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कोविड़ 19 एक महामारी : कामगारों का पलायन एक साजिश तो नहीं

Bhola Tiwari May 26, 2020, 11:15 AM IST कॉलमलिस्ट
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निशिकांत ठाकुर 

नई दिल्ली : कोविड 19 पर कई लेख लिखे और इस महामारी पर कई लेखों को पढ़ने का अवसर भी मिला । सरकार की घोषणाओं पर भी बहुत कुछ सोचा , लेकिन सच में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण और भयावह स्थिति क्यों आई इस पर जब जब सोचता हूं उतना ही उलझता जाता हूं । बहुत से विचारकों से समझने का भी प्रयास किया , लेकिन किसी ने भी सफगोई से नहीं कहा कि यह इतनी जल्दी विश्व को अपनी चपेट में कैसे ले लिया ? खैर ....। हां, तथाकथित रूप से अब जब इसके जाने का दिन निकट आया तो इस पर तरह तरह के खोज किए जा रहे हैं । किसकी खोज किसके अनुसंधान में इसका सच निकलेगा यह तो कोई जानता नहीं , लेकिन इतनी बात तो साफ है कि कोई ना कोई मानवीय भूल तो हुई है जिसके कारण आज विश्व में लाखों लोगो के जान पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं । ऐसी क्या बात हो गई की आज विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र सबसे अधिक अपने नागरिकों को मौत के मुंह में धकेल चुका है और लाखों गंभीर संक्रमण से ग्रसित है । स्वयं अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि यदि कुछ लाख की मृत्यु के बाद भी हम इससे उबर सकें तो यह हमारी उपलब्धि होगी । विश्व के अन्य देशों ने भी जी जान लगाकर अपने नागरिकों जीवित रखने के प्रयास किया है । रही हिंदुस्तान की बात तो निश्चित रूप से अपने नागरिकों की रक्षा के लिए सरकार ने कुछ देर से ही सही ,लेकिन सही कदम उठाकर अपने नागरिकों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया है । वैसे विपदा का अंत अभी तक खत्म नहीं हुआ है, लेकिन फिर प्रयास तो सही किया ही गया है । चीन के बाद विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश हिंदुस्तान इतनी बड़ी महामारी से इतनी जल्द निजात पा लेगा यह सोचना भी असंभव लगता था , लेकिन सामूहिक रूप से सरकार द्वारा लिया गया एक कठोर प्रयास सराहनीय रहा है । जिसने भी कठोर नियम का पालन किया वह आज सुरक्षित हैं जिसने यह सोचा कि यह महामारी उनके लिए नहीं है वह काल के गाल में समाते चले गए ।

मुंबई सहित कई शहरों में दूसरे राज्यो से आए कामगारों को भगाने के लिए कई अभियान चलाए गए । यह अभियान इस प्रकार के होते थे जिसमे मारपीट , तोड़फोड़ , आगजनी की घटनाएं आम होती रहती थी, लेकिन रोज़ी रोटी के कारण सभी अपमानों को सहते हुए कामगार ईमानदारी से मज़दूरी करके अपना जीवन यापन किया करते थे । जो राज्य बार बार अपने शहर और राज्यवार इन कामगारों को मारपीट करके अपमानित करके राज्य से बाहर खदेड़ना चाहते थे उनमें दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक ,गुजरात मुख्य है । इन राज्यो के नेताओ का मत था कि इन्हीं प्रवासी कामगार मजदूरों के कारण ही उनके यहां के स्थानीय लोगों को रोज़गार नहीं मिलता है । कई बार तो इन राज्यो में बाहर से काम करने के लिए आने वाले कामगार मजदूर पलायन कर जाते थे , लेकिन जब स्थिति ठीक और जब सब कुछ शांत होता था तब लगी लगाई रोज़ी रोटी के लिए वहां फिर कामगार मजदूर वापस आकर अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करते थे । बाहरी राज्यो से आए इन कामगारों के प्रति इतनी नफरत और क्रोध वहां के नेता अपने दिल में पाले होते थे कि बार बार उन्हें उन राज्यो से भगाना एक लक्ष्य बन गया था । लेकिन, यह उन नेताओं का दुर्भाग्य कहिए की उन कामगार मजदूरों को भगाने में सफल नहीं होते थे। लेकिन , इस बार कोविड 19 ने उन सभी षड़यंत्रकारी नेताओं की मंशा को पूरा कर दिया जिनके लिए वह वर्षों से बेहाल और परेशान थे वह उनकी मंशा पूरी हो गई ।

सच में सोचिए शायद इतनी बड़ी सोची समझी राजनैतिक साजिश की गई की बिना संभलने का मौका दिए चार घंटे के अंदर लॉक डाउन की घोषणा कर दी गई । अब जिन्हें अपने परिवार का भरण पोषण सुबह ही करना है उनको यह अवसर दिया ही नहीं गया की वह अपने जीविकोपार्जन के लिए कुछ व्यवस्था कर ले । अब रही केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों की बात । वायदे तो बहुत खूब किए गए ,लेकिन भोजन के नाम पर दो सौ ग्राम खिचड़ी देकर परिवार के पांच लोगों को खाने कहा गया । अब कोई कब तक पड़ोस से मांग कर अपना तथा अपने परिवार की भूख को शांत कर सकता है । उन्हें केवल एक रास्ता है दिखाई दिया जो वहां से पलायन का था कि किसी तरह वह अपने गांव अपने परिजनों के पास पहुंच जाए ।इसलिए तो हजारों किलोमीटर की यात्रा अपने बच्चों सहित जान जोखिम में डालकर करना शुरू किया । रास्ते में किन किन कठिनाइयों का उन्हें सामना करना पड़ा है इसे तो सबने टेलीविज़न के माध्यम से अथवा समाचार पत्रों के माध्यम से देखा है इसलिए उसपर कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं । यह भी एक संयोग कहिए या साजिश का पटाक्षेप की जैसे जैसे कामगार मरते - भागते अपने घर के पास पहुंचे केंद्रीय सरकार सहित लगभग सभी राज्य सरकारों ने उनके लिए पलक फावड़े बिछाने लगे । कोई बस लेकर दौड़ा कोई ट्रक लेकर और रेल मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि वे सभी जिलों के श्रमिकों के लिए विशेष ट्रेन चलाने को तैयार है ।

 वाह रे सरकार की नीति और नियति साप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी । केवल बिहार ही ऐसा राज्य था जिसका मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो अपने राज्य में सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते है , मजदूरों को अपने राज्य ,अपने घर आने से मना किया । ऐसा इसलिए शायद उन्होंने किया होगा क्योंकि वह जानते है कि सबसे अधिक पलायन और अपमानित उनके ही राज्य के कामगार ही होते है और जब वह वापस अपने गृह राज्य में आ जायेगे तो उनकी पोल खुल जाएगी । ऐसा इसलिए क्योंकि उनके राज्य में जीविकोपार्जन के लिए कोई साधन है ही नहीं और ना ही उन्होंने अपने शासन काल में इसे विकसित ही किया है । फिर ऐसी स्थिति में जब उनके राज्य में निकट भविष्य में चुनाव है तो उनकी क्या दशा होगी । आज महाराष्ट्र , गुजरात, कर्नाटक , पंजाब, हरियाणा, दिल्ली खाली हो गया है । देखना यह होगा पूरी तरह सब कुछ सामान्य होने के बाद यह दिहाड़ी कामगार मजदूर फिर से वापस आते हैं या भाग्य भरोसे अपने को उसी राज्य में जीने मारने के लिए छोड़ देते है जहां वह वापस अपने परिवार के पास पहुंच गए हैं । यदि कोई राज्य उन्हें वापस बुलाता है तो राज्य खाली कराने की इस साजिश का कोई अर्थ नहीं रह जाता । यदि ऐसा नहीं होता है तो निश्चित रूप से कहा जाएगा कि यह एक साजिश के तहत अपने राज्य से प्रवासी कामगार मजदूरों को बाहर निकालने में सफल हो गए । ठीक है कम से कम इसी बहाने से स्थानीय कामगारों को तो अपने राज्य में काम तो मिलेगा रोज़गार तो मिलेगा वह अपने घर में अपने परिवार के साथ तो रहेंगे । ऐसी स्थिति में सबसे प्रभावित बिहार और उत्तर प्रदेश होगा । उत्तर प्रदेश तो अपने राज्य में वापस आए कामगारों को मनरेगा के तहत काम देना तो शुरू कर दिया है, लेकिन बिहार और बिहार के मुख्यमंत्री, सुशासन बाबू का क्या होगा ।

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