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भारत-नेपाल संबंध दोराहे पर,लिपुलेख विवाद पर नेपाल ने आँखें दिखाई

Bhola Tiwari May 19, 2020, 8:10 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को वीडियो लिंक के जरिए 90 किलोमीटर लंबी लिपुलेख से होकर गुजरने वाली उत्तराखंड-मानसरोवर रोड़ का उद्घाटन किया था।नेपाल ने भारत के इस कदम पर कडा ऐतराज़ जताया है।नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली ने भारी विरोध प्रर्दशन के बाद सभी को विश्वास दिलाया है कि वे भारत के पक्ष में उस जमीन पर दावा नहीं छोडा जा सकता है।प्रधानमंत्री ओली ने ये भी कहा कि नेपाल एक इंच भी जमीन नहीं छोड़ेगा।

नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार बावली ने कहा,"प्रधानमंत्री ने इस बैठक में कहा कि सरकार अपने पुरखों की जमीन की हिफाजत करेगी।"आपको बता दें भारत के इस कदम से काठमांडू में जबरदस्त विरोध प्रर्दशन हुआ।लोगों ने सडकों से लेकर संसद तक इसका पुरजोर विरोध किया।लोगों के विरोध के कारण नेपाल सरकार को पहली बार महाकाली नदी से लगे सीमावर्ती इलाके में आर्म्स फोर्स की एक कंपनी भेजनी पडी।नेपाल सरकार के आदेश पर आर्म्स फोर्स ने कालापानी से लगे छांगरू गाँव में अपनी चौकी स्थापित की है।गौरतलब है कि भारत और नेपाल की सीमा का निर्धारण ठीक तरीक़े से नहीं हुआ है,यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में नेपाल की तरफ से बार बार भारत पर अतिक्रमण के आरोप लगाए जाते रहें हैं।

आपको याद होगा कुछ साल पहले भारत और चीन ने मानसरोवर यात्रा के रास्ते पर एक समझौता किया था।नेपाल का कहना है कि जिस रास्ते पर दोनों देशों ने समझौता किया है उसका वास्ता दोनों देशों से नहीं है।वो जमीन नेपाल की है और उसके दस्तावेज उसके पास हैं।धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क जिसे कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग भी कहा जाता है।

नेपाल ने नवंबर 2019 में भारत के समक्ष अपना त्रीव विरोध तब जताया था जब भारत ने कालापानी के इलाकों को अपने मानचित्र में दिखाया था।कालापानी का इलाका लिपुलेख के पश्चिम में स्थित है।कालापानी वाले इलाके पर भारत भी अपना दावा करता है और तमाम विरोध के बावजूद ये हिस्सा अभी भारत के हीं कब्जे में प्रतीत होता है।

नेपालियों का कहना है कि भारत दोस्ती की आड में उसके जमीन को जबरन कब्जा कर रहा है।उत्तराखंड के धाराचूला के पूरब में महाकाली नदी के किनारे नेपाल का दार्चुला जिला पड़ता है।महाकाली नदी नेपाल-भारत की सीमा के तौर पर काम करती है।महाकाली नदी समय समय पर अपना मार्ग बदलती रहती है, जिससे उसके मार्ग में लगे पिलर्स बेमानी हो जाते हैं।नेपाल का आरोप है कि भारत ने उसकी जमीन पर 22 किलोमीटर रोड बनाया है जबकि भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव का कहना है कि "हाल में पिथौरागढ़ जिले में जिस सड़क का उद्घाटन हुआ है,वो पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में पड़ता है।कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जानेवाले तीर्थ यात्री इसी सड़क से जाते हैं।"

आपको बता दें भारत और नेपाल के बीच 1800 किलोमीटर लंबी सीमा है।इन सीमाओं के निर्धारण के संबंध में कहीं कोई लिखित दस्तावेज नहीं है यद्यपि नेपाली इतिहासकारों,अधिकारियों और गुंजी गाँव के लोगों का कहना है कि ये जमीन नेपाल की है और इसके पक्ष में उनके पास बहुत से सबूत भी है।उनका कहना है कि सुगौली संधि के अनुसार लिपुलेख और उस इलाके के कई गाँव नेपाली क्षेत्र में आते हैं।विवाद दूसरे इलाकों को लेकर भी है।नेपाल की सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि लिपुलेख और गुंजी गाँव के अलावा भारत ने महाकाली नदी के उत्तर सीमा के अंदर भी उसके जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है।

गौरतलब है कि साल 1816 में नेपाल और ब्रिटिश शासन के बीच सुपौल की संधि हुई थी।नेपाल की राजशाही और भारत के ब्रिटिश शासन के बीच दो साल तक युद्ध चला था।युद्ध के बाद ये फैसला हुआ था कि नेपाल को महाकाली नदी के पश्चिमी इलाके की जीती हुई जमीन को छोडना होगा।तब से लेकर आज तक सीमा विवाद पर कोई बात नहीं हुईं हैं।कालापानी में भारत ने 1950 में आईटीबीपी की चौकी स्थापित की थी तब भी नेपाल ने कोई विरोध दर्ज नहीं कराया था मगर आज नेपाल अपनी जमीन को लेकर मुखर है और वहां के निवासी एक इंच भी जमीन छोडने के लिए तैयार नहीं है।

भारत-नेपाल संबंध मद्धेशी आंदोलन के दौरान बेहद खराब हो गए थे।नेपालियों का कहना था कि ऐसे समय जब नेपाल भूकंप की मार से पूरी तरह तबाह हो गया था उस समय भारत सरकार की शह पर मद्धेशियों ने भारत नेपाल सीमा को सील कर दिया था।जिससे भारत से नेपाल में जानेवाली महत्वपूर्ण सामानों की आवाजाही रूक गई थी।नेपाल सरकार के आग्रह पर भी भारत की नरेंद्र मोदी की सरकार वो आंदोलन को रोकने में नाकाम रही थी, जो भारत की सबसे बड़ी कुटनीतिक हार के रूप में देखा गया था।आंदोलन की समाप्ति पर जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल गए थे तो उन्हें कडे विरोध का सामना करना पडा था।कई जगह तो गो बैक के नारे भी बुलंद हुए थे जो उनकी कडवाहट को ही प्रर्दशित कर रहे थे।

चीन मौके की तलाश में था और वह नेपाल को ये समझाने में सफल रहा कि अब चीन हीं उसका वास्तविक दोस्त है।नेपाल सरकार ने कई परियोजनाओं को भारत से छिनकर चीन को सुपुर्द कर दिया था।उस बीच नेपाल और चीन के बीच कई ऐतिहासिक समझौते हुए थे, जो भारत को रास नहीं आया। भारत संभला मगर तबतक तीर म्यान से बाहर निकल चुका था।

आज लिपुलेख विवाद सुर्खियों में है।कल वो कालापानी पर हमें आँखें दिखा रहा था।भारत को चाहिए कि अपने पडोसी नेपाल से सीमा विवाद पर बैठकर बात करे।बातचीत से हर विवाद का समाधान निकल सकता है जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।नरेंद्र मोदी सरकार ने वैश्विक संबधों पर बहुत काम किया है मगर ये भी कटु सत्य है कि पडोसियों से हमारे संबंध रोज खराब होते जा रहें हैं।इस दिशा में भी सरकार को सार्थक प्रयास करने होंगे।पाकिस्तान से तो हमारे संबंध सुधर नहीं सकते मगर नेपाल से मधुर संबंध रखने के लिए कुछ अलहदा करना होगा, नहीं तो नेपाल भी पूरी तरह चीन की गोद में जा बैठेगा, ये तो तय मानिए।

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