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“गूंगी गुड़िया” ने ताकतवर “सिंडिकेट” को धूल चटाई !

Bhola Tiwari Mar 26, 2020, 4:53 PM IST कॉलमलिस्ट
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली : फिरोज गांधी से इंदिरा के संबंध बेहद खराब हो चले थे। इंदिरा ने भी यह समझ लिया था कि अब फिरोज को समझाना बेकार है। इंदिरा गांधी अपने दोनों बच्चों राजीव और संजय के साथ अपने पिता के घर त्रिमूर्ति भवन में रहने आ गईं थीं। जवाहरलाल नेहरू अपनी पुत्री को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे और इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी शुरू कर दिया था मगर वो इंदिरा को पूरी तरह स्थापित कर पाते सन् 1964 में दिल के दौरे से उनकी मौत हो गई।

सारा देश शोक में था और इंदिरा को ये समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पिता के सपने को कैसे पूरा करे। जवाहरलाल चाहते थे कि उनके बाद इंदिरा हीं देश की प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गांधी को पता चला कि कांग्रेस के अध्यक्ष के. कामराज प्रधानमंत्री की खोज के लिए कार्यसमिति की बैठक करनेवाले हैं। इंदिरा ने उन्हें तुरंत पत्र लिखा कि वो चाहतीं हैं कि जब तक देश में राष्ट्रीय शोक है तब तक प्रधानमंत्री का चुनाव स्थगित कर दिया जाय। इंदिरा गांधी ने ये चिठ्ठी अपने निजी सचिव के हाथों भेजी थी। यह पत्र के.कामराज को उस समय मिला जब वो कार्यसमिति की बैठक कर रहे थे। इंदिरा के प्रति सम्मान दिखाते हुए उन्होंने उस बैठक में प्रधानमंत्री की घोषणा नहीं की मगर उन्होंने इंदिरा को ये संदेश भिजवा दिया कि अगर प्रधानमंत्री की घोषणा तत्काल नहीं की जाएगी तो जनता के बीच गलत संदेश जाएगा।

इंदिरा गांधी के पास समय बेहद कम था जब तक वो लाबिंग करतीं कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने ताकतवर मोरारजी देसाई के जगह गवईं पृष्ठभूमि के सीधे-सादे लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा कर दी। सच तो यह है कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री की दौड़ में कहीं भी नहीं थीं, जबकि सबसे सशक्त उम्मीदवार मोरारजी देसाई थे। उन दिनों मोरारजी भाई के बारे में कहा जाता था कि उन्होंने दोस्तों से अधिक दुश्मन पैदा किये थे। जुबान के वो बेहद तीखे थे और जो कहना होता था मुँह पर कह देते थे।


के. कामराज और अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी जानते थे कि अगर मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बन गए तो वो सरकार अपनी शर्तों पर चलाएंगे और उनकी पूछ खत्म हो जाएगी। खैर लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने और कुछ हीं दिनों बाद ताशकंद में उनकी मृत्यु हो गई। इस बार भी मोरारजी देसाई रेस में सबसे आगे थे और लगा कि वे हीं प्रधानमंत्री बनेंगे मगर फिर उनके साथ खेल हो गया। ताकतवर सिंडिकेट ने मोरारजी के बजाय इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री चुना। सिंडिकेट जानता था कि इंदिरा गांधी को मैनेज करना बेहद आसान है मगर मोरारजी देसाई टेढी खीर हो सकते हैं।

इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं और छह महीने तक वो सिंडिकेट के चंगुल में रहीं। वो वही काम करती थीं जो सिंडिकेट कहता था। मगर इससे इंदिरा संतुष्ट नहीं थीं, वो कुछ अलग करना चाहती थीं। उन्हें लगा कि उनके इर्दगिर्द एक पूरी टीम होनी चाहिए जो समय समय पर उन्हें उचित सलाह दे सके। सबसे पहले उन्होंने परमेश्वर नरायण हक्सर (पी.एन.हक्सर) जो वरिष्ठ नौकरशाह थे, उन्हें अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया। उसके बाद इंदिरा ने विदेश सेवा के अफसर त्रिलोकी नाथ कौल, राजनेता और डिप्लोमेट दुर्गा प्रसाद धर (डीपी धर), अर्थशास्त्री पृथ्वी नाथ धर और भारतीर पुलिस सेवा के अफसर रामेश्वर नाथ काव। इन सबके सर्वेसर्वा थे पीएन हक्सर। ये सभी कश्मीरी पंड़ित थे और इन्हें पाँच पांडव कहा जाता था।

इन्हीं की सलाह पर इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी में “दस सूत्रीय कार्यक्रम” पेश किया। इसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व राजा-महाराजाओं को मिलनेवाली वित्तीय लाभ और न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण प्रमुख बिंदु थे। इंदिरा गांधी के इस पेशकश को सिंडिकेट ने थोडा भी भाव नहीं दिया। इंदिरा ने तबतक अपनी स्वतंत्र और मजबूत छवि बना ली थी और अब वो सिंडिकेट से आर-पार की लडाई चाहती थीं।

पीएन हक्सर की सलाह पर एआईसीसी के बैंगलोर अधिवेशन में इंदिरा गांधी ने तुरंत प्रभाव से बैंको के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रखा और लोगों में ये संदेश गया कि इंदिरा गांधी गरीबों के लिए लडाई लडने वाली योद्धा हैं। इंदिरा सरकार में वित्तमंत्री मोरारजी देसाई बैंकों के राष्ट्रीय करण के बिल्कुल खिलाफ थे और उस अधिवेशन में उन्होंने सिंडिकेट से साफ-साफ कह दिया था कि वे इस प्रस्ताव को नहीं मानेंगे।

इंदिरा गांधी की थिंक टैंक ने ये फैसला लिया कि किसी भी सूरत में मोरारजी देसाई को वित्तमंत्री के पद से हटाया जाए। मोरारजी भाई के खिलाफ साजिश शुरू हो गई थी। इसकी अगुवाई के लिए कांग्रेस के युवा तुर्क के नाम से प्रसिद्ध चंद्रशेखर को चुना गया। वो इंदिरा गांधी का साथ देने के लिए तैयार हो गए। साथ में बहुत से युवा सांसद भी। चंद्रशेखर और उनकी युवा टीम वित्तमंत्री मोरारजी देसाई पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने लगे। मोरारजी भाई के पुत्र कांति देसाई पर भी कुछ बडे औद्योगिक घरानों को फायदा पहुँचाने के आरोप जोर शोर से संसद में लगाए जा रहे थे। तब इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई का विभाग बदलने का निश्चय किया मगर खुद्दार देसाई इसके लिए तैयार नहीं हुए। सब जानते थे कि ये सब इंदिरा गांधी की शह पर हो रहा है और चंद्रशेखर इंदिरा के हाथों खेल रहें हैं।

मोरारजी देसाई ने विभाग बदलने की मांग को ठुकरा दिया और मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया। अब रास्ता साफ था, 19 जुलाई 1969 को एक आर्डिनेंस जारी करके सरकार ने देश के 14 बडे निजी बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया। जिस आर्डिनेंस के जरिए ऐसा किया गया वह बैंकिंग कम्पनीज आर्डिनेंस कहलाया। बाद में इसी नाम से विधेयक भी पारित हुआ और कानून बन गया। यह इंदिरा गांधी की पहली जीत थी।

मजबूत सिंडिकेट को ये बात नागवार गुजरी मगर वक्त की नजाकत को देखते हुए वे चुप रह गए। मगर अंदर हीं अंदर दोनों पक्षों को मौका की तलाश थी। वो राष्ट्रपति डा.जाकिर हुसैन की अचानक मौत ने दोनों पक्षों को फिर आमने सामने ला खडा कर दिया। 10 जुलाई 1969, राष्ट्रपति पद के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने के लिए बेंगलुरू में कांग्रेस संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाई गई। सिंडिकेट इंदिरा गांधी पर काबू पाने के लिए राष्ट्रपति पद पर अपना उम्मीदवार चाहता था, जबकि इंदिरा गांधी ने सिंडिकेट का विरोध करने का निर्णय लिया। मगर ये बात मीडिया तक नहीं पहुँचीं और पूरी रणनीति तैयार हो गई। इस बार के. कामराज बेहद सतर्क थे और उन्होंने अपनी तरफ से नीलम संजीव रेड्डी के नाम का प्रस्ताव रखा। जबकि इंदिरा गांधी दलित समाज के जगजीवन राम को राष्ट्रपति बनाना चाहती थीं। महात्मा गांधी के जन्म-शताब्दी वर्ष में कोई दलित नेता राष्ट्रपति बने तो दलित वोटों पर कांग्रेस का अधिकार हो सकता था। मगर इंदिरा गांधी के मांग को अनसुना कर दिया गया।

संसदीय बोर्ड में इंदिरा गांधी का प्रस्ताव चार के मुकाबले दो वोट से गिर गया। मगर तब तक इंदिरा गांधी और उनकी टीम ने निर्दलीय वी.वी. गिरि को गुपचुप तरीक़े से अपना समर्थन देने का फैसला ले लिया था। वीवी गिरि राष्ट्रपति चुनाव जीत गए। इंदिरा गांधी ने अपने सांसदों को अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने को कहा था और इंदिरा समर्थक सांसदों ने वीवी गिरि को वोट कर दिया। बवाल मचना ही था और खूब मचा भी। सिंडिकेट के वरिष्ठ सदस्य एसके पाटिल ने राष्ट्रपति चुनाव के बाद सार्वजनिक रूप से कहा था कि “इंदिरा ने हिटलर के प्रोपेगैंडा माँडल की तरह काम किया था। सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को कारण बताओ नोटिस जारी किया और इंदिरा ने जवाब में रोते हुए कहा था कि उनको बदनाम करने के लिए ये साजिश की गई है

ये इंदिरा गांधी की दूसरी जीत थी और इस जीत ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस पर पूरी ताकत प्रदान कर दी। अब कोई उन्हें गूंगी गुडिया नहीं बोलता था। सिंडिकेट भी उनकी चाल के आगे बेबस था। मगर उन्होंने भी हार नहीं मानी और अपने तरकश का अंतिम तीर इंदिरा गांधी के ऊपर चला दिया। इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच तनावपूर्ण पत्राचार शुरू हुआ और फिर कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया।

कांग्रेस पार्टी दो भागों में विभाजित हो गई। मगर इंदिरा गांधी के साथ लगभग सभी युवा पीढ़ी के नेता थे। और सिंडिकेट बुजुर्ग लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस (आर) कहलाई और मूल पार्टी कांग्रेस (ओ) कहलाई।

दिसंबर में दोनों पार्टियों ने अपने अपने अधिवेशन किए। आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के 705 सदस्यों में से 429 इंदिरा के साथ थे। इनमें से 220 लोकसभा के सदस्य थे। सरकार बचाने के लिए इंदिरा गांधी को 45 सदस्यों की जरूरत थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आगे बढ़कर इंदिरा गांधी को अपना समर्थन दे दिया और सरकार बच गई। थोडे हीं दिनों में कांग्रेस के दूसरे धडे का नामोनिशान मिट गया और इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की पटल पर धुमकेतु की तरह उभरीं।

बांग्लादेश के उदय ने इंदिरा गांधी की छवि में चार-चाँद लगा दिये और उनकी नीति की प्रशंसा विदेशों में भी होने लगी थी। कहते हैं कि जब ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त होने लगती है तो इंसान अहंकारी हो जाता है। इमरजैंसी इंदिरा गांधी का स्याह पक्ष था जो उनकी छवि को नेस्तनाबूद कर दिया था।सत्ता जाने के बाद इंदिरा गांधी को अपनी गलती का एहसास हुआ और फिर उन्होंने सत्ता में शानदार वापसी की थीं।

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