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प्रवासी आएगा, रोग लेकर आएगा’

Bhola Tiwari May 21, 2020, 10:07 AM IST राष्ट्रीय
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

यूरोप में ‘सीजनल माइग्रेशन’ होता है, जैसे भारत के केरल, पंजाब आदि राज्यों में भी। साइबेरिया के पंछियों की तरह? फसल कटाई के सीजन में, या बर्फ के सीजन में मजदूर गरीब यूरोपीय देशों और दक्षिण अमरीकी देशों से आते हैं; और काम के बाद लौट जाते हैं। इन्हें एक ‘सीजनल वीसा’ मिलता है। कुछ महीनों के लिए। वे जब यहाँ आकर लब्बो-लुआब देखते हैं, तो उनका दिल एक पल के लिए सोचता है कि यहीं बस जाऊँ। फिर लगता है कि कानूनी तौर पर मुमकिन नहीं, और परिवार पीछे इंतजार कर रहा है, तो लौट जाते हैं।

अभी स्ट्रॉबेरी चुनने और भेड़ों की ऊन निकालने का वक्त था। यूरोपी जमींदार/किसान इस इंतजार में थे कि पूर्वी यूरोप और उरुग्वे आदि से मजदूर आएँगे। लेकिन, वे आ न सके। कुछ अगर एक देश पहुँच भी गए, तो सीमा नहीं पार कर पा रहे। यूरोप महादेश होकर भी एक संघीय देश जैसा ही है कि फ्रांस से निकले स्पेन, इटली, जर्मनी हर जगह काम कर वापस लौट गए। एक ही वीसा पर। अभी यह बंद हो गया, तो काम कैसे हो?

इसके पीछे एक तंत्र है। जैसे गिरमिटियों के लिए अरकाटी (एजेंट) होते थे, उसी तरह बहला-फुसला कर लाने वाले उनके भी एजेंट होते हैं। वे सब्जबाग दिखा कर ले आते हैं, लेकिन यूरोपीय श्रम-कानून ढंग से नहीं बताते। इन्हें कोल्हू के बैल की तरह रगड़ दिया जाता है, भले सतह से नजर न आए। लेकिन, फिर भी वे आते हैं। इनमें तीन तरह के लोग हैं-

1. विस्थापन प्रवृत्ति के लोग: जैसे रोमानिया के (रोमाँ) हमारे देश के बंजारों की तरह। उनको चलायमान ही रहना है। 

2. फ्रीलांसर: ये कहीं भी, कोई भी काम करने को तैयार हैं, अगर धन मिले। इनमें अर्जेंटिना के विद्यार्थी से लेकर ग्रीस का छोटा-मोटा रेस्तराँ चलाने वाला तक मिल जाएगा। अभी वहाँ छुट्टी या ऑफ-सीजन है तो आ गए।

3. मजबूर लोग: यह तो स्पष्ट ही है। मजबूरी के तो कई कारण हैं। कहीं कर्जा बाकी, कहीं परिवार का खर्च, कहीं कोई भय, कहीं-कहीं ज़बरदस्ती भी। उनकी आँखों में दिख जाता है कि यह आदमी बस वापस लौटना चाहता है।

ग़ौर करिएगा, मैंने अफ्रीकियों का नाम नहीं लिया, जो सदियों से गुलामी के लिए जाने जाते रहे हैं। वे इस कैटगरी में अब नहीं, किसी और कैटगरी में हैं, जिसकी चर्चा फिर कभी।

विस्थापन हम नहीं रोक सकते। यह होना ही है। जैसे-जैसे देश अमीर होते गए, उन देशों की ओर विस्थापन बढ़ता गया। कुवैत और तमाम अरबी देशों में मूल निवासी बीस प्रतिशत से भी कम हैं। अस्सी प्रतिशत प्रवासी हैं। अगर रास्ता बंद कर दिया गया, तो सब फँस जाएँगे, दुनिया रुक जाएगी। रास्ते तो खोलने ही होंगे।

‘प्रवासी आएगा, रोग लेकर आएगा’ यह पुरानी सोच है। जब डेढ़ सौ साल पहले भारतीय दूर द्वीपों पर जाते थे, तब क्वारांटाइन में रखे जाते थे। जब आज यूरोप या अरब जाते हैं, तो तपेदिक जाँचा जाता है और जरूरत पड़ने पर क्वारांटाइन में रखा जाता है। ब्लू-कॉलर, वाइट कॉलर सभी को। लेकिन, इन सब विघ्नों से प्रवास रुकता नहीं। 

स्ट्रॉबेरी भी तो चुनने हैं। कौन चुनेगा?

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