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कहाँ गईं इन्द्र की परियां

Bhola Tiwari Apr 30, 2019, 7:34 AM IST टॉप न्यूज़
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एसडी ओझा

इन्द्र की परियां बहुत रुपवती व गुणवती थीं । इन्हें इन्द्र ने 108 ऋचाओं की रचना कर प्राप्त किया था । कुल 108 परियों में से रम्भा , उर्वशी , मेनका और तिलोत्तमा प्रमुख थीं । इनमें से उर्वशी नृत्य में बहुत पारंगत थी । एक बार वह पुरुरवा के सामने भी नाची थी । पुरुरवा उसके नृत्य पर मोहित हो गये थे । उर्वशी भी पुरुरवा को देख असहज हो गयी थी । इस क्रम में उर्वशी के नृत्य का लय और ताल बिगड़ गया था । इन्द्र बहुत कुपित हुए । उन्होंने पुरुरवा और उर्वशी को मर्त्य लोक में रहने की सजा दे दी थी । इन दोनों के नौ पुत्र हुए थे । उर्वशी को इन्द्र बहुत चाहते थे । बाद में इन्द्र ने उर्वशी को इन्द्र लोक में बुला लिया था । इसी उर्वशी के शाप के कारण अर्जुन को पूरे साल भर के लिए बृहन्नला बनना पड़ा था ।

रम्भा सभी परियों की प्रभारी थी । इसका जन्म समुद्र मंथन से हुआ था । यह कुछ दिनों के लिए कुबेर के बेटे नलकुबेर के पास भी रही थी । एक बार रावण ने रम्भा का उपहास उड़ाया था । इस बात से कुपित हो नलकुबेर ने रावण को शाप दिया था । शाप था कि जब भी रावण किसी औरत की इच्छा के विरुद्ध गमन करने की चेष्टा करेगा उसकी मौत हो जाएगी । इसलिए रावण ने सीता का अपहरण करने के बाद भी उनसे जबरदस्ती नहीं की । बाद में इन्द्र ने रम्भा को नलकुबेर से अपने नृत्यशाला के लिए मांग लिया था । इसी रम्भा ने इन्द्र के दरबार में अर्जुन की बहुत आवभगत की थी । ज्ञातव्य हो कि अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे । कुंती ने इन्द्र का आह्वान किया था ।

मेनका अप्सराओं में सबसे सुंदर थी । विश्वामित्र के तप से इन्द्रासन डोल उठा था । इन्द्र एक एक कर सभी परियों को विश्वामित्र के पास भेज चुके थे । कोई भी उन्हें तप से विचलित नहीं कर पाया था । आखिर में मेनका की बारी आई । मेनका ने विश्वामित्र को विचलित कर दिया । उनका तप भंग कर दिया । वे तपस्वी से संसारी बन गये थे । विश्वामित्र और मेनका की एक पुत्री हुई थी , जिसे छोड़ मेनका इन्द्र लोक चली गयी थी । इस पुत्री का नाम शकुंतला रखा गया । कण्व ऋषि ने इसे पाला पोषा । कण्व शकुंतला के धर्म पिता थे । इसी शकुंतला की शादी महाराज दुष्यंत से हुई । एक पुत्र उत्पन्न हुआ था , जिसका नाम भरत पड़ा । भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए । उनके नाम पर हीं इस देश का नाम भारत पड़ा ।

कश्यप ऋषि के हीं पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे । बाद के दिनों में हिरण्यकश्यप की वंश परम्परा में निकुम्भ नाम के राजा हुए थे । निकुम्भ की दो संतानें हुईं । सुंद और उसुंद । सुंद और उसुंद ने कठिन तप किया । ब्रह्मा जी प्रकट हुए । सुंद उसुंद ने अमरत्व का वरदान मांगा । ब्रह्मा ने मना कर दिया । मर्त्य लोक में जिसने भी जन्म लिया है , उसे मरना हीं है । अमरत्व का वरदान किसी भी मर्त्य लोकवासी को नहीं मिल सकता था । फिर सुंद और उसुंद ने दूसरा वर मांगा था । वे किसी के भी हाथों नहीं मरें । जब मरना जरुरी हो तो वे एक दूसरे के हीं हाथों हीं मरें । सुंद उसुंद को अपनी भ्रातृता पर गर्व था । वे एक दूसरे को मार हीं नहीं सकते थे । ब्रह्मा ने यह वरदान स्वीकार कर लिया और ब्रह्म लोक चले गये थे । जब उनकी मौत सन्निकट आई तो इन्द्र ने अप्सरा तिलोत्तमा को उनके पास भेजा । तिलोत्तमा ने शर्त रखी । जो युद्ध में विजयी होगा वह उसकी होगी और सुंद उसुंद तिलोत्तमा को पाने के लिए आपस में हीं लड़ मरे थे ।

इन्द्र किसी एक देव का नाम नहीं था । यह एक पदवी थी । अब तक 14 इन्द्र इस पद पर रह चुके हैं । जब भी धरा पर कोई तपस्वी तप करता था । इन्द्र इन अप्सराओं के माध्यम से उनका तप भंग करवा देते थे और निर्विघ्न एक छत्र राज्य करते थे । पता नहीं आजकल इस पद पर कौन आरुढ़ हुआ है । इन्द्र लोक से मर्त्य लोक का सम्पर्क टूट चुका है । इन्द्र लोक की अप्सराओं के बारे में भी कुछ पता नहीं चल रहा है । वे आजकल क्या कर रहीं हैं ? हो सकता है कि आज के इन्द्र ने उन्हें निकाल बाहर किया हो । क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं रह गया था। अब कोई इस धरा पर तप नहीं करता । तप की तो बात हीं छोड़िए । कोई आधे घंटे का योग और ध्यान भी नहीं करता । अब तप बल से इन्द्रासन डांवाडोल नहीं होता । इसलिए " काम नहीं तो दाम नहीं " ( No work , No Pay ) की तर्ज पर इन्द्र ने उनकी हमेशा के लिए छुट्टी कर दी होगी ।

जो भी हो , इन्द्रलोक की परियां आज भी प्रासांगिक हैं । आज भी हम किसी सुंदर स्त्री की तुलना इन्द्र की परी से करते हैं । जब कोई लड़का कई बार कई लड़कियों को अस्वीकार कर देता है तो व्यंग्य में कहा जाता है कि तुम्हें तो इन्द्र की परी चाहिए । किसी लड़की को यह कहकर ताना मारा जाता है कि तुम कोई इन्द्र की परी नहीं हो कि लड़के तुम पर मर मिटने को तैयार हो जाएंगे । सही है हर कोई सुंद उसुंद नहीं बन सकता । लेकिन इन्द्र का अस्तित्व आज भी कायम है । वे बादल और बारिश के देवता आज भी हैं । उनके शस्त्र बज्र के कारण आज भी बिजली चमकती है, बादलों में घर्षण होता है , गर्जन होता है । छप्पनों कोट बारिश होती है । हमारी यह धरती शस्य श्यामला बन जाती है । अन्न से परिपूर्ण हो जाती है ।

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