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समाजवादी का कम्युनिस्ट होना जरूरी नहीं...

Bhola Tiwari May 29, 2020, 7:23 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

समाजवादी और साम्यवादी को आम तौर पर या कहिए ‘ले-मैन’ शब्दों में एक साथ कह दिया जाता है। गांधी जी की लेखनी में भी यह बात मिलेगी। कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट वह एक साँस में कहते हैं (हिंद स्वराज में भी)। यह ब्रैकेट बनाना उनका निजी सरलीकरण है। जैसे गांधीजी की लेखनी में आदिवासी पर बात न के बराबर मिलेगी। रामचंद्र गुहा के अनुसार गांधी जी संभवत: यह मानते थे कि आदिवासी हिंदू ही हैं, जो जंगल में रहते हैं। यह गांधी के अतिरिक्त भी मान्यता रही है। जबकि मैंने उस काल के गिरमिटियों पर लिखा तो यह स्पष्ट अंतर दिखा कि आदिवासियों को जंगली कह कर उनके इतिहास पर तथ्यपरक डॉक्यूमेंटेशन कम हुआ। मैं भी ख़ास नहीं कर सका। नायपॉल का कहना है कि ट्रिनिडाड में वे मूल अफ्रिकियों से मिल गए। मॉरीशस की बात और है, जिस पर पंकज जी की किताब से कुछ स्पष्ट होता है। 

खैर, मैं फिर से समाजवादी पर लौटता हूँ। समाजवादी का कम्युनिस्ट होना जरूरी नहीं, बल्कि बाद में तो यह स्पष्ट विभाजन ही हो गया। भारत में समाजवादियों की अलग धारा आजादी से पहले से रही है। जेपी, लोहिया, मेहता जी, मधु दंडवते आदि। ये कम्युनिस्टों से बहुत पहले अलग हो गए। इसके कारण पर कुछ बातें मैंने जेपी पर पुस्तिका में लिखी है। 

समाजवादी भी यह मानते रहे हैं कि जमीनों का सरकारीकरण हो, और फिर बराबर विभाजन हो। जातिगत भेद न हो। स्त्रियों का समानाधिकार हो। लेकिन, उनमें धर्म का विरोध स्पष्ट नहीं है। नास्तिक होने की बाध्यता नहीं। बल्कि लोक-मान्यताओं और संस्कृति से उनका खासा लगाव है। जिसमें गाँव-देहात के अंधविश्वास, त्यौहार, लोकगीत, पर्यावरण सभी शामिल हैं। समाजवादी नेता टीका किए, पूजा-पाठ करते या टोपी पहने नमाज पढ़ते मिल जाएँगे।

यह जरूर हुआ कि नेहरू जी के समाजवादी रुझान के चलते कई समाजवादी कांग्रेस में मिलते चले गए। समाजवादी ही क्या, कम्युनिस्ट और दक्षिणपंथी भी उस कांग्रेस में थे ही। बाद में एक छद्म समाजवाद पनपा, जो कांग्रेस के नव-पूँजीवाद और तानाशाही रवैये के ख़िलाफ़ कुछ देर खड़ा हुआ। जितने महीने भी रहा, कोका कोला (और IBM) को धकिया कर भेजने का काम जरूर किया। ऐसे कंफ्यूजन में ये दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों के भी करीब आए, और कम्युनिस्टों के भी। दरअसल उनकी स्थिति केंद्र से इतने करीब थी कि थोड़ा दायें-बायें चलता है। समाजवाद में यह निहित लचीलापन है।

लेकिन, अंतत: समाजवाद दो पाटन के बीच पिस कर रह गया।

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