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संदिग्ध सूचनाओं का कोरोना

Bhola Tiwari Mar 26, 2020, 4:01 PM IST राष्ट्रीय
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डॉ सुशील उपाध्याय

 देहरादून : जिसे अभी तक केवल सिद्धांतों के रूप में पढ़ते थे, सूचनाओं की अति के उसी दौर का आज सीधा सामना कर रहे हैं। कोरोना के कारण सूचनाओं का अति प्रवाह एक अलग तरह की चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत मे बीते 16 से 25 मार्च तक के 10 दिन में इंटरनेट की खपत में एक तिहाई से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। माना जा रहा है कि सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रयोग के कारण यह बढ़ोतरी हुई है। हर व्यक्ति अपने आप को सूचनाओं के वाहक के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए ऐसी सूचनाएं लगातार आगे बढ़ाई जा रही हैं, जिनकी कोई आधिकारिक प्रामाणिकता नहीं है और यह केवल भारत तक सीमित मामला नहीं है। डब्ल्यूएचओ के निदेशक ने तो यहां तक कहा है कि हम इस महामारी के वक्त इन्फोडेमिक के दौर में प्रवेश कर गए हैं, जहां एपेडमिक के साथ इंफॉर्मेशन का ऐसे घालमेल कर दिया गया है कि यह जानना मुश्किल है कि कौन सी सूचना सही है और कौन सी गलत है। 20 मार्च के बाद से अब तक देश के अलग-अलग राज्यों में सैकड़ों ऐसे लोगों की गिरफ्तारी हुई है जो झूठी सूचनाओं को फैला रहे थे या इनके फैलने का माध्यम बन रहे थे। पर यह सिलसिला थमा नहीं है।

इस बीच कई तरह की गलत सूचनाएं लगातार लोगों तक पहुंच रही हैं, जैसे कि आने वाले दिनों में बैंकों से पैसा मिलना बंद हो जाएगा, देश में राशन खत्म हो जाएगा या सरकारें फेल हो जाएंगी। इन तमाम सूचनाओं पर खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि इनमें से कोई भी सूचना भरोसे के लायक नहीं है और ना ही अफवाहों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि भारत के पास राशन का लगभग तीन साल का बफर स्टॉक मौजूद है। अगर ऐसी भयानक स्थितियां पैदा हो जाए कि अगली दो या तीन फसलें पैदा न हों तो भी भारत में भुखमरी का कोई संकट नहीं आने वाला है। लेकिन अफवाहों का संकट लगातार गहरा हो रहा है। इस संकट के दौर में सूचनाओं की प्रामाणिकता का निर्णय करना वास्तव में मुश्किल है। अखबार लगातार विज्ञापन दे रहे हैं कि सच्ची खबरें वही पहुंचा रहे हैं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि टीवी माध्यमों की खबरें उतनी सच नहीं है, जितनी कि अखबारों की खबरें हैं। इस बीच अखबारों के बारे में यह सूचना फैली कि उनके माध्यम से कोरोना का संक्रमण बढ़ सकता है। इसका जवाब अखबारों ने ऐसे लोगों को सामने लाकर दिया जो यह दावा कर रहे हैं कि कोरोना का संक्रमण अखबारों के माध्यम से नहीं फैल रहा है और पूरी दुनिया में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया जिससे यह साबित होता हो कि अखबारों के जरिए कोरोना वायरस फैला है और इसीलिए यूरोप के किसी भी देश में या अमेरिका में अखबारों को बंद नहीं किया गया है। सूचनाओं के इस डरावने प्रवाह में संदिग्ध सूचनाएं चारों तरफ फैल रही हैं।यदि आम आदमी के संदर्भ में देखें तो वास्तव में उसके पास यह पता करने का कोई जरिया नहीं है कि कौन सी सूचना सही है और कौन सी गलत है या कौन सा माध्यम प्रमाणिक तौर पर सूचनाएं दे रहा है और कौन अफवाहों को आगे बढ़ा रहा है। डर इस बात का है कि इस महामारी के फैलाव के चलते कहीं भारत में सूचनाओं का प्रभाव सीमित ना कर दिया जाए। सूचनाओं का प्रवाह सीमित होने का एक बहुत बड़ा झटका लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर लगेगा क्योंकि तीन सप्ताह के लिए घरों के भीतर बैठी देश की सारी सक्रिय आबादी के पास सोशल मीडिया, इंटरनेट और इसी तरह के माध्यम अपने आप को अभिव्यक्त करने का बड़ा जरिया हैं। यदि इन पर रोक लग जाए तो निश्चित रूप से लोगों के सामने मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी कई तरह की परेशानियां खड़ी होंगी। 

सूचनाओं के प्रवाह के साथ एक अन्य मनोवैज्ञानिक पहलू भी जुड़ा है, वो यह है कि व्यक्ति जब किसी सूचना को आगे प्रसारित करता है या दूसरों को भेजता है तो उसे खुद के सशक्त होने का एहसास होता है। वह खुद के ताकतवर होने को महसूस करता है और उसे लगता है कि उसने अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा लोगों तक सूचनाएं पहुंचाई है और उसके पास ज्यादा प्रभावशाली संसाधन उपलब्ध हैं। यह मनोवैज्ञानिक पहलू केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के तमाम देशों में इसी तरह से सूचनाएं फैलती हैं। सोशल मीडिया माध्यमों पर प्रसारित-प्रसारित हो रही सूचनाओं को आधार मान लें तो आज की तारीख में हर दूसरा व्यक्ति कोरोना एक्सपर्ट है और वह दूसरे को या तो इलाज बता रहा है या डरावनी खबरों से रूबरू करा रहा है, जो कथित रूप से दुनिया के अन्य हिस्सों में घटित हो चुकी हैं। 

इस बीच कई तरह की विरोधाभासी सूचनाएं भी सामने आई हैं। जहां भारत में कोरोना के मामले सामने आने के बाद इंटरनेट के प्रयोग में बढ़ोतरी हुई, वहीं चीन में पिछले दो महीने के दौरान लगभग दो करोड लोगों ने स्मार्ट फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल बंद कर दिया है। संभव है आने वाले महीनों में भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़े। यह बात सच है कि भारत अगले डेढ़ - दो महीने में कोरोना के संकट से काफी हद तक मुक्त हो जाएगा, लेकिन अफवाहों और प्रमाणिक सूचना का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। वैसे भारत में हर चीज के पीछे एक पौराणिक कथा को ढूंढ लिया जाता है तो हमारे पास ऐसी अनेक पौराणिक कथाएं मौजूद हैं जब या तो गलत सूचनाएं दी गई या सूचनाओं को सही वक्त पर नहीं दिया गया। याद कीजिए हमारी अनेक पौराणिक कथाओं में ऐन वक्त पर आकाशवाणी होती है। सीता के स्वयंवर में रावण को विमुख करने के लिए आकाशवाणी की गई कि लंका संकट में है। इसी तरह रावण अपने पूर्व जन्म में भी एक गलत आकाशवाणी का शिकार हो चुका है। सूचनाओं के मुक्त और संदिग्ध प्रवाह का सिलसिला आगे भी चलेगा। इसके दृष्टिगत एक जागरूक व्यक्ति के तौर पर हमें अपनी भूमिका तय करनी है कि हम इन सूचनाओं को जांचे परखे बिना आगे बढ़ाएंगे या फिर इन्हें अपने तक ही रोक कर खत्म कर देंगे।

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