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बादशाह की मौज-मस्ती और इलाके की औरतों की सूझ-बूझ.

Bhola Tiwari May 05, 2019, 7:37 AM IST टॉप न्यूज़
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बादशाह की मौज-मस्ती और 

दिनेश मिश्रा

बादशाह शाहजहाँ अपने बाप-दादों की तरह शिकार का बहुत शौक़ीन था. उसका एक बादशाह महल था जिसका इस्तेमाल वह शिकार खेलने के लिये एक आरामगाह के तौर पर किया करता था. यह यमुना के बायें किनारे पर शिवालिक पर्वत माला के नीचे था और मौज-मस्ती के लिए अच्छी जगह थी. बादशाह तो बादशाह था और उनकी पसंद के मुताबिक़ ऐसी आरामगाहों के आसपास जो सरंजाम होना चाहिए उनमें पानी का माकूल और इफरात इंतजाम जरूरी था. और यह हो भी क्यों नहीं? शाहंशाह अकबर तक की हमेशा यह ख्वाहिश थी कि जहां भी वह शिकार खेलने के लिए जाए वहाँ शिकार करने की हांसी और हिसार जैसी जगह पर एक लम्बी नहर जरूर हो. मुग़ल बादशाहों ने सिंचाई और उससे मिलने वाली आमदनी से कभी परहेज़ नहीं किया मगर यह उनका असली मकसद नहीं था. हथियारबंद सिपाही इन आरामगाहों की रखवाली इसलिए करते थे ताकि बादशाह की मौज-मस्ती में किसी तरह का खलल न पड़े और यह रय्यत को मिलने सिंचाई जैसी सहूलियात से ज्यादा जरूरी था. शाहजहाँ के लिए लिए बहुत सी शिकारगाहों में से किसी एक शिकारगाह का कोई ख़ास मतलब नहीं था, लेकिन वह शिकारी से कहीं ज्यादा एक फनकार था. दिल्ली में हर तरफ नदी के दूसरे किनारे पर किसी सिंचाई की नहर के मुकाबले फव्वारों की मौजूदगी उसे ज्यादा रास आती थी. वह यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर गया जहां से एक नयी नहर निकालने और आरामगाह बनाने का भरोसा उसे उसके इंजीनियर अली मर्दन खां ने दिया था. इसकी खबर मिलते ही कि बादशाह अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ उधर आने वाला है, वहाँ के बाशिंदों की बेचैनी बढ़ गयी. बादशाह अपने हरम की औरतों, फ़ौज और कारिंदों के साथ वहाँ आ कर लम्बे समय के लिए कयाम करने वाला था. यह सोच कर ही उनकी नीद काफूर हो गयी. उन लोगों ने एक तरकीब निकाली. उन दिनों पहाड़ी के निचले इलाके में घेघा रोग बहुत फैला हुआ था और बहुत सारी औरतें इसकी मरीज़ थीं. ऐसी औरतों को इकट्ठा कर के इलाके के लोगों ने बादशाह के खेमें में जरूरी सामान और अपनी ताकत भर सौगात ले कर भेजा. यह औरतें जब बादशाह के खेमें में जा कर वहां बादशाह के साथ आयी ‘जनाना’ से मिलीं तब उन ‘ज़नाना’ ने इन सभी औरतों से उनकी इस बदहाली की वजह पूछी कि सभी औरतों की यह हालत क्यों है? इलाके की औरतों ने उन्हें बताया कि वह न तो कायदे से सांस ले सकती हैं, न पानी पी सकती हैं और घेघा तो यहाँ रहने के कुछ दिनों के अन्दर ही पकड़ लेता है. इतना सुनना था कि मेहमान औरतें घबरा गयीं और उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उन्होनें तुरंत बादशाह को बुला भेजा और सारा किस्सा सुनाया. उसके साथ बादशाह से यह भी दरख्वास्त की कि उन्हें तुरंत दिल्ली वापस भेज दिया जाय. बादशाह को उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा न था. कहावत भी है कि भगवान भी वही चाहता है जो औरतें चाहती हैं. शाहजहाँ इतना मर्द भी नहीं था कि अपने हरम की औरतों की मर्ज़ी के खिलाफ जाता. उसने कारिंदों को वापस दिल्ली कूच करने का हुक्म दिया, खेमें उखड गए. बादशाह यहाँ पहली बार आया था और यही उसका इस जगह आखिरी पड़ाव भी साबित हुआ. 

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