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अख्तर पिया जब पहुंचे लखनऊ से मटिया बुर्ज .

Bhola Tiwari May 02, 2019, 10:28 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने सत्ता से बेदखल कर दिया . उन पर यह आरोप था कि वे राज काज में मन नहीं लगाते . ठुमरी , चैती , दादरा लिखते हैं , गाते हैं व स्वांग भी रचाते फिरते हैं .उन पर अवध का सबसे अलोकप्रिय नवाब होने का ठप्पा लगाया गया. उन्हें कैद कर हुगली नदी के किनारे स्थित कलकत्ता के मटिया बुर्ज इलाके में ले जाया गया . इस तरह से अवध के दसवें नवाब वाजिद अली शाह अवध के अंतिम नवाब साबित हुए . 

वाजिद अली शाह को कैद कर अंग्रेज लखनऊ शहर से गुजर रहे थे .गौसनगर इलाके की हिंदू औरतों ने अपनी चूड़ियां तोड़कर इस कैद का विरोध किया था . कटरा विजन बोग की मुस्लिम औरतों ने अंग्रेज सैनिकों पर अपने दुपट्टे फेंके थे. अंग्रेज शर्मशार हो उठे . वे जब सबसे अलोकप्रिय नवाब थे तो जनता उन पर इतनी कुर्बान क्यों हो रही थी ? यहां पर अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति कारगर नहीं हुई . पूरे लखनऊ में यह अफ़वाह उड़ी कि अंग्रेज वाजिद अली शाह को गिरफ्तार करके लंदन ले जा रहे हैं . फिर दुआ मनौतियों का दौर शुरू हो गया ..

हजरत जाते हैं लंदन .

कृपा करो हे रधुनंदन .

वाजिद अली शाह अक्सर नाटकों में कृष्ण का रोल निभाते थे . 8 अगस्त सन् 1855 को नवाब साहब ने कृष्ण की मां देवकी का रोल किया था . उन्होंने कृष्ण के जन्म की प्रसव पीड़ा को अत्यंत मर्मांतक ढंग से अभिव्यक्त किया था . मानों वे स्वंय उस पीड़ा को भुगत रहे हों. 1856 में उन्हें " अवध - बदर " कर दिया गया . वे अवध छोड़ते समय बेइंतिहा रोये थे . वे जाते हुए अपनी प्रसिद्ध ठुमरी , "बाबुल मोरा , नईहर छूटो ही जाय ." गा रहे थे . नवाब वाजिद अली शाह ने बहुत सी ठुमरी , चैती व दादरा की रचना की थी . वे अख्तर पिया के नाम से गज़ल व नज्म भी लिखते थे. एक बानगी देखिए ....

दर -ओ -दीवार पर , हस़रत से नज़र करते हैं.

खुश रहो ऐ अहले वतन !अब हम तो सफ़र करते हैं.

कहते हैं कि वाजिद अली शाह उर्फ अख्तरी पिया ने मटिया बुर्ज पहुंचकर भी कृष्ण का किरदार निभाना नहीं छोड़ा . वे कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सात्विक भोजन करते थे . उन दिनों उनके लिए स्पेशल आलू बिरयानी बनता था . इस आलू बिरयानी को उनका स्पेशल खानसामा तैयार करता था . एक ऐसी बिरयानी, जिसे खाने वाला थक जायेगा , पर उसका मन नहीं थकेगा . इसकी रेसिपी आजकल लीक हो गई है . लगभग पूरे देश के अधिकांश होटलों ने आलू बिरयानी बनाने की कला सीख ली है , पर कोई इसकी रेसिपी एक दूसरे बताने को राजी नहीं है . आखिर ,धंधे का सवाल है .

अख्तरी पिया मटिया बुर्ज में अपनी बाकी की तमाम जिंदगी गुजार दिये . बाद में उनका बेटा भी मटिया बु्र्ज आ गया था . उनकी पत्नी हजरत बेगम को नेपाल में शरण मिली थी . उनका वहीं इंतकॉल हो गया . आज मटिया बुर्ज में नवाब वाजिद अली शाह एक कब्र में बेशक आराम फरमा रहे हैं , पर अवधी लोकगीतों में वे आज भी जिंदा हैं.


आजकल लखनऊ में ऐ अख्तर !

धूम है तेरी खुशबयानी की .

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