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आज के हीं दिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या हुई थी, हत्या के कारणों पर एक नजर

Bhola Tiwari May 21, 2020, 12:10 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली. : साल 1986 के आखिर आते आते श्रीलंका सरकार और लिबरेशन टाइगर्स आँफ तमिल ईलम(लिट्टे)के रिश्ते बेहद खराब हो गए थे।श्रीलंका में तमिलों के लिए अलग देश की लडाई केवल लिट्टे हीं नहीं लड़ रहा था अपितु बहुत से तमिल संगठन थे जो जाफना और उससे सटे कुछ ऐरिया को मिलाकर एक अलग देश चाहते थे।श्रीलंका सरकार की दोरंगी नीतियों से तमिल उपेक्षित महसूस कर रहे थे।वहाँ के सरकारी नौकरियों में तमिलों की भागीदारी बिल्कुल नगण्य थी और वहाँ के बहुसंख्यक सिंघली समुदाय तमिलों को देखना नहीं चाहती थी।तमिल संगठनों ने स्वायत्त क्षेत्र की जगह अब अलग देश की मांग करनी शुरू कर दी थी जिसके लिए श्रीलंका कतई तैयार नहीं था।

जाफना प्रायद्वीप में तमिलों की सबसे बड़ी आबादी रहती थी और आज भी रहती है।वहाँ लोगों की सहानुभूति पाकर लिट्टे बेहद मजबूत और खूंखार हो गया था।बताते हैं कि भारत उन्हें हथियार खरीदने के लिए धन मुहैया करवाता था।कांग्रेस सरकार दोरंगी नीति पर चल रही थी।लिट्टे चीफ प्रभाकरन अक्सर भारत आया करता था और तमिलनाडु में उसका सम्मान फ्रीडम फाइटर के रूप में होता था।


श्रीलंका में बसे तमिलों के प्रति भारतीयों की सहानुभूति स्वभाविक थी।श्रीलंका के तमिलों ने आजादी हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लिया।लिट्टे के आत्मघाती दस्तों ने वहाँ कत्लेआम शुरू कर दिया।प्रशिक्षण प्राप्त लिट्टे के सदस्यों ने कुछ हीं दिनों में वहाँ इतनी रक्त बहायी कि श्रीलंका सरकार ने जनवरी 1986 को तमिलों के गढ़ जाफना में मिलेट्री शासन लागू कर दिया।मिलेट्री शासन के लगने के बाद श्रीलंकाई सेना ने तमिलों की बस्तियों पर बम गिराना शुरू कर दिया था।थोडे हीं दिनों में हजारों निर्दोष तमिल मारे गए।इस हत्या की गूंज भारत में भी खूब सुनी गई।तमिलनाडु में श्रीलंका के खिलाफ खूब प्रर्दशन होने शुरू हो गए थे।तमिल चाहते थे कि इस मामले में भारत सरकार हस्तक्षेप करे।

भारत सरकार ने श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्धने से जाफना में तमिलों पर अत्याचार रोकने का आग्रह किया मगर नतीजा कुछ नहीं निकला तब भारत सरकार ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वहाँ तमिलों पर अत्याचार यूँही जारी रहे तो भारत सरकार हस्तक्षेप करेगी।तब श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्धने ने कहा था,"भारत भाड में जाए,हम नहीं डरते हैं और अगर हमला हुआ तो हम भी पुल(राम सेतु)पार करेंगे।"


तमिलनाडु में भारी विरोध के कारण प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने समुद्री मार्ग से तमिलों के लिए सहायता भेजनी चाही,जिसे रोक दिया गया।अब भारत सरकार के पास कोई चारा नहीं था और घोषणा की गई कि हवाई रास्ते से तमिलों को सहायता पहुँचाया जाएगा।भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार को ये भी कह दिया कि भारतीय विमानों पर हमला युद्ध का ऐलान माना जाएगा।जो जयवर्धने बडी बडी बातें कर रहे थे अब वो बैकफुट पर थे।उन्होंने भारतीय जहाजों को वहाँ राहत सामग्री गिराने की इजाजत दे दी।अगर वे थोडा भी दुस्साहस करते तो मामला युद्ध करने तक आ सकता था।श्रीलंका अपनी सैन्य क्षमता को अच्छी तरह जानता था और वह भारत से बातचीत करने के लिए राजी हो गया।जाफना से मिलेट्री शासन हटा लिया गया लेकिन लिट्टे चीफ को ये गलतफहमी हो गई कि अगर वो सिंघलियों से युद्ध करेगा तो भारत सरकार को मजबूरन उसका साथ देना होगा।

अपमान का घूंट पिये श्रीलंका के राष्ट्रपति अमेरिका से लिट्टे का सफाया करने में सहयोग चाहते थे और इस बात की सूचना भारत सरकार को भी थी।भारत नहीं चाहता था कि दक्षिण एशिया में अमेरिका का सैन्य अड्डा बने।अगर श्रीलंका सरकार और अमेरिकी सरकार के बीच समझौता हो जाता तो अमेरिका हमेशा के लिए अपना सैन्य बेस श्रीलंका में बना लेता जो भारत के लिए ठीक नहीं था।

भारत और श्रीलंका के बीच एक सर्वमान्य समझौते के लिए प्रयास शुरू कर दिये गए।राजीव गांधी और उनके सलाहकार ये समझ रहे थे कि वो जो कहेंगे वह लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन मान लेंगे जबकि असलियत इसके उलट थी।भारत सरकार के विशेष आग्रह पर प्रभाकरन बातचीत के लिए तैयार हो गया।भारत से जाफना दो हेलीकॉप्टर भेजी गई जिसमें प्रभाकरन और उसके कुछ महत्वपूर्ण सदस्य बातचीत के लिए भारत आए।प्रभाकरन और उनकी टीम को लाने के लिए विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरदीप पुरी जो आजकल नरेंद्र मोदी कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री हैं भेजे गए।

जाफना पहुँचे हरदीप पुरी को वहाँ के तमिल शक की निगाह से देख रहे थे।लिट्टे के कुछ वरिष्ठ लोगों ने जब अपनी शंका जाहिर की तो हरदीप पुरी को ये कहना पडा था कि वार्ता सफल हो या असफल प्रभाकरन और उनकी टीम को सकुशल यहाँ भेज दिया जाएगा।तमिल तब भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन से बात कराने को कहा।तुरंत एमजीआर से बात कराई गई और उनके आश्वासन पर उन्हें दिल्ली भेजा गया।

प्रभाकरन और उनके सहयोगियों को दिल्ली के फाइवस्टार होटल अशोका में ठहराया गया।25 जुलाई को हरदीप पुरी ने समझौते का मसौदा पढ़कर सुनाया जिसका तमिल अनुवाद उनके वरिष्ठ साथी बालासिंघम ने किया।मसौदा पढ़ने के बाद प्रभाकरन ने तुरंत हरदीप पुरी से कहा मुझे ये शर्तें मान्य नहीं है और मैं तमिल ईलम की मांग नहीं छोड सकता।मतलब था तमिलों के लिए एक अलग देश,जबकि इस मसौदे में तमिलों के लिए एक स्वायत्त क्षेत्र की बात कही गई थी।

अधिकारियों ने जब दवाब बनाना शुरू किया तो प्रभाकरन ने कहा कि वे तुरंत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजीआर से मिलना चाहते हैं।राजीव गांधी ने उनकी बात मान ली और तुरंत एमजीआर को दिल्ली बुलाया गया।एमजीआर ने भी प्रभाकरन को समझाया कि अलग देश की मांग सही नहीं है और ये मांग श्रीलंका सरकार कभी मंजूर नहीं करेगी।अशोका होटल में इतना सख्त पहरा था कि प्रभाकरन को किसी से भी मिलने नहीं दिया जा रहा था, पत्रकारों से भी नहीं।

जब अधिकारियों ने समझौते को मानने के लिए दवाब बनाना शुरू किया तो प्रभाकरन को ये समझ में आ गया कि वे फंस चुके हैं और उनसे जबरजस्ती समझौते पर दस्तखत कराए जा रहे हैं।उन्होंने राजीव गांधी से आमने सामने बात करने की ख्वाहिश जाहिर की तो तुरंत राजीव गांधी मिलने के लिए तैयार हो गए।राजीव गाँधी ने प्रभाकरन और उनके सहयोगियों को अपने घर बुला लिया और बातचीत की।प्रभाकरन ने आशंका जताई कि श्रीलंका सरकार समझौते का पालन ठीक से नहीं करेगी और उन्हें प्रताडित किया जाएगा।राजीव गांधी ने कहा मैं स्वंय इसकी निगरानी करूंगा।आप तमिलों के हित के लिए समझौते पर हस्ताक्षर कर दिजिए।राजीव गांधी के आग्रह पर प्रभाकरन मसौदे पर हस्ताक्षर करने को तैयार हो गए।

राजीव गांधी ने प्रभाकरन और बालासिंघम के साथ खाना खाया।जब वे जाने लगे तो राजीव गांधी ने उन्हें अपना बुलेटप्रूफ जैकेट दिया और बडे प्यार से कहा कि आप अपना ख्याल रखिएगा।बताते हैं कि सलाहकारों ने राजीव गांधी को ये भी सलाह दी थी कि जब तक लिट्टे के लोग हथियार नहीं डाल देते, प्रभाकरन को भारत में हीं रखा जाए।मगर राजीव गांधी ने तुरंत मना कर दिया और कहा हमें प्रभाकरन पर विश्वास करना चाहिए, उसने मुझे अपनी जुबान दी है।

राजीव गांधी तो अपने वचन पर रहे मगर दगाबाज प्रभाकरन अपना वायदा नहीं निभा सका।जाफना पहुँचनें के बाद प्रभाकरन हीं नहीं इस समझौते से मुकरा बल्कि श्रीलंका के राष्ट्रपति ने भी अप्रत्यक्ष रूप से समझौता मानने से इंकार कर दिया।राजीव गांधी और जयवर्धने के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता दोनों के अहम से टूट गया।

समझौते के अनुसार श्रीलंकाई सेना जाफना से रवाना हुई और भारतीय सेना ने अपने कैंप स्थापित किये।प्रभाकरन ने शांति समझौते को मानने से इंकार कर दिया।तकरीबन बीस हजार की भारतीय फौज बिना किसी तैयारी के जंगलों में शांति कायम करने के लिए झोंकी गई थी, अब लिट्टे से हीं लडने के लिए मजबूर थी।दगाबाज़ प्रभाकरन ने अपने रंगरूटों को ये आदेश दिया था कि वे हर हाल में भारतीय सेना को जाफना से खदेडें।लिट्टे ने भारतीय फौज पर आत्मघाती हमला करना शुरू कर दिया था।थोडे हीं दिनों में हजारों भारतीय सैनिक जाफना में मार डाले गए।

भारत का ये दाव उल्टा पड गया था।इस विफल आँपरेशन की तुलना अमेरिका द्वारा वियतनाम में की गई सैनिक कार्रवाई से हुई और इसका अंजाम भी यही हुआ।

भारतीय सेना के हमलावर होने से प्रभाकरन राजीव गांधी से बेहद चिढ गया और उसने प्रण किया कि वह अपने सदस्यों की हत्या का बदला राजीव गांधी के मौत से लेगा।

जाफना के जंगलों में लिट्टे के कोर ग्रुप की मीटिंग हुई और उसमें ये फैसला लिया गया कि राजीव गांधी की हत्या हर हाल में करनी है।इस मीटिंग में बेबी सुब्रमण्यम, मुथुराजा, मुरूगन और शिवरासन शामिल थे।शिवरासन को राजीव गांधी की हत्या की पूरी जिम्मेदारी दी गई।


1989 में राजीव गांधी चुनाव हार गए और वीपी सिंह की सरकार बनी।1990 में भारतीय सेना ने इस कार्रवाई को स्थगित कर अपने सैनिकों को वापस बुला लिया।21 मई 1991 की रात दस बजकर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक बम विस्फोट कराकर राजीव गांधी की हत्या कर दी गई।प्रभाकरन ने ये भी नहीं सोचा कि जिसने उन्हें इतना सम्मान दिया वो उसकी हत्या कैसे करा सकते हैं।

प्रभाकरन को उसके किये घिनौने काम की सजा श्रीलंका के फौज ने दे दी।18 मई 2009 को श्रीलंका की सेना ने प्रभाकरन और उसके नाबालिग बेटे को मारकर लिट्टे का खात्मा कर दिया।

आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि है।देश हमेशा उनके कार्यों को याद रखेगा।

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