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क्या रोक सकेंगे चीनी माल

Bhola Tiwari Jul 04, 2020, 7:10 AM IST टॉप न्यूज़
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भरत झुनझुनवाला

नई दिल्ली : देश में मुहिम चल रही है कि देशवासी चीन का माल न खरीदें। बात सही है। अगर हम चीनी माल ख़रीदते रहते हैं तो हमारी अर्थव्यवस्था कमजोर और चीन की सुदृढ़ होती है। और आने वाले समय में चीन हम पर हावी हो सकता है। आज कोरोना संकट के चलते चीन की भूमिका को लेकर पूरे विश्व में आक्रोश है। इसलिए भारत को दूसरे देशों के साथ मिलकर चीन को अलग-थलग करने की कोशिश और आर्थिक दृष्टि से कमजोर बनाना चाहिए।

लेकिन यह काम कठिन होगा। अन्य देशों की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था फ़िलहाल बहुत मजबूत है। वहां कोरोना के नए रोगी न के बराबर मिल रहे हैं। अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह से खुल चुकी है। विश्व बाज़ार को आज कोई माल चाहिए तो शायद सिर्फ चीन उसकी आपूर्ति करने में समर्थ है। ऐसे में हमें सोचना होगा कि हम कमजोर और चीन मजबूत कैसे हुआ?

आज सम्पूर्ण विश्व एक बाजार है। अपने देश में कच्चे माल और तैयार माल के दाम वैश्विक बाजार से तय होते हैं। जैसे- चमड़े और फुटबॉल दोनों की क़ीमत विश्व बाजार से ही तय होती है, जो कि चीन और भारत के लिए बराबर है। फिर भी चीन सस्ता फुटबॉल बना रहा है और हम महंगा।


अपने देश में पुलिस, न्यायालय, शिक्षा, श्रम कानून और सरकारी भ्रष्टाचार के कारण उद्योग की उत्पादन लागत आधिक हो जाती है। इसलिए चीन का माल सस्ता पड़ता है। भारत में वेतन कम हैं। फिर तो हमारी उत्पादन लागत कम रहनी चाहिए। लेकिन हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इतनी लचर और भ्रष्ट है कि हर क़दम पर उद्यमी पर संकट है।

चीन में व्यापार करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि भ्रष्टाचार वहां भी है, लेकिन उसका रूप अलग है। उन्होंने एक उदाहरण भी दिया। बताया कि चीन में किसी फैक्ट्री की ज़मीन हाईवे बनाने के लिए ख़रीदी जानी थी। हाईवे के अधिकारी उस उद्यमी के पास पहुंचे, जिससे ज़मीन ली जानी थी। उन्होंने उनसे पूछा कि आपको फैक्ट्री यहां से कहीं और ले जाने में कितना खर्चा आएगा?

मान लीजिए, उन्होंने कहा 10 करोड़ युआन। इस पर अधिकारियों ने कहा कि ये लीजिये 12 करोड़ युआन का चेक। 10 करोड़ आपका और 2 करोड़ हमें घूस दे दीजिए। लेकिन आपको तीन महीने के अंदर यहां से हटना होगा। उद्यमी प्रसन्न था क्योंकि उसे मुंहमांगी क़ीमत यानी 10 करोड़ युआन मिले। अधिकारी भी खुश। 2 करोड़ युआन की घूस जो मिली। अर्थव्यवस्था भी प्रसन्न थी, क्योंकि हाईवे समय से बन गया।

अपने यहां ऐसे हालात बने तो हमारे राजस्व अधिकारी पहले ज़मीन ख़रीदने का नोटिस देंगे। घूस लेकर कुछ ज़मीन छोड़ भी देंगे। फिर बाकी ज़मीन ख़रीदने की प्रक्रिया चलेगी, जिसमें न्यायपालिका घूस लेगी। फिर चेक देने के लिए घूस ली जाएगी। अंत में हमारे यहां भी उस ज़मीन की लागत वही, लगभग 12 करोड़ रुपये हो जाएगी।

अंतर यह होगा कि चीन में वह काम तीन महीने में और 2 करोड़ युआन की घूस से पूरा हो गया, जबकि अपने देश में उसी में 10 साल और 7 करोड़ युआन के बराबर की घूस लग गई।

हमारे विद्वान अर्थशास्त्रियों ने इस मुश्किल का रास्ता निकाला कि भारत को विश्व व्यापार के लिए खोल दो। हम तो अपने देश को चला नहीं सकते, चूंकि नौकरशाही का हित सर्वोच्च है। इसलिए विदेशियों का सहारा ले लो। जैसे गृहिणी बासी भोजन परोसे तो रेस्तरां से भोजन मंगा लो।

चीन का सस्ता माल देश में आएगा तो हमारे मध्यमवर्गीय ग्राहकों को कम दाम में सामान मिलेगा। उनमें आक्रोश नहीं पनपेगा। और भारत का उद्यमी निवेश नहीं करेगा, इसलिए हम विदेशी निवेशकों को आकर्षित करेंगे। लेकिन विदेशी निवेश आने के बजाय देश से पूंजी बाहर जाने लगी है।

सरकारी आंकड़े कहते हैं, पिछले साल अपने देश में 49 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया। अगर सच में यह रकम आती तो विकास दर चल निकलती। लेकिन इस आंकड़े में अपनी पूंजी के पलायन को छुपा दिया गया है।

हमारी पूंजी के बाहर जाने का पहला रास्ता हवाला है। और विदेशी निवेश के नाम से आने वाली रकम में एक बड़ा हिस्सा वह है जो भारतीय उद्यमियों ने इस रास्ते से मॉरीशस या अन्य देशों को भेजा। फिर उसे वापस विदेशी निवेश के रूप में ले आए। ऐसा करने पर उन्हें उस रकम पर टैक्स नहीं देना पड़ा। जैसे, आपने भारत में 5 करोड़ रुपये की कमाई की तो सवा करोड़ का इनकम टैक्स देना होगा।

लेकिन उस रकम को आप हवाला से विदेश भेजते हैं, जहां इनकम टैक्स नहीं लगता, फिर रकम वापस ले आते हैं तो आपको सवा करोड़ की बचत हो जाएगी। इसलिए 49 अरब डॉलर के विदेशी निवेश का एक हिस्सा फर्जी है। एक और रास्ते से हमारा पैसा देश से बाहर जा रहा है। इसका जरिया हैं मल्टिनैशनल कंपनियां। वे ट्रांसफर प्राइसिंग के रास्ते बड़ी रकम बाहर भेजती हैं।

इसे यूं समझिए कि किसी कंपनी ने अपनी लंदन ब्रांच से मुंबई ब्रांच को माल बेचा। मुंबई ब्रांच ने उसकी असल क़ीमत 10 रुपये के बदले 12 रुपये का भुगतान किया। इस तरह से 2 रुपये बिल्कुल क़ानूनी रूप से भारत से बाहर चले गए। ग्लोबल फाइनैंशल इंटेग्रिटी नाम की अंतरराष्ट्रीय संस्था कहती है कि सिर्फ ट्रांसफर प्राइसिंग के रास्ते भारत से सालाना 9.8 अरब डॉलर की रकम विदेश जा रही है।

तीसरा रास्ता है, हमारी सरकार यहां के उद्यमियों को पूंजी बाहर ले जाने के लिए प्रेरित कर रही है। पिछले साल देश से 11.3 अरब डॉलर कानूनी रास्ते से दूसरे देशों में निवेश के लिए भेजे गए। इसलिए 49 अरब डॉलर का कथित विदेशी निवेश का आंकड़ा सही नहीं है। मुझे तो लगता है कि अपने देश में शुद्ध विदेशी निवेश आने के बजाय बाहर जा रहा है।

बाहर जाने वाली रकम का दूसरा बड़ा नुकसान है कि घरेलू अर्थव्यवस्था में जान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 1990 से 2010 के 121 देशों के अध्ययन में पाया कि बाहर जाने वाले निवेश में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है तो घरेलू निवेश में 29 प्रतिशत की भारी गिरावट आती है। मुझे लगता है कि जब सरकार विदेशियों के पीछे भागती है तो घरेलू उद्यमियों का मनोबल गिरता है। जैसे, घर का मुखिया रेस्तरां के भोजन की ज्यादा तारीफ़ करे तो गृहिणी का मनोबल कम होता है।

इसलिए अपने देश से क़ानूनी ढंग से जो रकम बाहर जा रही है, उससे घरेलू निवेश में कमी हो रही है। देश को ज़रूरी विदेशी निवेश नहीं मिल रहा। इसका सपना असल में वे लोग परोस रहे हैं, जो देश की पूंजी को बाहर ले जाना चाहते हैं। इसी तरह, हमने अपने बाज़ार को सस्ते चीनी माल के लिए खोल दिया है।

हमने वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन से वादा कर रखा है कि हम 48.5 प्रतिशत से अधिक आयात कर नहीं लगाएंगे। लेकिन असल में हम अभी औसतन 13.8 प्रतिशत ही शुल्क लगा रहे हैं। इसे कम से कम तीन गुना बढ़ाया जा सकता है। इससे चीन से आने वाले माल में कमी आएगी। लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे।

यह बात सच है कि हमारे यहां आयात कर दूसरे समकक्ष देशों से अधिक है। लेकिन अपने देश में भ्रष्टाचार भी ज्यादा है, इसलिए यह तुलना ठीक नहीं। देश का जितना शोषण भ्रष्टाचार से हो रहा है, उतना ही अतिरिक्त आयात कर लगाना होगा, तभी हम बचेंगे।

लेकिन हम ऐसा क्यों नहीं कर रहे? इसके दो कारण हैं। पहला, देश के शीर्ष उद्यमी नहीं चाहते कि हम वैश्वीकरण से पीछे हटें। उन्हें वैश्वीकरण पसंद है क्योंकि तब वे अपनी पूंजी आसानी से विदेश ले जा सकते हैं। दूसरा कारण है कि हमारे नौकरशाहों को रिटायरमेंट के बाद और उनकी औलादों को विश्व बैंक और अन्य मल्टिनैशनल कंपनियों में मोटी पगार वाली नौकरी मिलती है। इसलिए वे ऐसी नीतियों को लागू करने की कोशिश करते हैं, जिनसे बड़े उद्यमियों को लाभ मिले। विश्व बैंक भी खुश रहे।

भारत सरकार के एक रिटायर्ड सचिव ने मुझे बड़े गर्व से 2010 में बताया कि विश्व बैंक से उन्हें 40 हजार रुपये प्रति घंटे की दर से सलाह देने का काम मिला है। इसलिए हमारे नौकरशाह ऐसी नीतियां लागू करते हैं। बड़े उद्यमियों और नौकरशाहों का अपवित्र गठबंधन देश को नचा रहा है। इसी कारण से हम चीन का सामना नहीं करते। न तो WTO के नियमों के मुताबिक आयात कर बढ़ाते हैं और न ही अपनी पूंजी को बाहर जाने से रोकने का जतन करते हैं।

इस सच को छुपाने के लिए वही अपवित्र गठबंधन भोले-भाले लोगों के जरिये आम आदमी से याचना करवा रहा है कि आप चीन का बना माल न खरीदें। सरकार स्वयं देश को कमजोर कर रही है और जनता से कह रही है कि देश को मजबूत करो। सरकार को ऐसी आर्थिक नीतियां लागू करनी होंगी, जिससे देश ताकतवर बने। फिर वह जनता से सहयोग मांगे कि आप देश में बना महंगा माल बर्दाश्त करें, तो जनता सहयोग देगी। लेकिन वह खुद चीन की सेवा करे और जनता से कहे कि विरोध करो, तो बात नहीं बनेगी।

अंत में कहना चाहूंगा कि चीन के प्रति कोरोना को लेकर पूरी दुनिया में जो आक्रोश है, वह नहीं टिकेगा। आपको याद होगा कि 2013 में केदारनाथ में भयंकर आपदा आई थी। हज़ारों मरे। सरकारी कमिटियों ने इसके लिए पनबिजली परियोजनाओं को जिम्मेदार बताया, लेकिन बड़े उद्यमियों, सरकारी सचिवों और मीडिया ने वह बात बदल दी।

आज कहा जा रहा है कि पनबिजली ने आपदा से हमें बचाया है। इसी तरह हम कोरोना से हुई तबाही को भूल जाएंगे। इसे आकस्मिक घटना बता दिया जाएगा। चीन से आयात और अपनी पूंजी बाहर जाने का सिलसिला पहले की तरह हो जाएगा ताकि देश के बड़े उद्यमियों और नौकरशाहों के हित सधते रहें।

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