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सपा-बसपा गठबंधन पर एक चर्चा

Bhola Tiwari May 04, 2019, 8:20 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

06 दिसंबर 1992 विवादित ढ़ांचे के विध्वंस के बाद भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता चरम पर थी,कल्याण सिंह हिंदुओं के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे।सरकार के बर्खास्तगी के बाद उन्हीं के नेतृत्व में 1993 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया।इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सपा अध्यक्ष और बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।राजनीतिक विश्लेषकों और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस गठबंधन को बिल्कुल भी तब्बजो नहीं दिया।उनका अनुमान था कि "राम लहर" में भाजपा वैतरणी पार कर लेगी।

राम लहर के बाद भी चुनाव परिणाम चौकाने वाले थे।गठबंधन के तहत सपा ने कुल 260 सीटों पर चुनाव लड़ा,जिसमें उसे 109 सीटों पर जीत हासिल हुई।बसपा को 163 सीटों पर लड़ने के बाद 67 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई।

भयंकर "राम लहर" में भी सपा-बसपा का "सोशल इंजीनियरिंग" का फार्मूला सफल होता नजर आया।सपा-बसपा गठबंधन को 176 सीटें मिली जबकि भाजपा को उनसे एक सीट ज्यादा 177 सीट,मगर कांग्रेस के सहयोग से मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और भाजपा विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई।

मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री तो बन गए मगर महत्वाकांक्षी मायावती मुलायम और सपा के खिलाफ हीं रहीं।पहले कांशीराम ने मुलायम सिंह की शिकायत पर मायावती को समझाने की कोशिश की मगर मायावती फिर भी मुखर हीं रहीं तब कांशीराम ने भी विरोध की राजनीति शुरू कर दिया।दबंग मुलायम के लिए ये सब असहनीय था मगर वो बेबस थे।

परेशान मुलायम सिंह की नजर बसपा को तोड़ने में लग गई।कांशीराम समझ गए थे कि अब गठबंधन का चलना मुश्किल है।उन्होंने मुलायम पर उन वायदों को पूरा करने का दवाब डालना शुरू कर दिया जो दलित हित से जुड़े थे।कांशीराम पुलिस विभाग में 20% दलितों की नियुक्ति चाहते थे मगर मुलायम टालमटोल करते रहे तो खीझकर उन्होंने मुलाकात सिंह को आदेश दिया कि वह इन योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट मायावती को सौंपे।

इस बीच जिला पंचायत का चुनाव आ गया, लखनऊ से एक दलित महिला "तारादेवी" ने जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ने का मन बनाया, सपा के दबंग नहीं चाहते थे कि तारादेवी चुनाव लड़ें।दलित महिला तारादेवी का अपहरण कर लिया गया, जब ज्यादा शोर मचा तो दबंगों ने उन्हें रिहा कर दिया।

कांशीराम को जैसे हीं इस घटना की सूचना मिली, वो तारादेवी से मिलने उनके घर चले गए।यद्यपि तारादेवी बसपा की नहीं थीं मगर पूरी बसपा उसके पीछे लामबंद हो गई थी।इस अपहरण कांड में सपा सरकार में वनमंत्री भगवती सिंह और विधायक राजेंद्र यादव का नाम खूब उछाला था।कांशीराम चाहते थे कि भगवती सिंह मंत्रीमंडल से इस्तीफा दें मगर मुलायम ने उनकी माँगों पर ध्यान नहीं दिया।

बेलगाम मायावती के बयान हमेशा सुर्खियां बटोरते रहते थे, इस बीच उन्होंने महात्मा गांधी के खिलाफ अभ्रद टिप्पणी कर दी जिसका विरोध समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने बहुत पुख्ता ढ़ंग से किया।कांग्रेस आलाकमान ने इस मुद्दे पर समर्थन वापस लेने का ऐलान किया और गठबंधन सरकार डेढ़ साल में हीं अपने अंतरविरोध के कारण गिर गई।

23 मई 1995 को मुलायम सिंह ने बसपा प्रमुख कांशीराम को वार्ता करने लखनऊ बुलाया, मगर कांशीराम ने शर्त रख दी थी कि वार्ता पत्रकारों के समक्ष होगी।मुलायम इसके लिए तैयार नहीं हुऐ।अंदरखाने से खबर आई कि जयंत मलहोत्रा भाजपा के नेताओं से सरकार बनाने के लिए बात कर रहें हैं।

01 जून 1995 को मायावती ने राज्यपाल से मुलाकात कर भाजपा के सहयोग से सरकार बनाने का दावा पेश किया, जिसे राज्यपाल ने स्वीकार भी कर लिया।मुलायम सिंह यादव ने ऐलान किया कि न तो वह इस्तीफा देंगे और न हीं विधानसभा भंग करने की सिफारिश करेंगे।

02 जून,1995 को बहुचर्चित "गेस्टहाउस" कांड को सपा के गुंड़े,दबंग विधायकों ने अंजाम दिया।बताते हैं कि लखनऊ के एसपी बी.बी.बख्शी और कुछ अधिकारियों के सहयोग से मायावती की जान बचाई जा सकी नहीं तो जो आलम था उसमें कुछ भी संभव था।कुछ भाजपा के नेताओं ने भी मायावती को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।वर्तमान डीजीपी ओमप्रकाश सिंह उन दिनों लखनऊ के एसएसपी थे जो गेस्टहाउस के लाँन में खड़े होकर लगातार सिगरेट फूंकते रहे मगर बचाने की तनिक भी कोशिश नहीं किया।

03 जून 1995 को राज्यपाल के कड़े निर्देश के बाद मायावती ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया।मायावती ने उसी दिन जाँच की घोषणा की मगर अभी तक नतीजे का इंतजार है।

23 साल के बाद "मोदी लहर" को रोकने के लिए फिर सपा-बसपा ने हाथ मिलाया है,इस दोस्ती का परिणाम तो भविष्य के गर्भ में छूपा है मगर ये भी सच है कि मायावती में अब वो परिपक्वता दिखती है जो एक लोकप्रिय नेत्री में दिखनी चाहिए।सपा की भी कमान मुलायम सिंह यादव के यशस्वी पुत्र अखिलेश यादव के हाथ में है जो अपने पिता के मुकाबले काफी शालीन हैं।प्रेसवार्ता में जिस तरह अखिलेश यादव ने मायावती को सम्मान दिया वो देखने लायक था।

आपको बता दें 2014 के "मोदी लहर" में भाजपा को 42.63% वोट मिले थे जबकि सपा को 22.35%,बसपा को 19.77%,कांग्रेस को 07.53% वोट मिले थे।अगर सपा-बसपा के वोट को जोड दिया जाय तो वह भाजपा के बराबर बैठती है।मोदी मैजिक दम तोड़ रही है ये तो तीन हिंदी हार्टलैंड के चुनाव से स्पष्ट हो गया है।इस गठबंधन से दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की बौखलाहट स्पष्ट देखी जा सकती है।भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में सभी बड़े नेताओं के भाषण में इसकी गूंज स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी।कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विदेश से इस गठबंधन पर लगातार बयान दे रहे थे।

उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में हमेशा जातियों की चली है वनस्पत अन्य मुद्दों के।राम लहर में भाजपा का सरकार न बना पाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल आबादी 25% है,ब्राहमण 8%,राजपूत 5% और अन्य अगडी जाती 3% के बराबर हैं।जबकि पिछडी जातियों की कुल भागीदारी 35% की है जिसमें यादव 13%,कुर्मी 12% और अन्य पिछडी जातियों की संख्या 10% है।मुसलमान 18% और जाट मतदाता 5% हैं।

सभी की निगाहें इनपर हैं अब ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन किसे अपने पाले में कर सकता है।

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