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विएतनाम पर बीबीसी की रिपोर्ट : किस पर भरोसा करें!

Bhola Tiwari Mar 29, 2020, 4:41 PM IST टॉप न्यूज़
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● पश्चिमी मीडिया का यही रुख भारत के मामले में भी देखने को मिलता है और आगे भी मिलेगा

 

डॉ सुशील उपाध्याय

देहरादून : कोरोना के खिलाफ दुनिया भर में सरकारों ने जिस तरह के कदम उठाए, उसमें मोटे तौर पर दो तरीके अनपाए गए। पहला तरीका चीन और विएमनाम, क्यूबा आदि अन्य छोटे वामपंथी देशों ने अपनाया, जबकि दूसरा तरीका अमेरिका और यूरोप ने अपनाया। मार्च के आखिर तक दुनिया भर में चीनी तरीका ही ज्यादा सफल रहा। हालांकि, पश्चिमी देशों और वहां के मीडिया ने चीन के तरीके पर सवाल खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये बात अलग है कि बाद में ज्यादातर यूरोपीय देशों को भी चीन के माॅडल को ही अपनाना पड़ा। जहां तक हांगकांग, ताइवान, नार्वे या सिंगापुर जैसे छोटे देशों या स्वायत्त क्षेत्रों की बात है, वहां आबादी कम होने के कारण सरकार इतनी सक्षम थी कि व्यापक पैमाने पर लोगों की जांच करवा सकी।

चीन के माॅडल को ही विएतनाम ने फाॅलो किया और मार्च के आखिर तक उसके परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे। विएतनाम की सीमा चीन से मिली हुई और दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही व्यापक पैमाने पर है। विएतनाम की तारीफ इसलिए भी होनी चाहिए कि जब भारत और यूरोप में खुशफहमी फैली हुई थी, तब जनवरी के आखिर में विएतनामी नया वर्ष मनाने के बाद सरकार ने सख्ती शुरू कर दी थी। फरवरी में ही विदेशियों की आमद रोक दी गई थी और विदेश से लौटे विएतनामियों के लिए अनिवार्य क्वारेंटीन लागू कर दिया था। जब दुनिया भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या लाखों में पहुंच गई थी, तब विएतनाम में यह हजार तक भी नहीं पहुंची थी। इसके लिए विएतनाम के लोगों और वहां की सरकार की तारीफ होनी चाहिए, लेकिन ऐसे मामलों में पश्चिमी मीडिया का रुख प्रायः नकारात्मक ही रहता है। विएतनाम में कोरोना की स्थिति को लेकर 26 मार्च, 2020 को बीबीसी-हिंदी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, इस रिपोर्ट को टोन और इसमें छिपे मैसेज को देखिए तो आसानी से अंदाजा हो जाएगा कि प्रायः स्वतंत्र माना जाने वाला मीडिया भी वामपंथी देशों के बारे में किस तरह के पूर्वाग्रहों का प्रदर्शन करता है। इस पूरी रिपोर्ट को पढ़ने के बाद कोई भी इस सहज निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि विएतनाम में आम लोगों पर बहुत ज्यादती की जा रही है और वहां सरकार ने पूरे देश पर क्वारंटीन लागू कर दिया है। ऐसे हालात में जब अमेरिका और यूरोप के संपन्न देश अपने हालात को काबू नहीं कर पा रहे हैं, उन स्थितियों में यदि विएतनाम ने अपने लोगों को कोरोना के प्रसार को रोकने की जिम्मेदारी दी है तो वह गलत कैसे है ?

बीबीसी-हिंदी पोर्टल पर लिखा गया, ‘‘ वियतनाम ने अपनी आबादी को कोरोना के खिलाफ जंग में लगा दिया है। संक्रमण को अपेक्षाकृत कम स्तर पर रोकने और मौतों का आंकड़ा नहीं बढ़ने देने के लिए वियतनाम की तारीफ हो रही है। लेकिन, इस प्लान की मानवीय मूल्य क्या है ? बीबीसी ने एक ऐसी महिला से बातचीत की है जिसे हो ची मिन्ह सिटी की सरकारी फैसिलिटी में क्वारंटीन किया गया है। चीन के साथ सीमा जुड़ी होने के बावजूद वियतनाम में कोविड-19 के कम मामले सामने आए हैं। लेकिन, इस कहानी का एक पहलू यह भी है कि लोगों को जबरदस्ती सरकारी इकाइयों में क्वारंटीन रखा जा रहा है। कोई भी ऐसा शख्स जिसके वायरस से संक्रमित होने का शक है, उसे सरकार जबरदस्ती क्वारंटीन कर रही है। जब लान आन्ह (असली नाम छिपा लिया गया है) ऑस्ट्रेलिया में अपने रिश्तेदारों के यहां दो हफ्ते बिताकर वापस अपने घर लौटीं तो उन्हें हो ची मिन्ह सिटी की नेशनल यूनिवर्सिटी में तैयार की गई सरकारी फैसिलिटी में ले जाया गया। उन्होंने बीबीसी वियतनामीज को बताया कि उन्हें यहां किन चीजों का सामना करना पड़ा। लान आन्ह ने कहा, ’टॉयलेट गंदगी से काला पड़ गया था और सिंक ठहरे हुए पानी से भरी हुई थी।’ उन्होंने कहा, ’सौभाग्य से बुरी बदबू तो नहीं आ रही थी, लेकिन यह बेहद गंदा था। बैड पर जंग लगी थी। हर जगह धूल और मकड़ियों के जाले थे।’ पहली रात ज्यादातर लोगों को केवल एक दरी दी गई, तकिये या गद्दे नहीं मिले। मौसम में गर्मी और आर्द्रता थी, लेकिन कमरे में केवल एक पंखा था। लान आन्ह की चिंता यह थी खराब स्थितियों में लोगों में यह डर भी बढ़ रहा था कि उनके आसपास रह रहे लोगों में से किसी को कोरोना न हो। उन्होंने कहा, ’हमें सुविधाएं नहीं चाहिए थीं, लेकिन साफ-सफाई जरूरी थी।’

वियतनाम की सरकार ने मेडिकल स्टाफ, सुरक्षा बलों और सामान्य नागरिकों को भी इस वायरस से लड़ने के लिए तैनात कर दिया है। लेकिन, वियतनाम की रणनीति दक्षिण कोरिया जैसे अमीर एशियाई देशों से अलग है। इन देशों ने महंगी टेस्टिंग को बड़े पैमाने पर अपनाया है। वियतनाम एक सघन आबादी वाला देश है, जहां करीब 10 करोड़ लोग रहते हैं। देश की कम्युनिस्ट सरकार ने वायरस को सख्ती से रोकने का फैसला किया है। 25 मार्च तक वियतनाम में कोरोना के 141 मामले थे, जबकि इस दौरान एक भी मौत नहीं हुई। सरकार ने पहले ही एलान कर दिया था कि विदेश से लौटने वाले हर शख्स को 14 दिन के लिए क्वारंटीन में रहना होगा। इनमें से तीन ब्रिटिश लड़कियां भी थीं जिन्हें हा लोन्ग बे में उनके हॉस्टल में ढूंढ निकाला गया। ये मार्च की शुरुआत में वियतनाम पहुंची थीं। यह पता चला था कि इसी फ्लाइट में एक लड़की कोविड-19 पॉजिटिव पाई गई थी। तीनों लड़कियां अपने घर से भाग न जाएं इसके लिए पुलिस तैनात कर दी गई थी। ये तीनों लड़कियां 20-30 साल की उम्र की थीं। टेस्ट करने के दो दिन बाद पता चला कि ये लड़कियां वायरस से संक्रमित नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें अगले 12 दिनों के लिए आइसोलेशन में भेज दिया गया। इनमें से एक लड़की एलिस पार्कर ने कहा कि जिस हॉस्पिटल में उन्हें रखा गया था वह एक शरणार्थी शिविर था और रात के वक्त बेहद डरावना हो जाता था। बीबीसी को पता चला है कि इन युवा बैक पैकर्स को अब छोड़ दिया गया है और वे इंडोनेशिया के बाली जा चुकी हैं।

वियतनाम ने यूरोपीय देशों की तरह लॉकडाउन से परहेज किया है, लेकिन इसने वायरस से प्रभावित बड़े समुदायों को क्वारंटीन में डाल दिया है। इन इलाकों में 21,000 से ज्यादा लोग हैं और 30,000 और लोग सेल्फ-आइसोलेशन में हैं। विदेश से शुरू होने वाली संक्रमण की दूसरी लहर को देखते हुए सरकार ने और ज्यादा सख्ती करने का फैसला किया। 22 मार्च से वियतनाम ने सभी विदेशी नागरिकों के देश में प्रवेश पर रोक लगा दी। यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्थ कैनबरा के प्रोफेसर एमेरिटस कार्ल थायर ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया, ’वियतनाम एक मोबिलाइजेशन सोसाइटी है। यह एक वन-पार्टी स्टेट है।’ लोगों को ही कोरोना रोकने के काम में लगा दिया गया है। लोग अपने ही पड़ोसियों पर नजर रख रहे हैं। जबरदस्ती क्वारंटीन में डालने से संक्रमित लोगों के आंकड़े छिपाने का भी डर पैदा हो रहा है। पड़ोसी अक्सर संदिग्ध मामलों को छुपाते हैं और इस बात की चिंता है कि सरकार क्वारंटीन में रह रहे लोगों की निजता में दखल दे रही है। मीडिया देशभक्ति के संदेशों पर जोर दे रही है। सरकार कह रही है कि देश को आने वाले वक्त में आने वाले हजारों संभावित मामलों के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।’’

बीबीसी की यह रिपोर्ट ऐसा मैसेज देती है, जिससे यह लगता है कि विएतनाम सरकार ने लोगों की आजादी छीन ली हैं, लेकिन इसकी तुलना में इटली, स्पेन, फ्रांस और जर्मनी आदि में लगी पाबंदियों पर बीबीसी के रिपोर्टाें का टोन एकदम अलग है। वहां ये सारी बंदिशें लोगों की जान बचाने के लिए हैं, जबकि विएतनाम और क्यूबा में इन बंदिशों का मतलब लोगों की आजादी छीनना है। एक खास बात और कि इसी अवधि में दक्षिण कोरिया के प्रयासों की बीबीसी ने जी खोलकर तारीफ की है। इसकी वजह यह है कि दक्षिण कोरिया के साथ यूरोप और अमेरिका के हित बहुत गहरे तक जुड़े हैं। उल्लेखपनीय है कि मार्च के आखिर तक दक्षिण कोरिया में विएतनाम की तुलना में कई गुना मामले सामने आए और काफी संख्या में लोगों की मौत भी हुई। इस रिपोर्ट में हो ची मिन्ह सिटी स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी का जोर चित्र खींचा है, वह तथ्यों के अनुरूप नहीं है। चूंकि, इन जगहों को मैंने एक महीना पहले खुद देखा है इसलिए दावे के साथ कह पा रहा हूं कि ये रिपोर्ट पूर्वाग्रह से भरी है। पश्चिमी मीडिया का यही रुख भारत के मामले में भी देखने को मिलेगा। इस वक्त अमेरिका-यूरोप के किसी भी बड़े चैनल को देख लीजिए या आॅनलाइन खबरों को पढ़ लीजिउ तो भारत के बारे में कई नकारात्मक खबरें आसानी से मिल जाएंगी। 

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