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हिन्दू बहुल चार जिले पाक को

Bhola Tiwari May 27, 2020, 6:58 AM IST कॉलमलिस्ट
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डॉ सुशील उपाध्याय

देहरादून  : इतिहास कभी उतना सीधा नहीं होता जितने सीधे ढंग से हम उसे समझने की कोशिश करते हैं। इतिहास के निर्माण की प्रक्रिया में इतने सारे 'किंतु-परंतु' लगे होते हैं कि उन्हें सुलझाने लगे तो फिर खुद उलझ कर रह जाते हैं। भारत का विभाजन आज भी अपने गर्भ में इतने सारे सवालों को समेटे हुए हैं कि सक्षम लोग उनका उत्तर देते-देते थक गए, लेकिन कोई सर्वमान्य उत्तर आज भी प्राप्त नहीं हो सका है।

इतिहास की इन घटनाओं के पात्र भी अब दुनिया में नहीं है, लेकिन वह इतिहास जरूर मौजूद है जिसकी निर्मिती चाहे-अनचाहे उनके द्वारा हुई है। जब हम सोचते हैं कि किसी व्यक्ति को सबक सिखा रहे हैं तो वस्तुतः हम खुद भी उस दायरे से बाहर नहीं होते। इस विमर्श में प्रश्न यह है कि वे जिले किस आधार पर पाकिस्तान को सौंप दिए गए थे जिनमें हिंदू आबादी 50 फीसद से अधिक थी। ऐसे ही 4 जिलों पर अप्रैल, 2015 में बीबीसी ने एक छोटी सी रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट से उस दौर की दुरभिसन्धियों का भी पता चलती हैं। इसे पढ़कर ऐसा कह सकते हैं कि विभाजन की प्रक्रिया के वक्त छोटे-छोटे निहित स्वार्थ किस तरह से महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित कर रहे थे। बीबीसी ने लिखा,

"विभाजन की योजना के तहत इस पर सहमति बनी कि जिन इलाकों में हिंदुओं की आबादी 51 फ़ीसदी से अधिक है उसे भारत में रखा जाए और जहां मुस्लिम 51 फ़ीसदी से अधिक है उन्हें पाकिस्तान को दे दिया जाए.

जिन चार ज़िलों- जस्सोर, खुलना, बोरीसाल और फरीदपुर- से गांधी और कांग्रेस की इच्छा के विरुद्ध आंबेडकर संविधान सभा के लिए चुने गए वहां हिंदुओं की आबादी 71 फीसदी थी.

मतलब, इन सभी चार ज़िलों को भारत में रखा जाना चाहिए था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने शायद आंबेडकर के पक्ष में वोट देने की सामूहिक सज़ा के तौर पर इन सभी चार ज़िलों को पाकिस्तान को दे दिया.

इसके परिणामस्वरूप आंबेडकर पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बन गए और भारतीय संविधान सभा की उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई. पाकिस्तान बनने के साथ ही बंगाल अब विभाजित हो गया था और संविधान सभा के लिए पश्चिम बंगाल में नए चुनाव किए जाने थे.

जब यह स्पष्ट हो गया कि आंबेडकर अब संविधान सभा में नहीं रह सकते तब उन्होंने सार्वजनिक स्टैंड लिया कि वो संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाएंगे. इसके बाद ही कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें जगह देने का फ़ैसला किया."

और यह मामला केवल पूर्वी पाकिस्तान के इन जिलों तक सीमित नहीं था, बल्कि इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को पता होगा कि सिंध में भी थारपरकर जिला हिंदू बहुल था। वहां दलितों की आबादी आज भी बहुसंख्या में है। भारत विभाजन के उस दौर में ऐसा लग रहा था कि हर कोई न केवल पुराने बदले भांझ रहा था, बल्कि मनुष्यों और मनुष्यता को दरकिनार करके अपने छिपे हुए हित साध रहा था। उस वक्त जगहों और स्थानों की लूट मची हुई थी। इस लूट में जिसके हाथ जो आ रहा था, वह उसी को समेट रहा था। इसी का प्रमाण है कि जूनागढ़ का नवाब उस हिन्दू इलाके को पाकिस्तान में ले जाने को तैयार बैठा था। खैर, इतिहास को पढ़ने और उससे सबक सीखने में कोई बुराई नहीं है

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