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Bhola Tiwari May 06, 2019, 8:56 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश मिश्रा

कुछ दिनों से कोसी नदी का सरकारी इतिहास पढ़ रहा था जो बिहार के दूसरे सिंचाई आयोग की रिपोर्ट (1994) में लिखा गया है. नदी पर तटबंधों और बराज के निर्माण का काम 1963 में पूरा हुआ था और उसी साल नेपाल के डलवा गाँव में कोसी का दाहिना तटबंध जुलाई मास में टूट गया था. इस टूटन से नुक्सान तो कोई ख़ास नहीं हुआ मगर भारत सरकार को नेपाल में राहत कार्य चलाने पड़ गये थे. इस घटना के बारे में आयोग की रिपोर्ट में कोई चर्चा नहीं है. यह तटबंध 1968 में जमालपुर के पास दरभंगा में भी पांच जगहों पर टूटा था और इसके बारे में भी इस रिपोर्ट में कोई चर्चा नहीं है. 

1971 में भटनिया के पास छतौनी, लक्ष्मीपुर, लालमनपट्टी, टेढ़ी बाज़ार, परसाही भटनिया, नरपतपट्टी, बजराही, और रुपौली गाँवों को घेरता हुआ एक रिंग बाँध हुआ करता था जो उस साल टूट गया और इन गाँवों के बाशिंदों को अपना घर द्वार छोड़ कर बाहर तटबंध के कंट्रीसाइड में आकर बसना पड़ा. इन गाँवों के बाशिंदों ने तटबंध के बाहर पुनर्वास लेने से मना कर दिया था और उनकी रक्षा के लिए सरकार को यह रिंग बाँध बनाना पड़ा था. इस घटना का ज़िक्र भी इस रिपोर्ट में नहीं है. इसी तरह से 1980 में 121-122 किलोमीटर के बीच कोसी का पूर्वी तटबंध बहुअरवा गाँव के पास टूट गया था और इस घटना के प्रति भी आयोग की रिपोर्ट मौन हैं. यहाँ तक कि 1984 में सहरसा जिले के नवहट्टा के पास हेमपुर गाँव में जो तटबंध टूटा और जिस दरार की वजह से लगभग साढ़े चार लाख लोग बेघर हो गए थे और उन्हें सितम्बर 1984 से लेकर 1985 के मई महीने तक खुले आसमान के नीचे ज़िन्दगी गुजारनी पड़ी थी उसके प्रति भी आयोग की रिपोर्ट में कोई चर्चा नहीं है. 

1987 में जब कोसी का पश्चिमी तटबंध फिर एक बार गंडौल और समानी के पास सहरसा के महिषी प्रखंड में टूटा टूटा तब उसके बारे में भी आयोग की रिपोर्ट खामोशी अख्तियार कर लेती है. आयोग की रिपोर्ट केवल एक ही बार 1991 में कोसी तटबंध टूटने की बात स्वीकार करती है जब कोसी का तटबंध नेपाल में जोगिनिया के पास टूट गया था. रिपोर्ट कहती है कि तटबंध टूटने की वजह से पानी बाहर नहीं गया मगर तटबंध की मरम्मत पर जो करोड़ों रुपये खर्च हो गए थे उसकी बात तो बतानी चाहिए थी. 

तटबंधों का टूटना एक बड़ी घटना होती है. उस पर इस तरह से पर्दा डालना इंजीनियरों की अगली पीढ़ी को गुमराह करने जैसा है क्योंकि जब इसे दबा दिया जाता है तो उसके कारणों पर भी पर्दा पड़ता है और आने वालों को कोई शिक्षा मिल सके उससे भी वह वंचित हो जाते हैं. सात खण्डों में लिखी जाने वाली और चार वर्षों तक इंजीनियरों की एक टीम के अथक परिश्रम के बाद बनी इस रिपोर्ट की अगर यह हालत है तो विभागों की बाकी रिपोर्टों की क्या विश्वसनीयता होगी उसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है.

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