकारों को मन बनाना होगा। 15 दिन फिर से दिल्ली को लॉकडाउन करो, घर-घर कोरोना की जांच करो। दिल्ली बचाओ सरकारों।

आखिर कैसे बचेगी दिल्ली कोरोना संक्रमण के प्रकोप से? कोविड - 19 महामारी से दिल्ली और दिल्ली वालों का बुरा हाल है। अनलॉक – 1 और 2 के बाद से दिल्ली में पॉजिटिव मामले तेजी से बढ़े हैं और दिन प्रतिदिन इनमें हजारों का इजाफा हो रहा है। जिसके चलते इस पर काबू पा लेना अब दिल्ली सरकार के वश की बात नहीं रही। यहां के लोग बुरी तरह परेशान हैं। 

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बीमार होकर और स्वास्थ्य मंत्री कोरोना से लड़कर वापस आ चुके हैं। कोरोना जैसी गंभीर और लाइलाज बीमारी के चलते आज पूरी दुनिया त्रस्त है। कोरोना से अब तक लाखों लोगों की जान जा चुकी है। भारत में भी मरने वालों की संख्या में दिन ब दिन इजाफा हो रहा है। मगर हमारे देश में बीमारी पर राजनीति हो रही है। दिल्ली की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब की सरकारें अपने राज्य के कोरोना मरीजों की देखभाल अपने ही राज्य में क्यों नहीं कर रही हैं? यदि उनके पास अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, तो यह उनकी अपनी निजी समस्या है। उन्हें अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं का इंतजाम करना चाहिए। गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा, गुरुग्राम के लोग दिल्ली के अस्पतालों में ही इलाज क्यों कराना चाहते हैं? इसलिए कि दिल्ली देश की राजधानी है और वहां के अस्पतालों में इलाज की अच्छी और अत्याधुनिक व्यवस्था है। ऐसे में कहां जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार, हरियाणा की मनोहरलाल खट्टर सरकार और पंजाब की अमरिंदर सिंह सरकारें अपने – अपने राज्यों में स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में फिसड्डी हैं? इतने समय में वे इलाज के अत्याधुनिक अस्पताल और बेहतर संसाधन क्यों नहीं जुटा पाईं? आखिर ये सरकारें यहां के शहरों के राजस्व का उपयोग करती हैं। दिल्ली सरकार को पड़ोसी राज्यों के राजस्व का कोई हिस्सा नहीं मिलता। जब गाजियाबाद, फरीदाबाद, नोएडा और गुरुग्राम के राजस्व का कोई हिस्सा दिल्ली सरकार को नहीं मिलता, तो इन शहरों की सरकारें ऐसे में अपने लोगों का खयाल क्यों नहीं रख रही हैं? कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए प्रत्येक सरकार को संयम और सूझबूझ से काम करना होगा। ताकि किसी और राज्य या केंद्र शासित प्रदेश पर उनकी अपनी जिम्मेदारियों का बोझ न पड़े। अन्यथा स्थिति और जटिल होती जाएगी और इन सब में पिसना पड़ेगा जनता बेचारी को।

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन चिल्ला – चिल्ला कर कह रहे हैं कि दिल्ली में कोरोना का कम्युनिटी स्प्रैड हो चुका है। कोरोना मरीजों की संख्या हर दिन हजारों में बढ़ रही है। तो दूसरी ओर उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया 31 जुलाई तक दिल्ली में करीब साढ़े पांच लाख कोरोना के पॉजिटिव मामले होने की बात कर रहे हैं और ऐसे समय में उनकी सरकार को 80 हजार बेड की आवश्यकता होगी। ऐसे में दिल्ली से बाहर से आने वाले मरीज का इलाज कैसे हो सकेगा? जाने माने हृदय रोग विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. के के अग्रवाल भी बार – बार यह चेतावनी दे रहे हैं कि जुलाई महीने में भारत में कोरोना संक्रमण अपनी पीक (चरम) पर होगा। पर इन सब की बात मानता कौन है? कोई इनकी बातें सुनने को तैयार भी नहीं। आखिर क्यों इन लोगों की बातों को अनसुना किया जा रहा है? उनकी बातों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा है?  

इस विषय पर केंद्र सरकार की चुप्पी कोरोना जैसी गंभीर महामारी की समस्या का कोई समाधान नहीं है। केंद्र सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि स्थिति बिगड़ न जाए। उसे बिगड़ने से पहले सुधारा जा सके। पर केंद्र सरकार के पास समय कहां है? उसके मंत्री कुछ राज्यों के आगामी चुनाव के लिए वर्च्युअल रैलियां कराने में व्यस्त हैं। संकट के ऐसे समय में चुनाव जरूरी हैं या देश की जनता की हिफाजत? यह एक यक्ष प्रश्न है? जिसका जवाब शायद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पास भी नहीं है। राज्यों के चुनाव बाद में भी कराए जा सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब कह चुके हैं कि जान है तो जहान है, तो फिर वे देश की जनता की जान की परवाह क्यों नहीं कर रहे हैं? उनकी सरकार को दिल्ली की समस्या का हल जल्द से जल्द ढ़ूंढ़ना चाहिए, ताकि समय रहते इस मुद्दे पर कोई निर्णय हो सके अन्यथा स्थितियां बहुत ही भयावह और विस्फोटक हो सकती हैं।     

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