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चीनी घुसपैठ: तरीका और पृष्ठभूमि से समझिए मंशा

Bhola Tiwari Jun 03, 2020, 5:20 PM IST टॉप न्यूज़
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रंजीत कुमार

पटना। :  दुनिया के तमाम सामरिक विशेषज्ञ इन दिनों परेशान हैं। हर कोई इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसे विषम समय में चीन ने भारत के साथ सामरिक तनाव को हवा क्यों दिया है? कोरोना संक्रमण के कारण पूरी दुनिया में चीन विरोधी माहौल शीर्ष पर है। चीन ने अपने राजनीतिक इतिहास में ऐसी स्थिति का सामना कभी नहीं किया था। विश्व विरादरी की नाराजगी के कारण उसकी आर्थिक स्थिति और राजनीतिक साख दोनों धाराशायी होने के कगार पर है। इसके बावजूद वह भारत के साथ सीमा विवाद को युद्धक परिणति की ओर खीच रहा है। आखिर क्यों ?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन अपने नागरिकों का ध्यान आंतरिक परेशानी और नाराजगी से हटाने के लिए सीमा विवाद को हवा दे रहा है, तो उसे लेने का देना पड़ सकता है। किसी भी तरह का सैनिक टकराव दुनिया को चीन के खिलाफ मुक्कमल अभियान शुरू करने का अवसर ही प्रदान करेगा। भारत की ओर से मुंहतोड़ जवाब भी मिलना तय है। दोनों ही सूरत में उसकी परेशानी बढ़ेगी ही। 

तो फिर इस आक्रामक घुसपैठ के मायने क्या हैंं? फिलहाल इसका सटीक जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन दो-तीन बातें हैंं जिसे भारत को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। पहली बात यह कि चीन की विस्तारवादी नीति कम्युनिस्ट तानाशाही की स्थापना के बाद से ही इसी तरह चल रही है। वह पहले अपने सैनिकों को घुसपैठ कराकर विवाद को जन्म देता है, फिर बातचीत का स्वांग रचकर प्रतिद्वंद्वी की राजनीतिक और सामरिक प्रतिक्रिया का आकलन करता है। इस क्रम में अगर उसे लगता है कि प्रतिद्वंद्वी की ओर से माकूल जवाब मिलने की संभावना कम है, तो कुछ समय बाद अपने मूल अभियान पर लौट आता है। उसने पहले तिब्बत और बाद में 1962 में इसी लद्दाख और अरुणाचल की सीमा पर ऐसा ही किया था। पहले जून 1962 में उसने भारत की एक पोस्ट की घेरेबंदी की। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने इस पर कोई तीखी राजनीतिक और सामरिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं की। तो चीन ने पहले पोस्ट की घेराबंदी स्वयं हटा दी और जब भारत निश्चिंत हो गया तो अक्तूबर में हमला बोल दिया। 

जब उसे लगता है कि प्रतिद्वंद्वी मुकाबले के लिए राजनीतिक और सामरिक तौर पर तैयार है तो वह चुपचाप विवाद के पूर्व की स्थिति में लौटने की घोषणा करता है, लेकिन ऐसा करता नहीं। पूरी माथापच्ची में वह एलएसी को अल्टर कर नई जमीन हथिया लेता है। यही कारण है कि 2002 में सहमति जताने के बावजूद चीन ने लद्दाख का नक्शा शेयर नहीं किया। दरअसल, चीन पूरे लद्दाख घाटी पर अपनी गिद्ध दृष्टि जमाए हुए है और वह इसी तरह सांप-सीढ़ी का खेल खेलते हुए क्षेत्र को कब्जाना चाहता है। यानी वर्तमान तनाव के हर आयाम से लाभ प्राप्त करने का योजना-चित्र चीन ने ड्रॉ कर रखाा है। अगर कुछ भी प्राप्त नहीं होगा, तो भी अपनी जनता का ध्यान भंग करने और कोरोना अपराध से विश्व विरादरी का ध्यान हटाने में कुछ हद तक तो उसे कामयाबी मिल ही जाएगी। 

सवाल है भारत के पास क्या विकल्प है? मेरी समझ से अब तक भारत बिल्कुल सही रणनीति पर काम कर रहा है। चीन को यह एहसास दिलाना बेहद जरूरी है कि भारत किसी भी तरह के सैनिक टकराव का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए राजनीतिक और सामरिक दोनों स्तर पर तैयार है। इसके अलावा भारत को कूटनीतिक स्तर चीन के कमजोर नस को बीच-बीच में दबाते रहना चाहिए। यह कमजोर नस है, तिब्बत, ताइवान, हांगकांग और कोरोना वायरस। भारत में चीनी उत्पाद पर अतिरिक्त टैक्स लगाकर और अनाधिकारिक तौर पर जनता में चीनी उत्पाद के बहिष्कार का माहौल बनाकर भी इस धूर्त देश को पिछले पांव पर लाया जा सकता है।

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