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अनलॉक्ड : खुली हवाओं में सांस ले रहे हैं जीव-जन्तु

Bhola Tiwari Apr 03, 2020, 2:13 PM IST टॉप न्यूज़
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● लाॅकडाउन का यह वाकई सुखद और सकारात्मक असर

● कोरोनावायरस महामारी से जहां विश्व का हर देश, हर मानव, जीवन की भीख मांग रहा हो  वही जीव जंतुओं के लिए उत्सव की तरह है लॉक डाउन 


योगेन्द्र प्रताप

रांची : बेशक, वैश्विक महामारी कोरोना ने भारत सहित पूरी दुनियां में ऐसी तबाही मचाई है कि इससे उबरने में शायद वर्षो लगें परंतु इसी बीच लाॅकडाउन के दौरान प्रकृति से जुड़ी कई ऐसी मनोरम व सुखद तस्वीरें दिखीं हैं जो हमारे-आपके मन को काफी सुकून देने वाली है।

हम चंद तस्वीरों का जिक्र करना चाहेंगे जो हम सबको सोचने पर मजबूर कर देगी कि लाॅकडाउन का यह वाकई सुखद और सकारात्मक असर है।


आपमें-हममें से कितनों ने दिल्ली-यूपी जैसे महानगरों की व्यस्ततम इलाके में कभी नीलगाय को विचरण करते देखा है ? क्या हम आज के परिवेश में जब सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में मोर को विचरण करते हुए देखने के लिए हमारी आंखें तरसती हैं तो ऐसे में मुंबई जैसे महानगर की काॅलोनी में इसके पंखों की इंन्द्रधनूषी छटां बिखेरने की कल्पना भी कोई कैसे कर सकता हैं ? किसी समुद्र तट पर एक नहीं, 100 नहीं, 1000 नहीं, 1 लाख नहीं बल्कि करीब 8 लाख कछुओं को बेफिक्री से घूमते हुए देखना क्या हम सभी सपने में भी सोच सकते हैं ? यकीनन आपको-हमको इसपर विश्वास नहीं होगा पर यह सोलह आने सच है। आज जब लाॅकडाउन के दौरान इंसानी जिन्दगियां घरों में कैद है तब जीव-जन्तु खुली हवाओं में सांस ले रहे हैं।


साउथ मुंबई की काॅलोनी में मोर का घूमना, उड़ीसा के समुद्री तट पर अंडे देने के लिए 8 लाख ओलिव रिडले कछुओं का निकलना, नोएडा जीआईपी माॅल के पास नीलगाय का बिना भय के घूमना आदि बताता है कि जिन्दगी की आपाधापी , बढ़ती तकनीकी उन्नति और अपनी अज्ञानता की वजह से हम प्रकृति से कटकर इतनी दूर आ चुके हैं कि यही उन्नति अब हमारे लिए जानलेवा व अभिशाप बन चुकी है।


आज के दिनों में सभी के पास प्रकृति का आनन्द उठाने का कम समय है। बढ़ती भीड़ में हम प्रकृति का सुख लेना और अपने को स्वस्थ रखना भूल गये हैं। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने भी आगाह किया है कि जिस प्रकार मानव जाति संसाधनों का दुरूपयोग कर रही है कि मानव का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। आकस्मिक दुर्घटना की वजह से ही सही परंतु इस लाॅकडाउन ने हमें प्रकृति के काफी करीब लाया है और इंसान व प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को भी जीवंत करते हुए आगाह किया है कि प्रकृति का सरोकार केवल मानव भर नहीं है। एक छोटे से शब्द ”प्रकृति“ में कितना कुछ समाहित है, आप-हम सोच भी नहीं सकते। प्रकृति के अन्दर वायु, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदियाँ, सरोवर, झरने, समुद्र, जंगल, पहाड़, खनिज आदि और न जाने कितने प्राकृतिक संसाधन आते हैं। दिक्कत है कि हमें प्रकृति से सारी सुविधा चाहिए परंतु अपनी शर्तो पर। प्रकृति के अंसतुलन की यही बड़ी वजह है। प्रकृति का असंतुलन होना ही भूकंप, तूफान और ऐसी महामारी के रूप में आने वाली आपदाओं का कारण है। प्रकृति के बिना तो मानव जाति का जीवन ही बेरंग है। लाॅकडाउन के कारण देश की आबोहवा भी बदल रही है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट के अनुसार लाॅकडाउन के कारण चंद दिनों में ही देश के 91 शहरों में वायु प्रदूषण न्यूनतम हो गया। कुछ माह पूर्व ऐसे कई शहर जहां की फिजांओं में जहरीली हवाएं तैरती थी वहां अब लोगों को शुद्ध हवाएं नसीब हो रही हैं। यही नहीं पावन गंगा नदी का जल फिर से निर्मल होने लगी है। लाॅकडाउन ने एक और बड़ा सामाजिक बदलाव लाया है। इसके कारण परिवारों के बीच की दूरियां पटने के साथ आपसी आत्मीयता भी प्रगाढ़ हुआ हैं,।


यही नहीं पति-पत्नी और औलाद भर को ही परिवार समझने वालों को भी यह दिव्य ज्ञान मिला है कि परिवार का दायरा इससे कहीं व्यापक होता है। कह सकते हैं कि प्रकृति व भारतीय संस्कृति से जुड़ी कई चीजें जो हम कितनी भी दौलत खर्च कर उसकी अनुभूति नहीं कर सकते थे या पा नहीं सकते हैं, इस चंद दिनों के लाॅकडाउन से हमें जाने-अनजाने प्राप्त हुई है। क्यों नहीं हम इससे मिले अनायास सबक को अपनी प्रकृति व सम्यता सहेजने में उपयोग करें। प्रकृति को संतुलित करने के लिए क्यों नहीं प्रतिवर्ष कुछ दिनों के लिए पूरी दुनियां में एक साथ सप्ताह-दस दिन का लाॅकडाउन हो। हम दुनियां के सभी राष्ट्र अध्यक्षों से अपील करते हैं कि हर साल पूरी दुनियां में एकसाथ एक तयशुदा तिथि को सप्ताह-दस दिन का लाॅकडाउन करने की जरूरत है। जब आपदाओं में हम इसका पालन कर सकते हैं तो प्रकृति से जुड़ाव व आत्म संतुष्टि के लिए इसके पालन करने में भला किसे इंकार होगा। आईए, हम सभी मिलकर इस संदेश को चेन बनाकर जन-जन पहुंचायें ताकि हम पुनः प्रकृति की ओर लौट सकें।

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