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सूरत में भी एक महामारी फैली थी...

Bhola Tiwari May 22, 2020, 10:22 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली  : 1994 में सूरत में एक महीने के लिए कामकाज ठप पड़ गया था । देश को काफी आर्थिक नुकसान पहुँचा था । कुछ लोगों का मानना था कि यह महामारी प्लेग थी । 21 सितंबर 1994 में शहर में एक मौत हुई । मरने वाले में न्यूमोनिक प्लेग के लक्षण थे । उसी दिन शाम तक सूरत के वेड रोड रिहाइशी इलाक़े में 10 मौतें और हो गयीं । फिर तो न्यूमोनिक प्लेग के लक्षणों के साथ लगभग 50 और मरीज अस्पतालों में भर्ती हो गये ।

शहर में हड़कम्प मच गया । पूरा प्रशासन सक्रिय हो गया । अखबारों में खबरें छप गयीं । 20 - 25 सितम्बर के बीच इस रोग के 460 नये केस आ गये । कुल मरीज 1061 हो गये । यह बीमारी विकराल रुप धारण करने लगी । इससे देश हीं नहीं पूरा विश्व सहम गया । लोग रातों रात शहर छोड़कर भागने लगे । सूरत की लगभग 25 फीसदी आबादी शहर छोड़ गई । लोग ट्रेन बस और अपने व्यक्तिगत वाहनों से भाग रहे थे ।

सूरत कामगार विहीन हो गया । मज़दूर महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और बिहार आदि राज्यों के थे । इन कामगारों के सूरत छोड़ देने से पूरे देश में इस महामारी फैलने की आशंका हो गयी । पूरे देश में प्लेग के कुल 6334 संभावित मामले दर्ज़ हुए । इनमें 55 लोगों की मौत हुई । विभिन्न जांच केंद्रों में 288 इस बीमारी के रोगी पाए गये थे । पूरे देश का कामकाज ठप्प हो गया । देश को 1800 करोड़ का चपत लगा था ।

विदेशों में बदनामी हुई । लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर एयर इंडिया के हवाई जहाज को ‘प्लेग प्लेन’ नाम से विभूषित किया गया । ब्रिटिश अखबार इंडिपेंडेंट ने इसे ‘मध्यकलीन शाप’ की संज्ञा दी । टाइम मैगज़ीन ने इसे ‘मध्यकालीन हॉरर शो’ कहा । मदर टेरेसा को भी नहीं बख्सा गया । उन दिनों वे रोम की यात्रा पर थीं । एयरपोर्ट पर उनकी पूरी जांच की गयी । उसके बाद उन्हें शहर में प्रवेश करने दिया गया ।

विकसित देशों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइज़री जारी की थी । उन्होंने अपने नागरिकों को भारत न जाने की सलाह दी थी । एयर इंडिया के जहाजों के अन्दर फ्यूमिगेशन (धुआं छोड़ना) किया गया । विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) के डायरेक्टर जनरल ने सूरत का दौरा किया । निरीक्षण के बाद वे दुनिया को यह विश्वास दिलाने में सफल रहे थे कि भारत ने इसे रोकने के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठा लिए हैं । वैसे इसका कोई खास असर नहीं हुआ । भारत की जितनी किरकिरी होनी थी , हो चुकी थी ।

न्यूमोनिक प्लेग येरीसिना पेस्टिस नाम के बैक्टीरिया से फैलता है । 1994 के अगस्त में सूरत शहर में भारी तादाद में चूहे मरे थे । बारिश का मौसम था । ताप्ती नदी बाढ़ आई थी । पूरे सूरत शहर में पानी भरा था । मरे हुए चूहे पानी के माध्यम से पूरे शहर में फैल गए । न्यूमोनिक प्लेग के मरीज़ को पहले खांसी होती है । उससे संक्रमण फैलता है । इस वजह से सूरत में प्लेग ने महामारी की शक्ल इख्तियार कर लिया ।

सांप के गुजर जाने के बाद बहुत दिनों तक लकीर पीटने का चलन चला । कुछ का मानना था कि यह प्लेग था । कुछ के अनुसार न्यूमोनिया की वजह से ये मौतें हुईं थीं । न्यूमोनिक प्लेग से कोई मौत नहीं हुई थी । डब्ल्यूएचओ का भी कहना था कि पीड़ित लोगों में येरीसिना पेस्टिस बैक्टीरिया नहीं मिला था । इसलिए न्यूमोनिक प्लेग की बात मान्य नहीं हुई ।

वैसे अमेरिका के ओहायो शहर में स्थित एक्रॉन विश्वविद्यालय (ओहायो शहर) को सौंपी गई रिपोर्ट से पता चला था कि सूरत के मरीजों में येरीसिना पेस्टिस बैक्टीरिया के मिलने की पुष्टि हुई थी ।


न्यूमोनिक प्लेग की शुरुआत कैसे हुई ? इसका कोई संतोषजन जवाब आज तक नहीं मिला । उसी साल अगस्त में महाराष्ट्र के बीड जिले में ब्यूबोनिक प्लेग फैला था , पर वह न्यूमोनिक नहीं था । न्यूमोनिक प्लेग बड़ी तेज़ी से फैलता है । भीड़-भाड़ वाले इलाकों में तो कहर बरपा देता है । सूरत से जो भी लोग भागे वे बस में , ट्रेन से भागे थे । ये वाहन खचाखच भरे थे । फिर ये कैसे संभव हुआ कि न्यूमोनिक प्लेग दुसरे राज्यों तक नहीं पहुँच पाया । 

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने मई, 2000 में फ़ैसला लिया था कि दोनों पक्षों ( मानने वाले और नकारने वालों) को आमने सामने बिठाकर पूरी बात सुनी समझी जाए । उस मीटिंग का क्या अंजाम हुआ ? कुछ पता नहीं चला । खैर , खुशी की बात यह रही कि इस रहस्मयी बीमारी के बाद सूरत शहर साफ हो गया था । सूरत शहर का नाम देश के सबसे साफ शहरों में शुमार हो गया ।

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