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BIG STORY : झारखंड के लिए शिक्षा माने भीक्षा....

Bhola Tiwari May 22, 2020, 7:17 AM IST टॉप न्यूज़
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उमानाथ लाल दास

शिक्षा के बिना विकास जैसे आत्मा की उपेक्षा करके शरीर का पोषण। विकास को टिकाऊ बनाने के लिए शिक्षा और कौशल की नींव देनी ही होगी। मजदूर-किसान तो रीढ़ हैं ही विकास की, पर शरीर तो चाहिए ही। झारखंड की पूर्व सरकार हर हाल में सरकारी स्तर पर शराब बेचने पर आमादा थी। और इस चक्कर में उसने राज्य की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई के सौ करोड़ गंवा दिये। दारू बेचनेवाली इसी सरकार ने राज्य भर के 6500 सरकारी स्कूलों में ताला लटका दिया विलय के नाम पर।।माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में राज्य का चेहरा चमकाने वाले वित्तरहित शैक्षणिक संस्थान बदहाल होते रहे।

ज्ञान प्रकाश विवेक का एक शेर हैः कर्ज की उम्मीद लेकर मैं गया था जिसके पास / फीस माफी के लिए वो लिख रहा था अर्जियां। तो फी माफी को लेकर राज्य के अभिभावकों का हाल यही है। रघुवर सरकार के समय विपक्ष में बैठे हेमंत सोरेन ने भी तब शिक्षा-शिक्षक कल्याण और खासकर वित्तरहित संस्थानों को खूब सब्जबाग दिखाए थे। पर यह सरकार भी सेर पर सवा सेर निकली। लॉकडाउन में जब राज्य भर के 32000 विद्यालय बंद हैं और 45 लाख बच्चों में 40 लाख को किताब की दरकार थी तो सरकार ने घर-घर जाकर किताब पहुंचाने की बजाए दारू बेचना बेहतर समझा। लॉकडाउन में पुस्तक वितरण तो याद नहीं रहा, पर शराब की दुकानों को खोलने की बेताबी जरूर रही। जबकि तथ्य है कि यही सरकार है जो एमडीएम का चावल घर-घर पहुंचा रही है। साथ में दाल और सब्जी का नकद पैसा भी दे रही। वे शिक्षक जो लॉकडाउन में पीडीएस डीलर के यहां राशन बंटवा रहे हैं और बच्चों को घर-घर चावल पहुंचा रहे हैं तो उसी गाड़ी से किताब का बंडल नहीं जा सकता था। 

ड्रामेबाजी देखिए कि एक तरफ सरकार में बैठे मंत्री निजी स्कूलों से लॉकडाउन पीरियड की फी नहीं लेने बोल रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकारी स्कूल केंद्रीय विद्यालय फी का फरमान दे चुका है। फी नहीं लेने का दबाव बनाने या आदेश निकालने में अक्षम स्कूली शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो वातावरण निर्माण कर रहे हैं। कमेटी रिपोर्ट के बाद कार्रवाई करने की बात करनेवाले मंत्री ने बाद में कहा कि कमेटी गठित की जानी है। अब बात कमेटी से आगे बढ़कर सीएम के पास चली गयी। कमेटी-वमेटी की बात सिर्फ आइवाश थी। सीएम हेमंत सोरेन ने मामला अपने हाथ में लेकर कहा है कि इसका निर्णय वह करेंगे। दरअसल इस मामलें में सरकार का सारा तामझाम लुंजपुंज इसलिए हुआ कि निजी स्कूल का मामला एक तरफ मिशनरियों को छूता है तो दूसरे इनका वोट बैंक इधर बहुत कम है। और जो है उसमें अधिकांश मिशनरी के हाथ में है या उसके हित से जुड़ा है। इस सरकार की औकात नहीं कि फादर की नाराजगी मोल लेकर कोई फैसला लें। अधिक से अधिक यही होगा कि अभिभावकों को ऊंट के मूंह में जीरा के बराबर रियायत देने का डंका पीटा जाएगा। और हो तो यह भी सकता है कि मंत्री महोदय को बड़ी जिम्मेदारी देकर आराम करने को कहा जाए। 

सीबीएसई का मतलब पता नहीं, पर देंगे टक्कर ः हेमंत सरकार भी राज्य का चेहरा चमकाने वाले वित्तरहित संस्थानों को लेकर समान रूप से उदासीन बनी हुई है। बात-बात में सीबीएसई से तुलना-टक्कर करनेवाली सरकार अंततः चलती है उसीके पीछे। अभी दसवीं-बारहवीं के रिजल्ट लंबित होने से राज्य के करीब पांच लाख बच्चे प्रभावित हैं। सीबीएसई ने तो बची हुई कॉपियों का मूल्यांकन शुरू भी कर लिया। खत्म होने को है। केंद्रीय बोर्ड ने बचे हुए विषयों की कॉपियां परीक्षकों के घर भेजकर मूल्यांकन करवा लिया। बाकी परीक्षा भी ले लेगा और शीघ्र मूल्यांकन हो जाएगा। पेंडिंग काम अधिक बचेगा नहीं। राज्य शिक्षा बोर्ड जैक के सचिव, अध्यक्ष और विभागीय सचिव अभी कॉपी मूल्यांकन की तैयारी ही कर रहे हैं। लॉकडाउन में जब कोरोना पॉजिटिव केस बढ़ते जा रहे हैं, ऑरेंज जोन से राज्य बाहर आ नहीं पा रहा तो विभाग मूल्यांकन केंद्रों का चयन कर सीटिंग एरेंजमेंट ही तैयार कर रहा हैथ। पूर्व की सरकार में विभागीय सचिव मंत्री से लीड करते थे। इस सरकार में विजनरी मंत्री सचिव को लीड कर रहे हैं। पिसा रहे हैं बच्चे और अभिभावक। और चौपट हो रहा एक तंत्र जिसे खड़ा करने में दशकों गुजर जाते हैं।

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