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UNESCO ने "सारागढ़ी" की लडाई को दूनिया की सबसे बेहतरीन पाँच लड़ाइयों में शामिल किया है

Bhola Tiwari May 04, 2019, 7:41 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

12 सितंबर 1897,हिंदूकुश पर्वतमाला में स्थित "सारागढ़ी" पोस्ट पर कब्जे को लेकर अफगानी लडाकों ने आक्रमण कर दिया।अफगानिस्तान से लगने वाले इस इलाके पर कब्जा बनाए रखने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने यहाँ ब्रिटिश सेना तैनात कर दी थी।ये चौकी रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण थी जो गुलिस्तान और लाकहार्ट किले के बीच में स्थित एक पहाडी पर थी।इस इलाके में अक्सर वर्चस्व को लेकर अफगानों और ब्रिटिश फौज में लडाइयां होती रहती थीं।अफगानी गुलिस्तान और लोखार्ट के किलों पर कब्जा करना चाहते थे।सारागढ़ी चौकी इन दो महत्वपूर्ण किलों के बीच संपर्क सूत्र का काम करता था।

अफगान पश्तूनों ने दस हजार लडाकों के साथ सारागढ़ी किले को चारों तरफ से घेर लिया और किले में मौजूद सैनिकों को आत्मसमर्पण करने को कहा।सारागढ़ी पोस्ट पर केवल 21 सिख सैनिक तैनात थे,सिग्नल इंचार्ज सरदार गुरमुख सिंह ने लेफ्टिनेंट कर्नल जाँन होफ्टन को होलोग्राम पर हमले की सूचना दी।होफ्टन ने पूछा कितने अफगानी सैनिक है तो गुरमुख सिंह ने कहा तकरीबन दस हजार।इतना सुनते हीं होफ्टन ने तुरंत कहा अगर भाग सकते हो तो भाग जाओ,नहीं तो सरेंडर कर दो।इतने दुर्गम जंगल में दो दिन से पहले सैनिक नहीं आ सकते।

सारागढ़ी किले में मौजूद 21 सिपाहियों ने ये निर्णय किया कि किले को दुश्मन के हाथों सौंप कर हार स्वीकार करने के बजाय कबीलाई पठानों से मुकाबला किया जाए।

इशर सिंह के नेतृत्व में सभी 21 सिपाहियों ने रायफल उठा लिया और बेखबर अफगान फौज पर टूट पडे।भगवान सिंह को मुख्य द्वार संभालने का जिम्मा सौंपा गया था और उन्होंने प्राण निकलते तक खूब संभाला।भगवान सिंह ने अकेले पचासों अफगान पशतूनों को ढेर कर दिया।

धीरे धीरे सिख सैनिक ढेर होते गए मगर उनकी हिम्मत कम नहीं हुई।गोलियां खत्म हो चुकी थी मगर सिख सैनिकों ने तलवार से मरते दम तक खूब लडा।

सारागढ़ी चौकी पर बचे आखिरी सिपाही गुरमुख सिंह ने सिग्नल टावर के अंदर लडते हुए 20 अफगानों को मौत के घाट उतार दिया।जब अफगान गुरमुख सिंह को हराने में असहाय हो गए तो उन्होंने सिग्नल टावर में हीं आग लगा दिया।वीर सिख गुरमुख सिंह जिंदा जलकर शहीद हो गया, तब जाकर सारागढ़ी का युद्ध समाप्त हुआ।

सिर्फ 21 सैनिकों ने लगभग 1000 अफगानी सैनिकों को ढेर कर दिया था।यद्यपि अफगान इस युद्ध को जीत गए फिर भी इस युद्ध ने उन्हें इतनी बुरी तरह थका दिया था कि दो दिनों बाद ब्रिटिश सेना ने फिर सारागढ़ी पोस्ट पर कब्जा कर लिया।

उन महान सैनिकों को मरणोपरांत ब्रिटिश एंपायर की तरफ से बहादुरी का सर्वोच्च पुरस्कार "इंडियन आर्डर आँफ मेरिट" प्रदान किया गया।यह पुरस्कार आज के "परमवीर चक्र" के बराबर है।

ब्रिटिश शासन ने 12 सितंबर को "सारागढ़ी डे" घोषित किया और यह आज भी हर वर्ष ब्रिटेन में मनाया जाता है।

ब्रिटिश स्कूलों में आज भी बच्चों के पाठ्यक्रम में सारागढ़ी युद्ध को पढाया जाता है,मगर भारत में मुगलों के आक्रमण और उसके अत्याचारों पर हीं विषय केन्द्रित है।

यूनिस्को ने सारागढ़ी की लडाई को दूनिया की सबसे बेहतरीन पाँच लडाईयों में शामिल किया है।

मेरी सरकार से गुजारिश है कि सारागढ़ी के युद्ध को बच्चों के इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल करें और उन्हें ये जानने का अवसर दें कि कैसे 21 बहादुर सैनिकों ने एक हजार अफगान पश्तूनों को मार गिराया था।

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