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लोकसभा चुनाव के समय जनता को भ्रमित करने की कुचेष्टा

Bhola Tiwari Apr 29, 2019, 11:01 AM IST पॉलिटिकल
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अजय श्रीवास्तव

शुक्रवार को सरकारी तोता सीबीआई ने सात लोगों के खिलाफ चीनी मिल खरीद फरोख्त के मामले में एफआईआर दर्ज कराया है।इन आरोपियों के नाम हैं राकेश शर्मा, उनकी पत्नी सुमन शर्मा, धमेंद्र गुप्ता, सौरव मुकुंद, मो.जावेद, मो.नसीम अहमद और मो.वजीद।इन सातों पर ये आरोप है कि इन्होंने चीनी मिल की खरीददारी में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था।

इस एफआईआर में कहीं भी पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का नाम नहीं है जबकि साजिश के तहत सुबह से हीं ये खबर चलाया जा रहा था कि सीबीआई के एफआईआर से मायावती मुश्किल में पड़ गईं हैं।कुछ चैनलों ने ये भी खबर चलाया कि अब मायावती की मुश्किलें बढ़ सकतीं हैं।

शुक्रवार की शाम मायावती ने प्रेसवार्ता कर अपनी स्थिति को स्पष्ट किया और केंद्र सरकार पर ये आरोप लगाया कि जानबूझकर भ्रम फैलाने के लिए चुनाव के समय सरकार ऐसी कार्रवाई कर रही है।उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल कर रही है जो आजादी के बाद से लेकर अभी तक किसी भी सरकार में होते नहीं देखा गया है।केन्द्र सरकार जाँच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल कर रही है।उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी सत्ताधारी पार्टी ने सीबीआई, ईडी, इनकमटैक्स, आईटी आदि का इस्तेमाल किसी भी पूर्व सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ राजनीतिक इस्तेमाल नहीं किया है।इतने पुराने मामले में खासकर लोकसभा निर्वाचन के दौरान सीबीआई जाँच की अधिसूचना निर्गत किया जाना सीबीआई के दुरूपयोग का स्पष्ट उदाहरण है।

मायावती का स्पष्ट कहना है कि मुख्यमंत्री के रूप में चीनी मिलों के विक्रय में उनकी भूमिका नहीं थी।इस संबंध में यह भी सर्वविदित है कि चीनी मिलों के विक्रय में मुख्यमंत्री के रूप में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।मेरे खुद के स्तर से इस विषय में कोई आदेश या निर्णय पारित नहीं किया गया था बल्कि यह फैसला कैबिनेट ने हीं लिया था।

आपको बता दें साल 2010-11 में राज्य सरकार ने 21 चीनी मिलों को बेचने का फैसला लिया था जिसमें दस चीनी मिलें चालू थीं और ग्यारह मिलें बंद थीं।इस सौदे पर काफी सवाल उठे थे जो जायज थे।तत्कालीन सरकार के विश्वासपात्रों को चीनी मिल औने पौने में बेच दिया गया था और सबसे गंभीर बात ये थी कि जिन्होंने मिल को खरीदा था उन्होंने फर्जी दस्तावेज बनाकर अहृर्ता हासिल की थी।इस सौदे में भष्टाचार हुआ है इसमें किसी को संदेह नहीं है मगर इस समय जब आचार संहिता लगी है सीबीआई का एक्शन संदेह पैदा करता है जबकि चुनाव आयोग ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी संस्था का उपयोग करने से लेकर उनकी इजाजत लेना जरूरी है मगर दंभी सरकार को ये कहाँ मंजूर।

योगी आदित्यनाथ ने 2017 में मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद गन्ना विकास की बैठक में ये फैसला लिया था कि इस मामले की जाँच सीरियस फ्राड इनविस्टिगेशन आर्गेनाइजेशन(एसएफ आईओ)से कराएगी।एसएफआईओ ने जाँच कर रिपोर्ट दी कि कुछ मिलों के खरीददारों ने जाली दस्तावेज प्रस्तुत कर मिलों को खरीदा है।एसएफआईओ के रिपोर्ट पर चीनी निगम के प्रबंध निदेशक की ओर से गोमतीनगर थाने में धोखाधड़ी का एफआईआर दर्ज कराया गया था।इसके बाद योगी सरकार ने 2018 में चीनी मिल विनिवेश की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी।

अब ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जो जाँच की सिफारिश 2018 मे की गई थी उसका एक्शन लोकसभा चुनाव के समय जब आदर्श आचार संहिता लगी है तब हो रहा है,सरकार का ये कदम साफतौर पर ये इशारा कर रही है कि उनकी मंशा विपक्षियों को डराना है।सरकारी तोते का इस्तेमाल कर विपक्षियों पर अनावश्यक दवाब बनाया जा रहा है ताकि विपक्षी एक न हों सकें।

अगर सरकार की मंशा साफ होती तो चुनाव बाद भी इस मामले पर कार्रवाई की जा सकती थी लेकिन सरकार की मंशा तो भयभीत करना है।बडी बडी बात करनेवाले और अपने आप को मर्यादा पुरुषोत्तम राम समझने वाले नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की मंशा जनता समझ रही है,आप ये भ्रम में कतई न रहें कि जनता बेवकूफ है।

मैं स्वंय मानता हूँ कि इस मामले में भष्टाचार हुआ है और सीबीआई जांच होनी चाहिए मगर ये टाइमिंग गलत है और गलत संदेश पब्लिक में जा रहें हैं।

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