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रामे के चिरई , रामे के खेत

Bhola Tiwari May 02, 2019, 8:00 AM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

मेरा बचपन गांव में गुजरा है । गाँव में कई तरह के भिखारी आते थे । उनमें से कुछ खास थे । खास इसलिए कि वे कुछ खास तरह की आवाज लगाते थे । कुछ खास बातें कहते थे । उनकी दैहिक भाषा कुछ खास तरह की होती थी । इस खास की वजह से उन्हें हमारी नजरों ने खास बना दिया था । जब वे आते तो हम बच्चों की टोली उन्हें घेरकर खड़ी हो जाती थी । एक मजमा लग जाता । इस मजमे को हटाने के चक्कर में गृहस्वामिनी को उन्हें कुछ न कुछ देकर टरकाना पड़ता । उन दिनों गांव में मनोरंजन के कुछ खास साधन नहीं थे । भिखारियों के पीछे भागना हमारा शगल था । इससे हमारा मनोरंजन होता । भिखारियों को भी हमारा साथ भाता । इससे उन्हें प्रचार मिलता । यही प्रचार उन्हें दो जून की रोटी का जुगाड़ करता । 

एक मंगनी बाबा आते थे । वे बिहार के दरभंगा जिला के मैथिल ब्राह्मण थे । वे बचपन में हीं टुअर हो गये थे । माँ बाप ने उनके जिंदा रहने की कामना हेतु उनका नाम मंगनी रखा था । मंगनी जिंदा रहे , माँ बाप की मौत की विना पर। महतारी बाप के गुजर जाने के बाद अब वे गाँव के लोगों के रहमो करम पर जी रहे थे । एक दिन गाँव में नाट्य मण्डली आई । इस नाट्य मंडली के प्रबन्धक इनकी हालत से वाकिफ हुए । उन्होंने इनकी इस हालत पर द्रवित हो इनको अपना मंडली में शामिल कर लिया । बचपन था । चेहरे पर कमनीयता थी । मूंछें अभी नहीं उगीं थीं । इसलिए इनको सीता का पार्ट मिलने लगा । बड़े होने पर उनको जो भी पार्ट मिला वे उसे बखूबी निभाते चले गये । बाद में नाचना शुरू कर दिया था ।

नांच में भी उम्दा निकले वे । उनके नाच की सर्वत्र प्रशंसा होती । मंगनी जवानी की दहलीज पार कर गये , पर अभी तक कुंआरे थे । उनकी शादी कौन करता ? एक तो टुअर दूसरे नचनियां । गांव के किसी ने उन्हें सलाह दी कि वे कोई बच्चा गोद ले लें । कम से कम उनका नाम तो चलेगा । मरने पर कोई मुखाग्नि तो देगा । मंगनी को बात जंच गयी । उन्होंने अपने चाचा के पोते को शुभ लग्न व मुहुर्त देखकर गोद ले लिया । चाचा भी खुश थे कि घर की सम्पत्ति में अब बंटवारा नहीं होगा । अगर मंगनी की शादी हो जाती तो हो सकता था कि उनका अपना बेटा होता । फिर तो सम्पत्ति का बंटवारा जरूर होता । मंगनी ने अपनी नाट्य मंडली के साथ घूम घूमकर नाचना जारी रखा । वे अपने दत्तक पुत्र के लिए पैसे वहीं से भिजवाते रहे । दत्तक पुत्र बड़ा हो रहा था । अब वह स्कूल जाने लगा था ।

दत्तक पुत्र पढ़ लिख गया था । वह गांव के स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुआ । एक दिन पास के गाँव में मंगनी की नाट्य मंडली पहुँची थी । मंगनी के गाँव के लोग भी वहां गये । उनका दत्तक पुत्र भी पहुँचा । जब मंगनी की बारी आई तो उनके नाच ने लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया । सब तरफ से वाह वाह की आवाज आ रही थी । कुछ लोग फब्तियां भी कसने लगे । दत्तक पुत्र को बड़ा बुरा लगा । वह फब्तियां कसने वालों से भिड़ गया । दर्शक मण्डली में अफरा तफरी मंच गयी । कुछ लोगों ने बीच बचाव किया । मंगनी भी भीड़ में पहुँचे । किसी तरह मामला शांत हुआ , पर मंगनी के बेटे के दिल में हाहाकार मंचा हुआ था । बेटे ने दूसरे दिन सबके सामने अपने गले पर चाकू रख दिया । एलान किया कि मंगनी अगर नाचना नहीं छोड़ेंगे तो वह चाकू से अपनी गरदन रेत देगा ।

मजबूर होकर मंगनी को नाचना छोड़ना पड़ा । अब मंगनी नाट्य मंडली छोड़ गार्हस्थ्य आश्रम में पहुँच गये थे ।

प्रबन्धक ने उनका हिसाब किताब कर दिया था । मंगनी को गार्हस्थ्य आश्रम रास नहीं आया । वे रमता जोगी बहता पानी की तरह थे । अब वे भीख माँगने लगे । अब वे मंगनी से मंगनी बाबा कहे जाने लगे । उनके गले में सरस्वती की कृपा थी । वे सगुण और निर्गुण दोनों तरह के भजन गा लेते थे । वे बलिया के श्रीनगर गाँव में भारती ( सन्यासी ब्राह्मण ) लोगों के यहां रहते थे । वे बहुत बढियाँ भोजपुरी भी बोल लेते थे । जब किसी दरवाजे पर वे भीख मांगने जाते तो यह जरूर कहते -

रामे के चिरई रामे के खेत .

खा ल चिरई भरि भरि पेट .

बहुत दिनों बाद गाँव जाने पर पता चला कि मंगनी बाबा गुजर चुके हैं । उनका काम कजिया उनके दत्तक पुत्र ने किया था । उम्मीद करता हूँ कि उनकी सद्गति हो गयी होगी । बेटे ने मुखाग्नि जो दी थी ।

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