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अब्दुल रहीम खानखाना - एक बहु आयामी व्यक्तित्व .

Bhola Tiwari May 06, 2019, 8:32 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

बादशाह हुमायूँ के सिपहसालार रहे बैरम खान के लाहौर स्थित घर में 17 दिसम्बर सन् 1556 ईश्वी को एक पुत्र पैदा हुआ . उस समय बादशाह सलामत भी सिकन्दर सूरी के बगावत को कुचलने के लिए लाहौर में थे . खुशखबरी सुन बादशाह बैरम खान के घर आए और उन्होंने बच्चे का नाम रहीम रखा . हुमायूँ को बैरम खान पर पूरा भरोसा था . उन्होंने अपने जीते जी बैरम खान को अपने पुत्र अकबर का सरंक्षक नियुक्त किया था .

हुमायूँ के मृत्यु के पश्चात अकबर गद्दी पर बैठा . बैरम खान पहले से हीं अकबर का सरंक्षक नियुक्त था . बैरम खान के सरंक्षक होने की वजह से अकबर को कई अहम फैसले लेने में कठिनाई आती थी . अतः अकबर ने जोर दे कर बैरम खान को हज़ यात्रा पर भेज दिया . हज़ यात्रा के दौरान मुबारिक खान नामक किसी अफगान ने पुरानी रंजिश के कारण बैरम खान की हत्या कर दी . विधवा सुल्ताना बेगम अपने बेटे रहीम के साथ अकबर के दरबार में उपस्थित हुईं . अकबर को बैरम खान के मरने का बहुत अफ़सोस हुआ . उसने बैरम खान के विरोधियों का मुँह बन्द करने के वास्ते अपने से उम्र में बड़ी सुल्ताना बेगम से निकाह कर लिया और रहीम को अपना दक्तक पुत्र घोषित किया .

रहीम की शिक्षा दीक्षा कुशल हाथों से शुरू हुई . 

रहीम ने संस्कृत , अरबी , फ़ारसी , अवधी व ब्रज भाषा थोड़े दिनों में हीं सीख ली . रहीम जल्द हीं युद्ध कौशल में भी पारंगत हो गए . उन्हें शहजादों की तरह मिर्जा खान कहा जाता था . 16 वर्ष की उम्र में रहीम की शादी माहबानो बेगम से हुई . गुजरात के ऊपर विजयश्री प्राप्त होने पर उन्हें अकबर द्वारा खानखाना उपाधि प्रदान की गई थी . अब रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना हो गया .

रहीम ने कविता लिखना शुरू कर दिया था . उनकी विमाता भी कविता लिखती थीं . इसलिए रहीम को कविता विरासत में मिली थी . उन्होंने रहीम दोहावली , बरवै , नायिका भेद , मदनाष्टक , रास , पञ्च ध्यायी और नगर शोभा आदि पुस्तकें लिखीं . कहा जाता था कि वह धर्म से मुसलमान , पर संस्कृति से हिन्दू थे . राम धारी सिंह दिनकर ने लिखा है - अकबर ने अपने दीन - ए - इलाही धर्म में जितना हिंदुत्व को जगह दी है , उससे कहीं ज्यादा हिंदुत्व को महत्व रहीम ने अपनी कविताओं में दी है .

रहीम मुस्लिम होने के वावजूद कृष्ण भक्त थे . वे कृष्ण भक्ति में लीन हो जाया करते थे . इतने कि उन्हें पता हीं नहीं चलता कि वे दरबार में बैठे हुए हैं और दरबार के प्रति उनकी कुछ जिम्मेदारी बनती है . कई बार अकबर उनको इस बावत टोक चुका था . कहा जाता है कि जब गुजरात का राजा हार गया तो अब्दुल रहीम खानखाना को अपने महल में खाने पर आमन्त्रित किया , तब भगवान कृष्ण ने बाल - रूप में प्रकट हो रहीम को खाने पर जाने से मना किया था , क्योंकि खाने में जहर मिला हुआ था . इस घटना के बाद कृष्ण पर उनकी आस्था और गहरी हो गई .

बादशाह और जनता के बीच एक सम्पर्क अधिकारी नियुक्त होता था , जिसे मीर अर्ज कहा जाता था . ये अधिकारी बदलते रहते थे . अकबर ने रहीम की लगन व निष्ठा देखकर उन्हें मुस्तकिल (permanent) मीर अर्ज नियुक्त कर दिया था . रहीम जकात ( दान ) भी दिल खोलकर देते थे . वे दान देते समय निगाहें नीची रखते थे . इसीलिए एक आदमी को कई कई बार जकात मिल जाता था , निगाहें नीची रखने के कारण रहीम उन आदमियों को पहचान नहीं पाते थे . इसी बात पर अकबर के दरबारी कवि गंग ने तंज़ कसा -

सीखी कहाँ से नवाब जू ऐसी देनी देन ?

ज्यों ज्यों कर ऊँचे बढ़ै त्यों त्यों नीचे नैन .

इसका जवाब रहीम ने यूँ दिया -

देनदार कोई और है , जो देता दिन रैन .

लोग भरम हम पर करैं , ताते नीचे नैन .

काफी मिन्नतों के बाद बादशाह अकबर को सन्तान हुई , जिसका नाम सलीम रखा गया . लाड़ प्यार ने सलीम को विगाड़ दिया था . कई उस्ताद यथा - शेर अहमद , मीर कलाँ , दरबारी विद्वान अबुल फ़जल आदि उसे शिक्षित करने के नियत से आए , पर बिगड़ैल सलीम को कोई सुधार नहीं पाया . अब बारी आई अब्दुल रहीम खानखाना की . रहीम ने सलीम को हर तरह से दक्ष कर दिया , क्योंकि वो उसकी हर हरकत के बारे में बादशाह अकबर को बताते थे , जिससे डर कर सलीम हर विद्या में निपुण होता चला गया .

गोस्वामी तुलसी दास रहीम के समकालीन थे . रहीम ने हीं तुलसी को रामायण लिखने की प्रेरणा दी . जब रामायण पूरी हो गई तो उसको चुराने के निमित्त बनारसी पण्डे प्रयास करने लगे तब रहीम ने रामायण को राजा टोडरमल के यहाँ रखवाया . रहीम चाहते तो रामायण अपने पास भी रख सकते थे , पर उस हालत में बनारसी पंडों को यह कहने की छूट मिल जाती कि रामायण मुस्लिम के घर रखा गया था - इसलिए वह अस्यपृस्य हो गया .

अकबर के मरणोपरांत सलीम ने जहांगीर के नाम से सत्ता सम्भाली . तख्त पर बैठते हीं जहांगीर ने अब्दुल रहीम खानखाना को हाशिए पर लाना शुरू कर दिया . उसने महावत खान को ज्यादा तरजीह देनी शुरू कर दी . रहीम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट गया . उनकी पत्नी माहबानों की मृत्यु अम्बाला में हो गई . बेटा हैदर कुली खान जल मरा . दो और बेटे लड़ाई में मारे गए . रहीम के पास अब धन नहीं रहा कि वे दान कर सकें . दोस्त , मित्र साथ छोड़ने लगे . खुद रहीम ने अपने मित्रों से कहा -

यारों यारी छाड़िये , अब रहीम वे नाहीं .

इन्हीं परेशानियों के चलते हैरान परेशान अब्दुल रहीम खानखाना सन् 1627 को इस दुनियाँ से महा प्रयाण कर गए .

अब्दुल रहीम खानखाना का मक़बरा दिल्ली के निजामुद्दीन बस्ती में जीर्ण शीर्ण हालत में है . दशकों से इसकी मरम्मत नहीं हुई . और तो और इस मकबरे के पत्थर निकाल कर मुगल बादशाह मोहमद शाह रंगीला के मकबरे में लगा दिया गया है . कभी राजा भोज ने कहा था , " राजा का सम्मान देश में होता है , पर विद्वान का देश व विदेश दोनों जगह होता है ." लेकिन कम से कम रहीम के परिपेक्ष्य में यह विचार तो झूठा साबित हो रहा है .

सुनते हैं कि अब आगा खान ट्रस्ट ने रहीम के मकबरे के अनुरक्षण का जिम्मा लिया है . इस काम में चार साल का समय लग सकता है .

देर आयद , दुरुस्त आयद .

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