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खतरे में प्रिंट मीडिया

Bhola Tiwari Apr 01, 2020, 6:49 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ सुशील उपाध्याय

देहरादून : देश मे प्रिंट मीडिया के सामने कोरोना ने एक बड़ा सवाल पैदा कर दिया है कि क्या हालात सामान्य होने के बाद प्रिंट मीडिया वैसी ही स्थिति में रह पाएगा जैसा कि इस महामारी के शुरू होने के पहले था ? पिछले 15 दिन में ऐसी कई चीजें हुई हैं, जो प्रिंट मीडिया पर, चाहे वह हिंदी का प्रिंट मीडिया हो, अंग्रेजी का हो अथवा अन्य किसी भाषा का, एक बड़े खतरे की तरफ इशारा करती हैं। लोगों के मन में व्यापक रूप से डर बैठ गया है कि अखबारों के जरिए भी इस वायरस का फैलाव हो सकता है। 

देश के तमाम बड़े अखबार बार-बार एक्सपर्ट्स के जरिए इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं कि अखबारों के माध्यम से इस वायरस के फैलाव का कोई सबूत पूरी दुनिया में सामने नहीं आया है। उनके इस दावे के बावजूद लोग बेहद तेजी से अखबारों से दूर होते दिख रहे हैं। इसका बड़ा उदाहरण यह है कि मुंबई में देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार का प्रकाशन स्थगित कर दिया गया है। एक करोड़ से अधिक पाठक संख्या वाले इस अखबार के एक चौथाई पाठक अकेले मुंबई में हैं।

इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों में अखबारों की बिक्री में बहुत बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। अगर उत्तराखंड को आधार मान लें तो यहां के तीनों प्रमुख हिंदी अखबारों की बिक्री 15 दिन में आधी हो गई है और इस बात का डर है कि अगले 15 दिन में अखबारों की कुल बिक्री में और गिरावट आ सकती है। शुरू में अनुमान लगाया गया था कि लॉकडाउन के दौरान लोगों में अखबार पढ़ने की आदत में वृद्धि होगी, क्योंकि तब उनके पास काफी खाली वक्त होगा। दैनिक भास्कर ग्रुप ने इस बारे में अपने सभी कार्यालयों को पत्र भेजकर अधिक से अधिक खबरें जुटाने के निर्देश दिए थे क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि घरों में रहने के दौरान लोगों की रीडिंग हैबिट बढ़ेगी। पर परिणाम इसके उलट आते दिख रहे हैं। फिलहाल ज्यादातर अखबारों के कुल पृष्ठों की संख्या में एक तिहाई से लेकर आधे तक की कमी आ गई है। फरवरी तक जो अखबार 20-24 पेज का होता था, अब वह अखबार 10-12 पेज का रह गया है और अगर स्थिति न सुधरी तो इस बात की संभावना है कि ज्यादातर प्रमुख अखबार खुद को 8 पेज के दायरे में समेट लेंगे। वे चाहे हिंदी के अखबार हों या अंग्रेजी के।

ऐसे मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं कि देश के कई शहरों में अखबारों को बांटा नहीं जा रहा है। पाठक भी लगातार हॉकर्स को मना कर रहे हैं कि जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते उनके घरों पर अखबार न पहुंचाए जाएं। ज्यादातर छोटे शहरों और कस्बों में बीते एक सप्ताह से अखबार नहीं पहुंच रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यदि किसी कार्य को तीन-चार हफ्ते कर लिया जाए या पूर्व की किसी आदत को तीन-चार हफ्ते रोक लिया जाए तो उससे स्वाभाविक तौर पर दूरी बन जाती है। इसी बात को अखबार पढ़ने की आदत पर लागू करके देखिए। यदि लोगों में अगले तीन-चार सप्ताह तक अखबार पढ़ने की आदत न रहे तो इसके बाद उन्हें पुराने लेवल पर लेकर आना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। यह साफ संकेत है कि अप्रैल के आखिर तक हालात सामान्य होने के बावजूद अखबारों की रीडरशिप में कमी आएगी ही। 

इस बीच एक बड़ा नुकसान यह हुआ है कि अखबारों को विज्ञापनों से होने वाली इनकम बुरी तरह सिमट गई है। कोरोना जागरूकता के विज्ञापनों को छोड़ दें तो न सरकारी विज्ञापन दिखाई दे रहे हैं और न ही इंडस्ट्री या सर्विस सेक्टर के विज्ञापन दिख रहे हैं। जैसे-जैसे लॉकडाउन की अवधि लंबी होगी, अभी अखबारों में जो विज्ञापन दिख रहे हैं, उनमें भी कमी आनी शुरू हो जाएगी। खबरों के लिए अखबारों पर पाठकों की निर्भरता कम होने का एक बड़ा सबूत यह है कि पिछले 15 दिन में भारत के ज्यादातर हिस्सों में इंटरनेट डाटा की खपत में 50% तक की बढ़ोतरी हुई है। यह माना जा रहा है कि पाठकों का एक हिस्सा ऑनलाइन खबरें पढ़ने की तरफ चला गया है। लॉकडाउन की इस अवधि में टीवी और ऑनलाइन न्यूज़ माध्यमों पर लोगों की निर्भरता बढ़ने की संभावना दिख रही है। प्रिंट मीडिया पर पड़ने वाली मार आने वाले दिनों में और भी कई रूपों में दिखाई देगी।

इसका एक असर तो यह होगा कि हिंदी के अखबारों के जिला स्तरीय स्थानीय संस्करण बंद होने शुरू हो जाएंगे या फिर इन संस्करणों को अन्य संस्करणों में मिलाने का सिलसिला शुरू होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड में यहां के प्रमुख अखबारों द्वारा स्थानीय स्तर के संस्करण प्रकाशित किए जाते हैं। अब जिला स्तर के संस्करणों को समेटा जा रहा है और ज्यादातर स्थानों पर मास्टर एडिशन की पुरानी व्यवस्था को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है। 

इसका अर्थ यह होगा कि मेरठ, देहरादून, कानपुर लखनऊ, पटना, रांची, चंडीगढ़, भोपाल, जयपुर आदि जगहों से छपने वाले अखबार लगभग 20 साल पुराने फॉर्मेट में जाने के लिए बाध्य होंगे यानी तब हर जिले के लिए अलग संस्करण नहीं होंगे, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक ही संस्करण होगा। इससे अखबारों के लिए अपने मौजूदा मानव संसाधन को इतने बड़े पैमाने पर रखने की जरूरत नहीं रह जाएगी। इससे छंटनी का दौर भी शुरू होने का डर है। बड़े अखबार जैसे-तैसे अपने वजूद को बचा लेंगे, लेकिन पत्रिकाओं और छोटे अखबारों के लिए स्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण होंगी। 

मोटे तौर पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आने वाले दिनों में प्रिंट मीडिया के सामने एक बड़ा खतरा मौजूद है। कम से कम इस साल प्रिंट मीडिया के विस्तार की संभावना को तो भूल जाइए, यदि प्रिंट मीडिया अपनी मौजूदा स्थिति को भी सुरक्षित रख ले जाए तो यह भी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं होगा।

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