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सिर्फ विरोध से विकास का रास्ता नहीं बनता....

Bhola Tiwari May 24, 2020, 7:57 AM IST टॉप न्यूज़
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उमानाथ लाल दास

पटना। : विरोध जब (सार्वजनिक) हित को भूल जाता है तो वह सबसे पहले अपने अटैचमेंट्स से छिटक जाता है और अंततः बेजमीन हो जाता है। 

यह तथ्य हर उस किसी के लिए लागू है जिसका एजेंडा विकासमूलक रचनात्मक परिवर्तन न होकर सत्ता परिवर्तन हो। और इसके लिए वह विरोध की राजनीति करते-करते भूल जाते हैं कि विरोध नफरत और हिंसा में बदलकर उन्हें जनविरोधी कर देता है। संविधान में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विशेषण जोड़नेवाली कांग्रेस पर इतराने वाले सबसे बड़ी गलती करते यह भूलकर कि यह सब कांग्रेस संविधान को अपनी चाबी से चलनेवाला खिलौना बनाने के मकसद से करती है (जितनी चाबी भरी राम ने ...) और स्वर्ण स़िह समिति की अनुशंसाओं को देश पर लादने के लिए 42 वें संशोधन के नाम पर मिनी संविधान ही खड़ा कर देती है। और यह सब एक तानाशाही एजेंडे के तहत हुआ था जो आपातकाल के रूप में दिखा। ये लक्षण बहुत पहले इंदिरा पति फिरोज ने देख लिए थे। इसीलिए वे बाप-बेटी को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। इसी कांग्रेस के विरोध में खड़ी दिखती भाजपा ने अंततः खुद को उसका विकल्प ही साबित किया। विरोध तो करती थी भाजपा, पर विकास का कोई रचनात्मक एजेंडा लेकर नहीं चलने के कारण, अंततः वह उसीके एजेंडा को आगे बढ़ाती रही। चाहे उदारीकरण को सशक्त करने के लिए विनिवेश मंत्रालय खोलना, नरेगा मनरेगा, आधार, जविप्र आदि उसी विकलांगता के उदाहरण हैं। लेकिन राजनीतिक विरोध का सत्व यदि विकास और शासन में प्रवेश करेगा तो वह जनविरोधी हो उठेगा। कश्मीर मामले में बेशक उसे जो जनसमर्थन मिला उसीसे उत्साहित होकर उसने नागरिकता कानून मे उस एजेंडा को आगे बढ़ाया ओर फूटपरस्तों की पोल खुलकर सामने आ गयी। चाहे अंबेडकरवादी हों या वामी या उर्दू अदीब मुनव्वर, राहत, जावेद सबकी परतें उघड़ गयीं। यहां तक विकास बाधित होने की बात नहीं। नाराजगी से गतिरोध होना अलग बात है। इन सभी अभियानों के निहित राजनीतिक आशय कांग्रेस विरोध पर टिका है और बहुसंख्यकों को चिढ़ाती कांग्रेसी राजनीति से पीड़ित देश में राष्ट्रीय प्रश्नों से जोड़कर सौ फीसद सही ठहाराया जा सकता है। पर इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस का विरोध जनविरोध में बदल जांने के बाद भी देश भाजपा को सर आंखों पर रखेगा। कांग्रेस के विरोध की तो यह पराकाष्ठा ही है कि उसने यदि कोयला उद्योग और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो आप इसका निजीकरण कर दें। याद रहे भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयकरण का उल्टा निजीकरण नहीं, अराष्ट्रीयकरण है। मीडिया ट्यूनर मोदी से आक्रांत लोग वोकल फॉर लोकल पर क्यूं इतराते हैं, जबकि आत्मनिर्भरता एक क्रूर शासन मूल्य हो चुका हो। दर असल यह वोकल फॉर लोकल नहीं, यह भूमंडलीकरण का देसी वर्सन है। भूमंडलीकरण की थीम ही है थिंक ग्लोबल, एक्ट लोकल। मेड इन इंडिया का लोगो तक जिसने विदेश में तैयार करवाये हों और एफडीआई को सर्वग्रासी बनाने पर तुला शासन वोकल फॉर लोकल से सिर्फ हमको आपको चिढ़ाया जा रहा। उसने कैप्टिव माइंस की इजाजत दी तो आप कॉमर्शियल माइनिंग का रास्ता साफ कर दें। हाल तो यह हो गया कि संशोधन-परिवर्तन विवेकशून्यता में तिरोहित हो जाता है और मानवाधिकारों की अनदेखी करते हुए श्रमिकों के काम के घंटे आठ से बारह घंटे करने पर यह सरकार अड़ गयी। काम के घंटे को लेकर पूंजीवादी अमरीकी शासन को हिला देनेवाले हे मार्केट के 1886 के आंदोलन का बदला भारत की जमीन पर लिया जाएगा, इसकी कल्पना तो संघ के शिल्पकारों तक ने न की होगी। आइंस्टाइन ने चौथे दशक में अपनी किताब आयडियाज एंड ओपिनियंस में जिक्र किया था कि बेरोजगारी से लड़ने के लिए कआम के घंटे को कम कर दूसरों के लिए रोजगार पैदा किया जा सकता है। आप चीन-जापान का माहौल कैसे पैदा कर सकते हैं शिक्षा-संस्कृति से बने उसके माहौल से नफरत करके। जीने का समय हड़पने वाले शासन में वेतन कटौतियां आम हो गयीं। देखादेखी पंजाब सरकार ने तो वेतनवृद्धि तक वापस ले ली। आप आपने फैसले से जनता में सिर्फ झुंझलाहट और झल्लाहट ही पैदा नहीं कर रहे, सरकार के विरोध में खड़ी होती यह जनता आपके जनहितैषी कार्यक्रम और फैसलों को भी संदेह की नजरों से देखने लगी है। ऐसी झल्लाई हुई जनता से आप राष्ट्रीय हित के प्रश्नों पर साथ नहीं पा सकते। पीएम रिलीफ फंड में कॉरपोरेट योगदान के अपने आशय हैं, पर सरकारी प्रतिष्ठानों के कर्मी इसमें अंशदान देने को स्वेच्छया तैयार नहीं। कोल इंडिया, रेलवे और डीवीसी के कर्मी इस राहत कोष में अपने एक दिन का वेतन तक नहीं देना चाहते। ऑप्शन दिये जाने पर सभी इनकार का फॉर्म भर देते हैं। 

तो कांग्रेस का विरोध विवेकशून्य होकर अब जनविरोधी हो उठा है। सारे फैसले पलटेंगे तो देश भी तो पलटेगा। और देश कोई छोटी मोटी स्थलाकृति नहीं कि उसे काट छांटकर उलट दें। देश को उलटने में लगे लोगों को किसी भी देश की जनता ने नहीं स्वीकारा है। ईसा पूर्व ईरानी हखामनी साम्राज्य से लेकर सारे साम्राज्य तहस नहस कर दिये गये, भले देश टुकड़ों में छिन्न भिन्न हो गया। यह शासन इतिहास के सबक को भूल रहा है...

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