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"डब्ल्यूएचओ" और "चीन" के खिलाफ जाँच की मंजूरी

Bhola Tiwari May 20, 2020, 12:25 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : सौ से ज्यादा देशों की मांग पर कोरोना वायरस की जाँच के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई है।वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की जौनेवा में चल रही बैठक में इसका प्रस्ताव रखा गया था।सौ से ज्यादा देशों ने इसका समर्थन करते हुए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।इस प्रस्ताव में ये लिखा गया है कि कोरोना वायरस के मानव शरीर में फैलने की विस्तृत जाँच होगी।साथ हीं इस महामारी में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कामकाज की निष्पक्ष और चरणबद्ध समीक्षा की भी जाएगी।


वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की वार्षिक बैठक में डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में से किसी ने भी, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, यूरोपीय संघ द्वारा लाये गए प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं जताई।बहामा के राजदूत और वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के अध्यक्ष केवा बैन ने कहा,"किसी ने भी इस जाँच के प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई है,इसलिए मैं इस प्रस्ताव पर सदन की सहमति व्यक्त करता हूँ।"

जाँच के संकेत एक दिन पहले हीं मिल गए थे जब डब्ल्यूएचओ के प्रमुख और चीन के कट्टर समर्थक ट्रेडरोस ऐडहेनाँम ग्रेब्रीयेसोस ने एक स्वत्रंत मूल्यांकन की बात पर कहा था कि "अगर स्वत्रंत मूल्यांकन के जरिए कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकेंगे और हमें कुछ अच्छे सुझाव मिलेंगे, तो जितना जल्दी हो सकेगा हम उन पर काम करेंगे।"

गौरतलब है कि अमेरिका शुरू से हीं कोरोना संक्रमण के फैलने और उस पर जानकारी को छूपाने का आरोप चीन पर मढ़ता रहा है।अमेरिका और यूरोपीय देशों का कहना है कि अगर समय पर चीन और डब्ल्यूएचओ इस संक्रमण की जानकारी सभी देशों से शेयर करता तो बहुत हद तक इस पर काबू पाया जा सकता था।डब्लूएचओ अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रहा है और उसके अध्यक्ष चीन के एजेंट के रूप में काम कर रहें हैं।ये शक तब और गहरा गया जब डब्ल्यूएचओ ने चीन की शह पर ताइवान को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की बैठक में बुलाने से इंकार कर दिया।आज जब संपूर्ण विश्व कोविड-19 की विभिषिका को झेल रहा है तब ताइवान ने अपने प्रयासों से अपने 2.3 करोड़ लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण के खतरे से बचा लिया है।सीमित संसाधन के बावजूद उसकी ये पहल अनुकरणीय है।ताइवान चाहता है कि वे अनुभवों को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में साझा करे,मगर चीन के विरोध के बाद डब्ल्यूएचओ ने ताइवान को बुलाने से मना कर दिया है।


ताइवान के उप-राष्ट्रपति चेन चिएन जेन के हवाले से खबरों में कहा गया है कि "आपदा के समय आप किसी को अनाथ कर रहें हैं।यह साफ करता है कि डब्ल्यूएचओ अपनी तटस्थ जिम्मेदारियों से ज्यादा राजनीति में लिप्त है।"अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो अनेकों बार कहा है कि डब्ल्यूएचओ चीन के इशारे पर चल रहा है जबकि अमेरिका सबसे अधिक फंडिंग करता है।ट्रंप ने स्पष्ट कह दिया है कि अगर निष्पक्ष समीक्षा और जाँच नहीं हुई तो अमेरिका इस संगठन की सदस्यता छोड़ देगा।अमेरिका के हटाने का मतलब उसके साथ तकरीबन सौ देश भी उसका अनुसरण करेंगे।सभी जानते हैं कि अमेरिका तथा उसके मित्र देशों के हटने के बाद ये संगठन दंतविहीन हो जाएगा और चीन चाह कर भी इतनी फंडिंग नहीं कर पाएगा।

चीन के राष्ट्रपति ने जाँच के निर्णय पर कहा है कि वे जाँच के लिए तैयार हैं मगर ये जाँच कोरोना वायरस संक्रमण के समाप्त होने के बाद होगी।उनकी बात से जाहिर है कि वे जाँच को टालना चाहते हैं।उन्हें लगता है कि अभी जाँच के लिए सही समय नहीं है, वर्तमान में जाँच होने पर उनकी पोल खुल सकती है।

ट्रंप प्रशासन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर ये आरोप लगाया है कि डब्ल्यूएचओ लोक स्वास्थ्य की जगह सियासत में ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है।ताइवान को चीन के दवाब में संगठन से बाहर किए जाने के फैसले ने साफ तौर पर जाहिर कर दिया है कि डब्ल्यूएचओ पर चीन का प्रभाव तो है।आपको बता दें चीन लगातार ये दावे करता आया है कि ताइवान उसका हिस्सा है।वो एक अलग देश नहीं बल्कि चीनी गणराज्य का एक हिस्सा है जबकि ताइवान का कहना है कि वह एक स्वत्रंत देश है।गौरतलब है कि 1949 में नागरिक युद्ध के समय से चीन और ताइवान अलग देशों की तरह वजूद में थे लेकिन 1962 में संयुक्त राष्ट्र से ताइवान को निष्कासित किया गया।बीजिंग का यह भी दावा रहा है कि एक दिन वह ताइवान को अपना राज्य बना हीं लेगा,भले हीं इसके लिए फोर्स इस्तेमाल करनी पडे।आपको याद होगा हाल हीं में चीन ने कहा था कि ताइवान अगर खुद को चीन का अंग घोषित करे तो चीन के अंग के तौर पर डब्ल्यूएचओ की सभा में शामिल हो सकता है लेकिन ताइवान ने चीन की इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया था।

ताइवान में वर्तमान सरकार स्वाधीनता के पक्ष में है और जब से साइ इंग-वेन की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ने सत्ता संभाली है तब से चीन के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए हैं।चीन प्रशासन किसी तरह से साइ इंग-वेन को अपदस्थ करना चाहती है जबकि साइ को ताइवान की जनता का साथ मिला है।ऐसा नहीं है कि ताइवान ने कभी डब्ल्यूएचओ की बैठक में हिस्सा नहीं लिया है।दरअसल जब जब वहां चीन समर्थित सरकार बनी है तब ताइवान को बैठक में हिस्सा लेने की अनुमति डब्ल्यूएचओ ने दे दी थी मगर अब ताइवान के राष्ट्रपति जो 2017 से सत्ता में हैं और वे चीन विरोधी और ताइवान की स्वत्रंत्रता की समर्थक हैं, चीन ने अपना प्रभाव दिखाकर ताइवान को बैठक में शामिल होने से रोक दिया है।

मैं मानता हूँ कि किसी भी संस्था के कामकाज की समीक्षा होनी चाहिए, नहीं तो वह निरंकुश हो जाएगा जैसा वर्तमान में डब्ल्यूएचओ हो गया है।वह एक तरह से चीन का एजेंट बनकर काम कर रहा है।डब्ल्यूएचओ अपनी नाकामियों को छूपाने के लिए तरह तरह के बयान दे रहा है।अब वो समय आ गया है कि सफेद हाथी बने इस संगठन की जवाबदेही तय करनी चाहिए और अमेरिका ने साफ कर दिया है कि अगर डब्ल्यूएचओ की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होगी तो वह इस संगठन की फंडिंग को पूरी तरह रोक देगा और इसकी सदस्यता को भी छोड़ देगा।

गौरतलब है कि डब्ल्यूएचओ को 31 दिसंबर,2019 को इस घटना की जानकारी पहली बार मिली।04 जनवरी को सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हुई और विश्व के सभी देशों को पता चल गया कि चीन में एक वायरस ने अटैक किया है।05 जनवरी को सभी देश के बडे अखबारों ने इस वायरस के बारे में विस्तृत लेख छापा।उस समय ये पता नहीं था कि ये वायरस इंसान से इंसान में फैलता है।10 जनवरी को बहुत से देशों ने यात्रा पर एडवाइजरी जारी की तब तक डब्ल्यूएचओ की तरफ से कुछ नहीं बोला गया था।

20-21 जनवरी को डब्ल्यूएचओ की क्षेत्रीय विशेषज्ञों ने बुहान का दौरा किया, तब तक ये महामारी वैश्विक हो गई थी।22 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने फिल्ड विजिट के बाद ये घोषणा की कि ये संक्रमण मानव से मानव में फैलता है, तब तक स्वतः संज्ञान लेते हुए सभी देशों ने सुरक्षा के उपाय कर लिये थे।डब्ल्यूएचओ ने 24 जनवरी को दूसरी ट्रेवल एडवाइजरी जारी किया और 27 जनवरी को तीसरी।28 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन के वरिष्ठ अधिकारियों ने बीजिंग में चीन के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की और 30 जनवरी को डब्ल्यूएचओ ने सार्वजनिक आपातकाल की घोषणा की जब सब कुछ लूट चुका था।

डब्ल्यूएचओ किस कदर चीन का समर्थन कर रहा था यह इस बात से समझा जा सकता है कि उसने 23 जनवरी को एक बयान जारी कर महानिदेशक टेडरोस ग्रेब्रीयेसोस ने कहा कि हमने चीन यात्रा और व्यापार परव्यापक प्रतिबंध की सिफारिश नहीं कर रहें हैं मगर एयरपोर्ट्स पर यात्रियों की स्क्रीनिंग जरूर होनी चाहिए।आपको बता दें डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेडरोस ग्रेब्रीयेसोस कम्युनिस्ट विचारधारा के हैं और इस वजह से उनकी निकटता चीन से जगजाहिर है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों के दवाब में डब्ल्यूएचओ झुका है और मेरा मानना है कि डब्ल्यूएचओ के कारगुजारियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।वर्तमान महानिदेशक ने चीन के साथ मिलकर इस संगठन को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है जो गलत है।

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