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'बनिया सामाजिक तस्कर, उस पर वरदहस्त ब्राह्मणों का'

Bhola Tiwari May 23, 2020, 8:36 AM IST टॉप न्यूज़
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राजीव मित्तल

नई दिल्ली  : प्रख्यात बहुजन लेखक कांचा आयलैया की तीन किताबों में हम बफैलो नेशनलिज़्म को देख चुके हैं..अपनी दूसरी किताब पोस्ट हिन्दू इंडिया’ में वो क्या कहते हैं.. देखें..

उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में, जो 30 सितम्बर 2017 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था, उसमें उन्होंने अपनी किताब ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ के बारे में विस्तार से चर्चा की है.. यह किताब 2009 में प्रकाशित हुई थी.. एक छोटे प्रकाशक ने इसका तेलगु अनुवाद कराकर प्रत्येक अध्याय को अलग-अलग पुस्तिकाओं में छाप दिया..इसका पहला अध्याय आदिवासी लोगों पर है, जिसका नाम है ‘अवैतनिक शिक्षक’.. दूसरा अध्याय चमारों पर है, जिसका नाम उन्होंने ‘हाशिये के वैज्ञानिक’ रखा है..तीसरा अध्याय महारों पर है, जिसका नाम ‘उत्पादक सैनिक’ है। उसके बाद का अध्याय धोबी समुदाय पर है, जिसका नाम ‘उपेक्षित नारीवादी’ है..एक अध्याय नाइयों पर है, जिसका नाम ‘सामाजिक चिकित्सक’ है..इसके बाद एक अध्याय लुहारों, सुनारों और कुम्हारों पर है, जिसका नाम ‘अज्ञात इंजीनियर’ है.. इसी तरह एक अन्य अध्याय ‘दुग्ध और मांस अर्थव्यवस्था’ पर है, तो एक ‘खाद्य उत्पादक’ जाट, गूजरों और कप्पुओं पर है.. 

अंतिम अध्याय उन्होंने वैश्य समुदाय पर लिखा है, जिसका नाम ‘सामाजिक तस्कर’ है.. सारा विवाद इसी ‘सामाजिक तस्कर’ अध्याय पर है, जिसे तेलगु प्रकाशक ने तेलगु में अलग पुस्तिका में छापा है. इसी ‘सामाजिक तस्कर’ को पढ़कर वैश्य समुदाय ने कांचा आयलैया का लगातार विरोध किया था.. ‘सामाजिक तस्कर’ में कांचा आयलैया ने क्या स्थापित किया है, इसे उन्होंने अपने इंटरव्यू में स्पष्ट किया है. 

वह कहते हैं, “उत्तर-गुप्त काल से ही सारा व्यापार वर्णव्यवस्था के द्वारा वैश्यों के लिए सुरक्षित हो गया था.. और वे वस्तुओं की खरीद-फरोख्त में लोगों के साथ धोखा करते थे.. इतिहास बताता है कि वे अपने धन को जमीन में दबा कर रखते थे, जिसे वे ‘गुप्त धन’ कहते थे..वे उस धन को वापस कृषि उत्पादन के कार्यों में कभी व्यय नहीं करते थे..इस संस्कृति में परोपकार की भी कोई अवधारणा नहीं है.. दूसरी जातियों के साथ अन्तर्विवाह की भी अवधारणा भी इसमें नहीं है.. वे त्योहारों पर भी मिलते-जुलते नहीं हैं.. वे लगभग हर किसी को अछूत समझते हैं.. यही संस्कृति उच्चतम स्तर पर चली गई है..

आज भारतीय व्यापार की 46 प्रतिशत पूंजी इसी बनिया समुदाय के हाथों में है.. इस तरह ‘सामाजिक तस्कर’ पर यह छोटा सा अध्याय बताता है कि किस तरह तस्करी करके राष्ट्र की पूंजी को अवैध रूप से उसकी सीमाओं के बाहर ले जाया जा रहा है.. सामाजिक तस्करी तब होती है, जब धन देश के भीतर रहता है..लेकिन यह मनु के धर्मशास्त्र के अनुसार निर्धारित की गई एक ही जाति तक सीमित है, इसलिए वे कोई निवेश नहीं करते, सिर्फ जमाखोरी करते हैं और यह जमाखोरी किसी सामाजिक कार्य में व्यय नहीं होती है।”

कांचा आयलैया ने यह भी साबित किया है कि अडाणी और अंबानी ने आज जितनी पूंजी बनाई है, वह किसी भी सामाजिक उत्तरदायित्व की संस्कृति से नहीं जुड़ी हुई है.. वह न किसी मानवीय सहानुभूति के काम में व्यय हुई है और न उसने कोई मानवीय हितों का कोष स्थापित किया है.. एक जाति के द्वारा किए जाने वाले व्यापार ने भारत में किसी भी व्यापारिक पूंजी का विकास स्वीकार नहीं किया है, मध्यकाल से ही वह किसी भी स्वदेशी उद्योग के विकास का पक्षधर नहीं रहा है.. 

बनिया-ब्राह्मण नेटवर्क के कारण ही सोने के विशाल भंडार को मंदिरों में रखा गया था..इस तरह धन को दूर छिपाया गया था..परिणामत: देशी उद्योग-धंधों का विकास नहीं हुआ.. आज भी यही स्थिति बनी हुई है.. यही कारण है कि वे निजी क्षेत्र में आरक्षण देने से मना कर देते हैं, और सरकारी क्षेत्र में नौकरियां नहीं हैं.. इसलिए कांचा आयलैया का कहना है कि वैश्य ‘सामाजिक तस्कर’ हैं, और मनु के धर्मशास्त्र के अंतर्गत ब्राह्मणों ने उनके लिए किले बनाए हुए हैं, जिसे ‘आध्यात्मिक फासीवाद’ कहा जाता है.. 

इसी इंटरव्यू में वह याद दिलाते हैं, “आज भी 46 प्रतिशत पूंजी बनियों के हाथों में है..नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, निजी क्षेत्र पर फोकस और भी बढ़ गया है..यदि वे अब भी सामाजिक उत्तरदायित्वों को नहीं निभाते हैं, तो किसानों की आत्महत्याएं नहीं रुक सकतीं।” कंवल भारती..कॉपी संपादन – एफपी डेस्क)

कांचा आयलैया (जन्म 5 अक्टूबर 1952) एक भारतीय अकदमीशियन (तेलगू), लेखक और दलित अधिकारों के कार्यकर्ता हैं..

विभिन्न सामाजिक मुद्दों, खास कर बिहार के अकाल व बाढ़ को लेकर अपनी खोज परक लेखन के लिए विख्यात Dineshmishra की कांचा से एक अच्छी मुलाकात..मिश्र जी उनके बारे में कहते हैं..

---बहुत सुलझे हुए और अपने विचारों के लिए प्रतिबद्ध है। हम लोगों की दिक्कत यह है कि हम लोग उम्र के इस पड़ाव पर अपने विचारों को लेकर stagnate कर जाते हैं और उसी stagnation का महिमा मंडन करने लगते हैं। जब कोई पुरानी संस्कृति, पुरानी मान्यताओं का बखान करते हैं और दूसरा पक्ष यह सवाल करता है कि उसी संस्कृति की बात कर रहे हैं जिसने हमें इतने वर्षों से गुलाम बना कर रखा था तब हम लोग बगलें झांकने लगते हैं। इस सवाल से सामना बचपन से ही होना चाहिए। विचार परिपक्व हो जाने पर मुश्किल होता है। हम लोग इसी दौर से गुजर रहे हैं। फिलहाल ऐसा कोई सुधारवादी अहिंसक आन्दोलन होता दिखाई नहीं पड़ता। 

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