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कश्मीर सिंह की देश वापसी

Bhola Tiwari May 04, 2019, 7:17 AM IST टॉप न्यूज़
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 एस डी ओझा

कश्मीर सिंह भारत के पंजाब प्रांत के होशियार पुर जिले के निवासी थे । उनकी नौकरी 1967 में पंजाब पुलिस में लगी थी , लेकिन 1971 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी । रोजी रोटी कमाने के चक्कर में वे सीमा पार कर पाकिस्तान चले गये थे । उन्हें 1973 में पाकिस्तान के रावलपिण्डी शहर से पकड़ा गया था । उन पर पाकिस्तान की जासूसी करने का आरोप लगा था । उस समय उनकी उम्र 32 साल थी । उन्हें 35 साल तक पाकिस्तान के जेल में सड़ना पड़ा । उन्हें 18 साल तक पांव में बेड़ियों से जकड़ कर रखा गया था । उनकी गिरफ्तारी के पाँच साल बाद हीं उन्हें फाँसी की सजा सुना दी गयी थी । 28 मार्च 1978 को सुबह के चार बजे उन्हें फाँसी दी जानी थी । फांसी की पूरी तैयारी हो चुकी थी । अचानक रात के दो बजे फाँसी की सजा निरस्त कर दी गयी । 

फाँसी की सजा निरस्त होने के बाद भी कश्मीर सिंह और 30 साल पाकिस्तान जेलों में बंद रहे । उनके लिए मसीहा बनकर तत्कालीन कार्यवाहक मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी आए । यह बात सन् 2000 के बाद की है । अंसार बर्नी लाहौर सेंट्रल जेल के दौरा करने आए थे । वहां वे कश्मीर सिंह से मिले । उन्हें कश्मीर सिंह का केस जायज लगा । उन्हें सरासर इसमें नाइंसाफी दिखी । एक आदमी अकारण हीं 35 सालों से पाकिस्तानी जेल में सड़ रहा है, जिसकी फाँसी की सजा 30 साल पहले हीं निरस्त कर दी गयी थी । अंसार बर्नी ने कश्मीर सिंह का केस पाकिस्तान सरकार के पास पुनर्विचार के लिए रखा । उस समय पाकिस्तान के प्रेशिडेंट परवेज मुशर्रफ थे । मामला कई सालों तक विचाराधीन रहा । आखिर 4 मार्च 2008 को पर्रवेज मुशर्रफ ने उनकी रिहाई के आदेश जारी कर दिए थे । 

6 मार्च 2008 के दिन पाकिस्तान सरकार ने कश्मीर सिंह को बाघा बार्डर पर छोड़ दिया । दोनों तरफ से तालियाँ बजीं थीं । कश्मीर सिंह सीधे सच्चे इंसान थे । उन्होंने भारत पहुँच कर भारत की मिट्टी को न तो चूमा और न पत्नी परमजीत कौर से सार्वजनिक तौर पर गले मिले । केवल बच्चे शीशपाल सिंह के सिर पर हाथ रखा । और तो और वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक ही सवाल बार बार पूछने पर झल्ला उठे थे - "एक ही सवाल बार बार क्यों पूछ रहे हो ? अपने घर आने में किसे अच्छा नहीं लगेगा ? " वो कश्मीर सिंह जो भारत पाक रिश्ते का चेहरा बनकर उभरे थे , अंत समय में अपनी नाराजगी छुपा न सके थे । उन्हें एक रात के लिए फाइव स्टार होटल में भी ठहराया गया था । होटल के नर्म विस्तार पर उन्हें रात भर नींद नहीं आयी थी । मीडिया को वांछित टी आर पी की दरकार थी । उन्हीं दिनों भारत आस्ट्रेलिया का मैच भी था । उन्हें डर था कि कहीं क्रिकेट इस खबर पर हाॅबी न हो जाए ।

कश्मीर सिंह को पूरी दुनियां बदली नजर आ रही थी । उनके हाथ में एक खिलौना पकड़ा दिया गया था , जिसे मोबाइल कहा जा रहा था । मोबाइल से वे दुनिया जहान से बात कर सकते थे । उनके गांव का नाम नांगलचोरां से नांगलखिलाड़ियां कर दिया गया था । मीडिया ने अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिए उन्हें युद्ध बंदी घोषित कर दिया था । 1972 / 73 में कौन सा युद्ध चल रहा था ? मीडिया कर्मी भी भूखे प्यासे गरमी जाड़ा बरसात का सामना करते रहते हैं , एक अदद खबर पाने के लिए जो कि मसालेदार हो । मीडिया बाजे गाजे के साथ कश्मीर सिंह की रिहाई दिखा रहा था । यहां तक तो ठीक था , पर किसी के घाव को कुरेदना ठीक नहीं था । यह हक मिडिया को बिल्कुल नहीं था । उनकी मर्जी जाने बिना उनसे अतीत के सवाल पूछना लाजिमी नहीं था ।

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