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अब पाकिस्तान में भी सही इतिहास पढ़ने की ललक जाग रही है....

Bhola Tiwari May 30, 2020, 6:14 AM IST टॉप न्यूज़
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एचडी ओझा

नई दिल्ली  : चच ने "राय घराने " की 184 साल की हुकूमत का ख़ात्मा किया था । चच पहले ब्राह्मण बादशाह थे । उनकी मौत के बाद उनका बेटा चंद्रसेन गद्दी पर बैठा । वह बौद्ध मतावलम्बी था । चंद्रसेन ने बौद्ध भिक्षुओं और पुजारियों के लिए खास रियायतें दीं । दाहिर चच की सबसे छोटी संतान थे । राजा दाहिर जब सत्ता में आए तो उन्होंने भी बौद्धों के साथ उदारता बरती । राजा दाहिर के समय में भी दो गवर्नर बौद्ध धर्म से थे । इसके बावजूद बौद्धों ने राजा दाहिर की कोई मदद नहीं की । बौद्ध भिक्षुओं ने मोहम्मद बिन क़ासिम के हमले के वक़्त निरोनकोट और सिवस्तान में उसका स्वागत किया था ।

मुमताज़ पठान 'तारीख़-ए-सिंध' में लिखते हैं कि राजा दाहिर न्याय प्रिय राजा थे । उस समय तीन तरह की अदालतें थीं, जिन्हें कोलास, सरपनास और गनास कहा जाता था । बड़े मुक़दमे राजा के पास भेजे जाते थे । राजा का निर्णय सर्वमान्य होता था ।

श्रीलंका के राजा ने बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ़ के लिए कुछ तोहफ़े भेजे थे । ये तोहफे दीबल बंदरगाह के क़रीब लूट लिए गए । इन समुद्री जहाज़ों में औरतें भी मौजूद थीं । कुछ लोग फ़रार होकर हुज्जाज के पास पहुंच गए । उन्हें बताया गया कि औरतें आपको मदद के लिए पुकार रही हैं । लूट के लिए राजा दाहिर को जिम्मेदार माना गया । हुज्जाज बिन यूसुफ़ ने राजा दाहिर को पत्र लिखा कि औरतें और लूटे गए माल को वापस किया जाए । राजा दाहिर ने इनकार किया - ये लूटमार उनके इलाक़े में नहीं हुई है ।

सिंध के बुज़ुर्ग क़ौम परस्त रहनुमा जीएम सैय्यद हमले के उस औचित्य को अस्वीकार करते हैं । उन्होंने अपनी किताब 'सिंध के सूरमा' लिखा है कि हो सकता है समुद्री डाकुओं ने लूटमार की हो । राजा दाहिर एक बहादुर लड़ाके थे । वे लूट मार जैसी ओछी हरकत नहीं कर सकते थे । वैसे भी उन्हें इस लूट मार से क्या फायदा था ? ये तोहफे तो बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन युसुफ के थे । राजा दाहिर को दूसरे का तोहफा लेने में कभी कोई रुचि नहीं थी ।

दूसरा कारण था कि ओमान में माविया बिन हारिस अलाफ़ी और उसके भाई मोहम्मद बिन हारिस अलाफ़ी ने ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दिया था । 'चचनामा' के मुताबिक़ मोहम्मद बिन हारिस अलाफ़ी ने अपने साथियों के साथ मकरान में पनाह हासिल कर ली जहां राजा दाहिर की हुकूमत थी । बग़दाद के गवर्नर ने राजा दाहिर को कई पत्र लिखकर बाग़ियों को सुपुर्द करने के लिए कहा । लेकिन राजा दाहिर ने अपनी ज़मीन पर पनाह लेने की बात से इनकार कर गये । 

हालांकि हमले की एक यह भी वजह समझी जाती है , पर यह केवल आरोप था । इसके पहले भी अरबों ने सिंध पर 14 बार हमले किए थे , जो कि अकारण किए गये थे । उनका कोई औचित्य नहीं था । आठवीं सदी में बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ़ के आदेश पर उनके भतीजे और नौजवान सिपहसालार मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर हमला किया । राजा दाहिर को शिकस्त मिली । मोहम्मद विन कासिम ने यहां अपनी हुकूमत क़ायम की । राजा दाहिर को मरवा दिया ।

राजा दाहिर की दो बेटियों को मोहम्मद बिन क़ासिम ने ख़लीफ़ा के पास भेज दिया । राजा दाहिर की बड़ी बेटी का नाम सूर्या था । वह वाक् चातुर्य में बड़ी निपुण थी । उसने ख़लीफ़ा वलीद बिन अब्दुल मालिक को यह समझाने में कामयाब रही कि उसे यहाँ भेजने से पहले मोहम्मद विन कासिम ने उनका सतीत्व हरण कर चुका था । खलीफा बहुत नाराज हुआ । उसने मोहम्मद विन कासिम को एक संदूक में भरकर मंगवाया । जब संदूक खोला गया तो उसमें मोहम्मद विन कासिम मरा हुआ निकला । वह दो दिन पूर्व हीं मर चुका था । राजा दाहिर की मौत का बदला उसकी लड़कियों ने मोहम्मद विन कासिम से ले लिया था।

राजा दाहिर का शासन 

1) पश्चिम में मकरान तक । 

2) दक्षिण में अरब सागर और गुजरात तक ।

3) पूर्व में मौजूदा मालवा के केंद्र और राजपूताने तक । 

4) उत्तर में मुल्तान से गुज़रकर दक्षिणी पंजाब तक ।

सिंध से ज़मीनी और समुद्री व्यापार भी होता था ।

जीएम सैय्यद ने लिखा है कि हर एक सच्चे सिंधी को राजा दाहिर के कारनामे पर फ़ख़्र होना चाहिए क्योंकि वो सिंध के लिए मर मिटे थे । इसके बाद सिंध 340 बरसों तक ग़ैरों की ग़ुलामी में रहा, जब तक सिंध के सोमरा घराने ने हुकूमत हासिल नहीं कर ली । पाकिस्तान के लाहौर में पंजाब प्रांत के पहले पंजाबी शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा लगाई गयी है । उन्हें 'शेर-ए-पंजाब' का खिताब मिला है । अब सिंध सूबे में भी राजा दाहिर को भी सरकारी तौर पर हीरो क़रार देने की मांग होने लगी है ।

इसमें भी दो मत है । कुछ पाकिस्तानी सिंधी राजा दाहिर को अपना नायक मानते हैं तो कुछ लोग मोहम्मद बिन कासिम को । इस वैचारिक बहस ने सिंध में दो बुनियाद डाली है । कुछ धार्मिक रुझान रखने वाले लोगों ने 'मोहम्मद बिन क़ासिम डे' मनाया और कुछ राष्ट्रवादियों ने 'राजा दाहिर दिवस' मनाने की शुरुआत की । पाकिस्तान के राष्ट्रवादी लोगों का कहना है कि जब हम महाराजा रणजीत सिंह को अपना नायक मान सकते हैं तो हमें राजा दाहिर को अपना हीरो मानने में क्या बुराई है ?

पाकिस्तान के राष्ट्रवादी लोगों का कहना है कि हम अब तक मुहम्मद गोरी जैसे आक्रांताओं को अपना हीरो मानते रहें हैं । अब समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को रणजीत सिंह और राजा दाहिर के बारे में बताएं । जो हमारे लिए जिए और हमारे लिए मरे ।

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