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मैं, सरकारी सिस्टम के साथ हूँ

Bhola Tiwari Apr 03, 2020, 6:42 AM IST टॉप न्यूज़
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 डॉ सुनील उपाध्याय

देहरादून : कोरोना ने एक बात तो स्पष्ट कर दी कि जब भी किसी देश और समाज पर संकट आता है तो सरकारी तंत्र ही मजबूती से खड़ा रह पाता है। चूंकि निजी क्षेत्र बुनियादी तौर पर लाभ के उद्देश्य से प्रेरित होता है इसलिए संकट के वक्त उसका गायब हो जाना स्वाभाविक लग सकता है। दो बड़े उदाहरण देख लीजिए, भारत सरकार ने इंडियन एयरलाइंस को निजी क्षेत्र के हाथों सौंपने का निर्णय कर लिया है। तकनीकी तौर पर देखें तो कुछ वक्त बाद भारत मे कोई सरकारी एयरलाइन नहीं होगी। यानी पूरा एयरस्पेस निजी कंपनियों के लिए खुला हुआ है। अब पिछले एक महीने पर निगाह डाल कर देख लीजिए। दुनिया के जिन हिस्सों से वहां फंसे हुए भारतीयों को लेकर आना था तो उन्हें कौन सी कंपनी अपनी जिम्मेदारी निभा रही थी ? केवल वही सरकारी कंपनी जो निजी क्षेत्र की तरफ धकेल दी गई है।

इंडियन एयरलाइंस इटली, स्पेन, चीन, ईरान, अमेरिका और दुनिया के उन तमाम देशों से भारतीयों को लेकर आई है, जहां जाने का मतलब कोरोना की चपेट में आ जाना है। कल्पना करके देखिए भारत में कोई भी सरकारी एयरलाइंस ना हो और फिर कोई इतना बड़ा संकट खड़ा हो जाए तब निजी क्षेत्र किस तरह से काम करेगा। यह ठीक बात है कि सरकार के पास इस तरह के कानून और अधिकार हैं कि निजी क्षेत्र की कंपनियों का अधिग्रहण किया जा सकता है या कानून और सेना आदि की मदद लेकर उन कंपनियों को सरकारी कंपनी की तरह व्यवहार करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता है। अपने आसपास ऐसा उदाहरण ढूंढना मुश्किल हो जाएगा, जिसमें निजी कंपनियों ने ऐसी भूमिका निभाई है जैसे कि कोई सरकारी कंपनी है या राष्ट्रीय कंपनी निभाती है

दूसरा उदाहरण हेल्थ सेक्टर का देख लीजिए। बीते 20-25 साल में भारत में हेल्थ सेक्टर में निजी क्षेत्र का व्यापक विस्तार हुआ है। आज यह विस्तार कोई उम्मीद नहीं जगाता, बल्कि डर पैदा करता है। अपवाद मौजूद हो सकते हैं, लेकिन इस वक्त अपने आसपास के बड़े और निजी अस्पतालों के बारे में और उनके नामी डॉक्टरों के बारे में सोच कर देखिए जिनकी सामान्य ओपीडी फीस एक हजार तक है, वे इस वक्त कहां हैं ?

इस वक्त हालात को संभालने में कौन जुटे हैं, वही सरकारी डॉक्टर, वही सरकारी अस्पताल और उनके कर्मचारी, जो हमारी निगाह में सबसे गये-गुजरे हैं। सुनने में आ रहा है कि कई बड़े नामी प्राइवेट डॉक्टरों ने खुद को बीमार घोषित कर लिया है ताकि इस मौके पर कहीं सरकार उनको काम करने के लिए बाध्य न कर।दे। संकट की इस घड़ी में होना तो यह चाहिए था कि सारे निजी क्षेत्र के अस्पताल, उनके डॉक्टर और कर्मचारी इस वक्त सरकारी सिस्टम का हिस्सा बन जाते और लोगों को मदद पहुंचाते।

मैं फिर कह रहा हूं कि अपवाद हर जगह संभव है, लेकिन सामान्यतौर पर कहीं भी निजी क्षेत्र के डॉक्टर, अस्पताल, उनके संचालक उस तरह से लोगों के साथ नहीं खड़े हैं, जिस तरह से सरकारी चिकित्सा तंत्र काम कर रहा है। यहां पर भी वही लाभ कमाने का नियम लागू होता है। चूंकि प्राइवेट अस्पतालों और उनके संचालकों के लिए कोरोना कोई लाभदायक स्थिति पैदा नहीं कर रहा है इसलिये वे चुप खड़े हैं। कोरोना उनके लिए खतरा है कयोंकि एक व्यक्ति का संक्रमण पूरे अस्पताल को अपनी चपेट में ले सकता है इसलिए से दूर हैं। आज दोबारा सोचें कि निजी क्षेत्र से हम तभी लाभ ले सकते हैं, जब उसके समानांतर हमारा सरकारी तंत्र मजबूत हो। जैसे-जैसे सरकारी तंत्र कमजोर होगा, वैसे-वैसे निजी क्षेत्र हावी होगा और संकट के वक्त दूर खड़ा दिखाई देगा।

आज दोनों तरह के उदाहरण सामने हैं। पहला उदाहरण चीन देख लीजिए। चीन में पूरा तंत्र सरकार के हाथ में है इसलिए सरकार ने उस हद तक पूरे तंत्र को लगाकर रखा, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। दूसरा उदाहरण यूरोपीय देशों का है। यूरोप में सरकारी तंत्र की तुलना में निजी क्षेत्र ज्यादा मजबूत है। इस वक्त इटली में जो हालात पैदा हुए और अमेरिका में जो स्थितियां हैं, उनसे सहज अनुमान लगाया जा सकता है। दुनिया के सबसे ज्यादा ताकतवर, आर्थिक रूप से सक्षम, बेहद प्रभावशाली और सबसे ज्यादा योग्य लोगों वाले देश इसलिए फेल हो गए क्योंकि उनका निजी क्षेत्र खासतौर से हेल्थ सेक्टर के लोग उस रूप में मदद करने को तैयार नहीं हुए या उस रूप में काम नहीं कर पाए, जिस रूप में चीन के सरकारी सिस्टम ने किया। एक छोटे से देश का उदाहरण लें, क्यूबा के सरकारी सिस्टम ने जिस तरह से काम किया, वह अपने आप में अद्भुत है। कुछ लाख की आबादी वाले क्यूबा ने न केवल अपने देश की परिस्थितियों को संभाला, बल्कि देश के बाहर दूसरे देशों को भी डाक्टर उपलब्ध कराए। रूस में भी सरकारी सिस्टम काफी मजबूत है। वहां पर भी अन्य देशों की तुलना में कोरोना के काफी कम मामले हैं और सरकार बेहद प्रभावशाली ढंग से काम कर रही है ।

भारत में हम संक्रमणकालीन स्थिति में खड़े हुए हैं। यह जरूर है कि पिछले 20-25 साल में हेल्थ सेक्टर में हमारे यहां पर निजी क्षेत्र काफी तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन अभी तक भारत का पुराना सरकारी हेल्थ सिस्टम काम कर रहा है और उसी की बदौलत हम कोरोना से मुकाबले की स्थिति में खड़े हुए दिख रहे हैं। आज ये अवसर है कि निजी क्षेत्र के गुण गाने वालों को आँख खोलकर देखनी चाहिए कि सरकारी तंत्र का मजबूत होना क्यों जरूरी है।

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