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एक अधूरा इश्क

Bhola Tiwari May 01, 2019, 2:37 PM IST टॉप न्यूज़
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एस डी ओझा

साहिर और अमृता प्रीतम का प्यार कालेज के दिनों से शुरू हुआ था । अमृता प्रीतम साहिर के नज्मों की दीवानी थी । साहिर अमृता प्रीतम के घर के सामने सोडा वाॅटर की बोतल थामे घंटों उनके दीदार के लिए खड़े रहते । जब यह बात अमृता प्रीतम के पिता को पता चली तो उन्होंने साहिर को उस कालेज से निकलवा दिया । पिता नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी की शादी शुदा जिंदगी में खलल पड़े । यह किस्सा 1939 का था । इसके पांच साल बाद साहिर और अमृता एक मुशायरे में मिले । इस मुलाकात का जिक्र अमृता प्रीतम ने कुछ इस प्रकार किया था -

मुझे नहीं पता कि ये उसके शब्दों का जादू था या उसकी खामोश नजरों की जंजीर, मैं पूरी तरह से खुद को जकड़ा हुआ पा रही थी. मुशायरा आधी रात तक चला. उस रात बारिश भी झूम-झूम के हुई. आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो ऐसा लगता है जैसे उस रात, नसीब ने प्यार का एक बीज बोया, जिसे बारिश ने पाला "

अमृता प्रीतम दो बच्चों की माँ बन चुकीं थीं । ऐसे में साहिर की तरफ अपने बढ़ते लगाव को देखते हुए अमृता 1960 में अपने पति से अलग हो गयीं । साहिर उनके घर आते । खामोशी से सिगरेट जलाते । आधी पीने के बाद उसे बुझा देते । फिर नई सिगरेट जलाते । दोनों में कोई बात नहीं होती । साहिर के जाने के बाद अमृता उन सिगरेट के टुकड़ों को उठातीं । उन्हें पीतीं । इस तरह से अमृता सिगरेट पीने की आदी हो गयीं । जब अमृता प्रीतम साहिर से मिलने जातीं तो साहिर उनके जूठे कपों को सम्भाल कर रखते जाते । उन्हें धोते नहीं थे । एक बार साहिर लुधियानवी ने अमृता प्रीतम को चीन चलने का आमंत्रण दिया था । उन्होंने कहा था - हम चीन जाएंगे । फिर यहां नहीं आएंगे । वहीं शायरी करेंगे । इस पर अमृता प्रीतम ने कहा था - शायरी तो हम चीन जाए बगैर भी कर सकते हैं

साहिर लुधियानवी ने एक आमंत्रण दिया था , जिसे अमृता ने ठुकरा दिया था । साहिर ने फिर मुम्बई की तरफ रुख कर लिया । वहां जाकर उन्होंने लिखा था -" वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर तोड़ना अच्छा ।" 

फिर भी साहिर लुधियानवी ने अमृता की याद को अपने से अलग नहीं किया । फिल्म कभी कभी की नज्म उनकी याद में हीं लिखी थी शायद -

"कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है 

कि जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूं हीं ।

उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूँ हीं ।

मैं जानता हूँ कि तू गैर है मगर यूँ हीं ।"

अमृता प्रीतम ने भी अपनी एक नज्म में साहिर को याद किया था -  

" तुम मिले, 

तो कई जन्म मेरी नब्ज में धड़के ।

तो मेरी सांसों ने तुम्हारी सांसों का घूंट पिया ,

तब मस्तक में कई काल पलट गये ।"

1958 में अमृता प्रीतम के जीवन में इमरोज आए । इमरोज और अमृता एक छत के नीचे रहते थे , लेकिन उनके कमरे अलग अलग थे । इमरोज एक चित्रकार थे ।इमरोज के साथ रहते हुए भी अमृता प्रीतम ने साहिर लुधियानवी को एक पल के लिए भी नहीं भुला पाईं । वे इमरोज के साथ स्कूटर पर जाते समय उनकी पीठ पर साहिर का नाम उंगली से लिखा करतीं थीं । मैं कह नहीं सकता कि इमरोज कैसा महसूस करते होंगे , पर इस बात से अमृता में जरुर अपराध बोध आता होगा । तभी उन्होंने इमरोज को लेकर एक कविता लिखी थी - मैं तुम्हें फिर मिलूंगी । अंत तक साहिर के लिए हीं अमृता का दिल धड़कता रहा ।

प्रीतम सिंह जो बहुत दिनों तक अमृता के जीवन में नहीं रह पाए थे । अमृता की झोली में दो बच्चों की सौगात डालकर वे उनकी जिंदगी से अलग हो गये थे । वे एक बिजनेस मैन थे । अमृता ने भी उनके नाम को अपने नाम का हिस्सा बना लिया था । वे अमृता कौर से ताजिंदगी अमृता प्रीतम बनी रहीं । जब प्रीतम सिंह बीमार पड़े तो अपने बेटों के कहने पर अमृता उन्हें अपने घर लाईं । उनकी सेवा सुश्रुषा की । प्रीतम सिंह की मौत भी अमृता के हाथों में हुईं थीं । प्रीतम सिंह का भी त्याग कम नहीं है । वे अमृता से बगैर विरोध के अलग हो गये थे । उन्होंने कभी भी अमृता के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की । कभी भी अमृता के बारे में कोई इण्टरव्यू नहीं दिया । अमृता से अलग होने के दिन तक उन्हें इस बात का इल्म नहीं था । सुप्रसिद्ध पंजाबी कथाकार कर्तार सिंह दुग्गल ने अपनी आत्म कथा में लिखा है कि प्रीतम सिंह को अंत तक यह मुगालता था कि अमृता उन्हें बेपनाह मुहब्बत करती है ।

प्रीतम सिंह, साहिर , इमरोज और अमृता मुहब्बत की कहानी के वो किरदार हैं जो मुहब्बत की हद तक गुजरना जानते थे । प्रीतम सिंह और इमरोज ने साहिर और अमृता के प्यार के लिए जो त्याग किया वह बेमिसाल था । हाँ, अमृता हमेशा मन से साहिर की थीं और जीवन पर्यंत उनकी हीं बनीं रहीं । प्यार जो मरकर भी जिंदा रहे वही सच्ची मोहब्बत है । साहिर और अमृता दोनों इस दुनिया में नहीं हैं । फिल्मी दुनिया ने इनके ऊपर फिल्म बनाने का कई बार प्रयास किया है । अभी तक यह सपना अधूरा हीं रहा है ।

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