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लियोरा, तुम अकेली नहीं हो!

Bhola Tiwari Mar 30, 2020, 7:15 AM IST राष्ट्रीय
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डॉ सुशील उपाध्याय

देहरादून : गैबरियल गार्सिया मार्खेज की एक किताब है, 'एकांत के सौ बरस'। यह उपन्यास है, जो मनुष्य की संभावना और उसके कल्पना लोक की अद्भुत प्रस्तुति है। कहानी का विस्तार पूरी मानवता के सामने एक चुनौती पैदा करता है और साथ ही उम्मीद भी जगाता है। एक और किताब है, सिंक्लेयर लुईस की 'एरोस्मिथ'। यह युवा डॉक्टर की कहानी है, जो अमेरिका में प्लेग की महामारी के दौरान अपने वजूद को तलाशता है और व्यवस्था से संघर्ष करता है।

यूं तो दोनों उपन्यासों में बाहरी तौर पर कोई समानता नहीं है, लेकिन दोनों का एक अंतर-कथ्य इस रूप में समान है कि मनुष्य अपने सर्वाधिक संकट के समय में नितांत अकेला होता है। यह बात अलग है कि बहुत सारे अकेले लोग मिलकर एक बड़े समूह का निर्माण कर लेते हैं। उनके बीच में डर एक साझा संपत्ति की तरह होता है। यह डर उन्हें जोड़े रखता है और यही डर उनके वजूद का निर्धारण भी करता है।

बीते दो-तीन दिन के वक्त पर निगाह डाल कर देखिए तो हम में से ज्यादातर लोग इस डर को अपने भीतर और अपने आसपास महसूस कर सकते हैं। एक बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने है कि आखिर हम किस को बचाना चाहते हैं ? आदर्शवादी दृष्टि से देखें तो कह सकते हैं कि हम मानवता को, अपने समाज और अपने देश को बचाना चाहते हैं। थोड़ा यथार्थ के धरातल पर आये तो हम अपने परिवार, अपने दोस्तों और परिचितों को बचाना चाहते हैं, लेकिन कटु यथार्थ इसके दूसरी तरफ इशारा करता है। शायद हम खुद को ही बचाना चाहते हैं या ज्यादा से ज्यादा उनको बचाना चाहते हैं, जिनकी मौजूदगी में अपने वजूद को महसूस कर पाते हैं।

एक लोककथा है, जिसमें किसी राक्षस को संतुष्ट करने के लिए गांव के लोगों को हर रोज एक इंसान को भेजना होता है। वहां दो तरह के विचार या धारा मौजूद हैं। पहला विचार जोर देता है कि सबसे अनुपयोगी और उम्रदराज लोगों से शुरुआत की जाए ताकि उपयोगी, सक्रिय और योग्य लोग समाज में बचे रहें, लेकिन एक दूसरी धारा भी मौजूद है जो लोगों को उनकी उपयोगिता, सक्रियता और ऊर्जा के आधार पर नहीं देखती। इस धारा के लिए किसी बुजुर्ग का जीवन भी उतना ही उपयोगी है, जितना कि किसी युवा का। 

विश्व के संदर्भ में देखें तो कोरोना के संकट ने हम में से ज्यादातर लोगों को पहली धारा या विचार के साथ खड़ा कर दिया है, राक्षस को यदि बलि देनी है तो फिर उन लोगों की दी जाए जो कथित तौर पर समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं। पश्चिम के देशों ने लगभग यही पद्धति अपनाई और ज्यादा दिन नहीं लगे जब कोरोना रूपी राक्षस ने कथित अनुपयोगी बुजुर्गों के साथ-साथ उपयोगी युवाओं की भी बलि लेनी शुरू कर दी। एक तरफ हम मानवता को बचाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ इतने आत्मकेंद्रित हो जाते हैं कि खुद को और अपने दायरे को ही बचाने में सिमट जाते हैं। वास्तव में, आज मानवता पर बड़ा संकट है और इस महामारी ने हमारे भीतर के उस हिस्से को उधेड़ कर रख दिया है, जिसे हमेशा छिपाए रहते हैं। 

ऐसे में, अचानक महसूस करते हैं कि आप एकांत के सौ बरस उपन्यास के किसी पात्र में परिवर्तित हो गए हैं या फिर एरोस्मिथ के किसी मरीज में बदल गए हैं, जिसके ठीक होने की अब कोई संभावना नहीं बची है। तब आप मृत्यु से ज्यादा इस बात से डरे होते हैं कि एक-एक कर आपके अपने लोग दूर हो जा रहे हैं क्योंकि वे खुद को आसानी से मृत्यु को नहीं सौंपना चाहते। सबकी किस्मत डॉक्टर ऐरोस्मिथ की प्रेमिका लिओरा जैसी नहीं होती, जिसकी मृत्यु एकाकी नहीं है और ना ही वो मानवता द्वारा त्यागी गई। अपने आसपास के माहौल को महसूस करके देखिए, लगेगा जैसे किसी अनजान दुश्मन ने घेरा हुआ है, जो हमें दिख नहीं रहा लेकिन जिसके आने और मौजूद होने का शोर चारों तरफ सुनाई पड़ रहा है। 

आपने कभी किसी मरते हुए आदमी को प्रलाप करते हुए देखा हो तो आप आज के माहौल को बहुत गहरे तक महसूस कर पाएंगे। मृत्यु का सामना कर रहा है व्यक्ति अचानक ऐसी बातें कहने लगता है जो न तो तार्किक होती हैं और न ही उनमें कोई कथा-सूत्र मौजूद होता है। यह असंबद्ध प्रलाप जीवित जागृत मनुष्यों की रूह तक पहुंच जाता है और उनके तमाम छिपे हुए भय सामने आ खड़े होते हैं। सच में, कोरोना यही सब कर रहा है कि वह हमारे छिपे हुए भयों को नंगा करके सामने ला दे रहा है। 

आज सोशल मीडिया के रूप में हमारे सामने एक ऐसा मंच मौजूद है, जहां अपने द्वंद्वों को आसानी से कह और लिख पाते हैं इसलिए कथार्सिस की प्रक्रिया सहज रूप से घतित हो पाती है। उस वक्त के बारे में सोचकर ही कंपकंपी होती है, जब मनुष्य के पास ये सारे संसाधन नहीं थे और वह अपने डर के साथ निपट अकेला खड़ा हुआ था। आज तकनीक ने सभी को यह सामर्थ्य दिया है कि लोग अपनी आज की परिस्थितियों को चुनौती दे सकें। चुनौती देने के इसी प्रोसेस से मैं भी रूबरू हूं और आप भी। ऐसे हालात में एकांत के सौ बरस का हिस्सा बन जाने में कोई बुराई नहीं है।

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