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अब, वतन लौट जाऊंगा...

Bhola Tiwari Mar 27, 2020, 7:54 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ  सुशील उपाध्याय

देहरादून  : घर में बंद हैं और वतन याद आ रहा है। पर वह वतन है कहां, जिसकी याद इतना सता रही है। याद कीजिए एरोस्मिथ उपन्यास के प्रोफेसर गॉटलिब को, जो अपने आखिरी वक्त में यह भूल जाते हैं कि वह अमेरिका के एक महान वैज्ञानिक हैं, बस, उन्हें इतना याद रहता है कि वह जर्मनी के किसी दूरदराज के गांव से आए हैं और उन बचे हुए यहूदियों में से एक हैं, जो हिटलर की पशुता का शिकार नहीं बन पाए। प्रोफेसर गॉटलिब उसी गांव जाना चाहते हैं, पर उनके अलावा किसी को नहीं पता कि वह गांव अब कहां है क्योंकि अमेरिका में कोई भी उनकी उस भाषा को नहीं समझ पा रहा है, जो वह अपने अंतिम वक्त में बोल रहे हैं। 

दुनिया में जहां-जहां भारतीय रोजी-रोटी की तलाश में गए, जो उन जगहों के बारे में कल्पना से भी अधिक बढ़कर तारीफें करते थे, जो आसपास के तमाम लोगों की प्रेरणा कि केंद्र में थे, लोग उन्हें हसरत भरी निगाहों से देखते थे और उम्मीद करते थे कि एक दिन हम भी इन लोगों की तरह अमेरिका, इंग्लैंड, इटली, जापान या दुनिया के ऐसे ही दूसरे देशों में जाकर पैसा, पद, प्रतिष्ठा और हैसियत हासिल करेंगे, लेकिन एक कोरोना ने बता दिया कि आपकी हैसियत क्या है, आपकी प्रतिष्ठा क्या है और आपके पैसे की औकात क्या है ? 

अब जैसे भी हो, जिस भी तरह से हो आप और हम अपने वतन लौट आना चाहते हैं, अपने लोगों के बीच। ऐसा नहीं है कि वतन लौटने की प्रक्रिया किसी पराए देश से अपने देश में लौटने तक सीमित हो। अपने देश में रहकर भी आप वतन को याद करते हैं, जहां से आप आए हैं, जहां आपकी जड़े हैं और जहां आपका मिजाज गढ़ा गया है। सच ऐसा ही है , यदि ऐसा ना हो तो मुंबई, सूरत, बेंगलुरु, कोलकाता या दक्षिण के राज्यों में रह रहे उत्तर भारतीय इस तरह से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर क्यों भागने को मजबूर होते। 

वहां की बात छोड़िए देहरादून और हरिद्वार जैसी जगहों पर रह रहा पहाड़ का आदमी आज अपने गांव और घर के बारे में सोच रहा है। यह अलग बात है कि उसके वापस जाने की संभावना नहीं है। फिर भी उसकी स्मृतियों में वह गांव जरूर साकार हो गया है, जिसे भुलाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। काबुलीवाला फिल्म याद होगी और उसका वह गाना भी, 'ए मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन तुझ पर जां कुर्बान.....' ये वतन अब फिर से आत्मा में बैठ गया होगा। वास्तव में कोई कितना ही छोटा-बड़ा शहर हो, कोई देश या विदेश हो, सब तरफ तो स्ट्रेंजर फैले हुए हैं। परिचय के इतने बड़े दायरे में भी हम सभी अजनबी हैं। भले ही सोशल मीडिया पर 5000 फ्रेंड हो, भले ही आप कई संस्थाओं में सदस्य हों, भले ही आपके पास सबसे बड़े क्लबों की सदस्यता हो, भले आपके पास सबसे नए मॉडल की गाड़ियां हों, लेकिन इनमें से कोई भी वतन की टीस को खत्म नहीं करती। टीस का अहसास किसी एक पीढ़ी का मामला नहीं है, ये कई पीढ़ियों तक बना रहता है। उनमें भी बना रहता है, जिन्होंने अपने पिता और मां की भूमि को केवल किस्सों में सुना होता है।

संकट के समय में मेरे भी कई मित्र अपने गांव चले गए हैं और कई जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन लॉकडाउन में फंस गए। अब वे सब बातचीत में गांव को लिए बैठे हैं। गांव ही उनका वतन है। आज जहां वे रह रहे हैं, वह मुल्क है और मुल्क तो रोजी कमाने के लिए होता है। वहां से कुछ कमा कर हम-आप अपने वतन जाते हैं और उसी मिट्टी का हिस्सा बन जाते हैं। जितना आप सोचते जाते हैं, वतन उतना ही आपके भीतर गहरा होता जाता है या इस तरह से भी कह सकते हैं कि वतन पहले से ही गहरा होता है। बस, उस पर गर्द जमी होती है। कोरोना ने उस गर्द को हटा दिया है। इस दौर में, संभव है कुछ लोग ज्यादा परेशानी में हों और कुछ के हिस्से में कम परेशानी आए, लेकिन आत्मा के भीतर का दर्द एक जैसा ही होगा।

अपने घर के भीतर बीते 5 साल से पिताजी के मुंह से एक ही वाक्य सुन रहा हूं कि बस ठीक हो जाऊं तो गांव चला जाऊंगा। मेरे पास एक चिढा हुआ सवाल होता है कि कौन से गांव चले जाओगे, वहां जाकर क्या करोगे ? मेरे पिता न टूटने वाली चुप्पी से इस सवाल का जवाब देते हैं। अब देख लीजिए इस संकट ने सबके भीतर इसी सवाल को विराट रूप में उपस्थित कर दिया है-बस, थोड़े से हालात ठीक हो जाएं तो अपने देश लौट जाऊंगा या अपने प्रदेश लौट जाऊंगा या अपने घर चला जाऊंगा। वहीं रहकर कुछ करूंगा, यहां पराए देश में नहीं रहूंगा, पराये मुल्क और बेगानी धरती पर नहीं रहूंगा। 

असल में वतन सपनों में बैठा है, यथार्थ में कहीं नहीं है। ऐसा नहीं कि वतन लौट कर आप हर तरह से सुरक्षित हो जाएंगे। वही संकट, वही चुनौतियां, वही समस्याएं, वही रुदन, वही दुख-करुणा, सब कुछ वैसा ही रहेगा। फिर भी एक आश्वस्ति होती है कि आप अपने लोगों के बीच में है। आज कोरोना का संकट इसलिए ज्यादा बड़ा दिख रहा है क्योंकि हम अपने पड़ोस में रह रहे हैं व्यक्ति को लेकर आश्वस्त नहीं है। अपने संबंधों को लेकर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। हमारा खुद से यकीन उठ गया है। चारों तरफ फैली बेचारगी को देखिए और फिर अपने वजूद का आकलन कीजिए तो शायद कोरोना हम सबको यह समझा कर जाएगा कि हम 'नाकुछ' से ज्यादा नहीं हैं।

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