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डोकलाम विवाद -2017

Bhola Tiwari Apr 30, 2019, 7:26 AM IST टॉप न्यूज़
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एसडी ओझा

भारत और भूटान का द्विपक्षीय सम्बंध अंग्रेजी राज्य के समय से हीं चल रहा है । 1910 में भारत के अंग्रेज शासकों और भूटान के हुक्मरानों के बीच एक संधि हुई थी, जिसे पुनखा संधि कहते हैं । उस दौर से आज तक भारत और भूटान के बीच खुली सीमा है । दोनों देश के लोग एक दूसरे के यहां बेरोक टोक आ जा रहे हैं । जब देश आजाद हुआ तो दोनों देशों के बीच की यह दोस्ती और मजबूत हुई । भारत ने भूटान का संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश का समर्थन किया । इसी वजह से भूटान को संयुक्त राष्ट्र संघ से विशेष सहायता पैकेज भी मिलता है । भारत भूटान की सम्प्रभुता की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है । दोनों देशों ने 1949 में दार्जलिंग में शांति और मित्रता सम्बंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे । इसी से आगे बढ़कर दोनों देशों ने 1971 में आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य सम्बंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

भारत, चीन और भूटान की सीमाएँ डोकलाम में मिलतीं हैं । इसे ट्राई जंक्शन क्षेत्र कहते हैं । डोकलाम के चुम्बी इलाके पर चीन अपना दावा करता है । इस दावे को और मजबूत करने के लिए चीन ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण परियोजना शुरू कर दी थी । दरअसल चीन 495 वर्ग किलोमीटर पूर्व की जमीन के एवज में भूटान से केवल 286 वर्ग किलोमीटर पश्चिम की जमीन पर अपना हक मांग रहा है । इसी 286 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में डोकलाम आता है । गौरतलब है कि डोकलाम को भूटान सामरिक महत्व का क्षेत्र मानता है । यदि चीनी सैनिक डोकलाम की ऊंची चोटियों पर काबिज हो जाते हैं तो हा , पारो और थिम्पू घाटियां भी उनके मार के इलाके में आ जाएंगी । चीन थिम्पू से फुएंतशोलिंग शहर को जोड़ने वाली सड़क को भी नुकसान पहुंचा सकता है । इसी सड़क के मार्फत भारत से भूटान को खाद्यान्न और अन्य वस्तुओं की खपत होती है । इसलिए भूटान ने चीन के इस सड़क प्रोजेक्ट का फौरी तौर पर विरोध किया ।

भारत भी चुप नहीं बैठा । उसने 300 सैनिकों के दल और बुलडोजर के साथ डोकलाम में डेरा डाल दिया । चीनी मीडिया ने इसे भारत के अतिक्रमण के तौर पर देखा , जबकि अमेरिका और जापान ने इसे चीन के साम्राज्य वादी सोच का नतीजा बताया । रुस ने भी भारत और चीन को शांति पूर्ण तरीके इस मुद्दे को हल करने का सुझाव दिया । दरअसल भारत का विरोध जायज था । डोकलाम में सड़क बनाने के बाद चीन को कमाण्डिंग पोजीसन मिल जाती । डोकलाम एक पठार है , जिसे चीन और भूटान अपना क्षेत्र मानते हैं । भारत के सिक्किम का इलाका भी डोकलाम से लगता है । इस तरह से डोकलाम में चीन की पहुँच होने से भारत की अस्मिता भी खतरे में पड़ जाती । 18 जून 2017 को भारत के डोकलाम पहुँचने से भारत और चीन के बीच तनातनी शुरू हो गयी । यह तनातनी एक विचारणीय समय 73 दिनों की अवधि तक चली । भारत ने हर तरह से संयम का परिचय दिया । इस संयम का नतीजा निकला । ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कुछ दिनों पहले 28 अगस्त 2017 को भारत और चीन आपसी रजामंदी से अपनी अपनी सेनाएं वापस करने पर राजी हो गये । इसी तनातनी के बीच चीन ने युद्धाभ्यास भी किया था ।

दोनों सेनाओं के पीछे हटने के बाद लगा था कि इस क्षेत्र में स्थाई शांति हो जाएगी, पर चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया । डोकलाम के पास चीन फिर भारी सैनिक जमावाड़ा करने लगा है । उसके पास 500 सैनिकों की नफरी है । वह फिर सड़क निर्माण करने को उतारु है । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर भारत चीन युद्ध होने की सम्भावना है ? इसका उत्तर है " नहीं ।" हां , कोई युद्ध नहीं होगा । चीन को समझ आ चुकी है कि अब भारत 1962 वाला नहीं रहा । युद्ध किसी भी स्थिति में चीन के लिए लाभदायक नहीं होगा । चीन उस कुत्ते की तरह है जो भौंकता तो है , पर साथ में कदम भी पीछे हटाता है । चीन की विचारधारा तुरत फुरत भारत पर हाॅबी होने की है । इसलिए वह भय का वातावरण तैयार कर रहा है । वह कुत्ते के समान टांग न पकड़ टांग में पहनी पतलून को पकड़ रहा है ।

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