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कब होगी जनादेश से जड़ों की तलाश

Bhola Tiwari Mar 26, 2020, 8:31 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  :  असम विधानसभा चुनाव में जीतकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आये कोई नौ महीने हो चुके हैं। अब वादे पूरे करने के दिन आ गए हैं। राज्य के बेहद युवा तेजतर्रार नेता सर्वदानन्द सोनोवाल ने राज़्य के चौदहवें और तीसरे गैर-कॉंग्रेसी मुख्य्मंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद यह स्पष्ट किया था भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बांग्लादेश से पूर्वोत्तर राज्यों में होने वाली अवैध घुसपैठ रोकने के लिए स्थायी समाधान ढूंढ़ने को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। काम करने और विकास की राह पर आगे बढ़ने की उत्सुकता और उत्साह राज्य में आसानी से सत्ता और समाज के बीच है।


 उल्लेखनीय है कि पूर्वोत्तर राज्यों में मिशनरियों की सक्रियता की वजह से जहां ईसाइयत का प्रकोप बढ़ा है, वहीं बांग्लादेश से हो रहे निरन्तर घुसपैठ के कारण नस्लीय पहचान का सवाल गहराता जा रहा है। बीजेपी के दूसरे नेताओं की ही तरह अवैध बांग्‍लादेशी अप्रवासियों को लेकर सोनोवाल का रुख बेहद सख्‍त है और वे बांग्लादेशियों की भारत में 'घुसपैठ' का मसला सुप्रीम कोर्ट में भी उठा चुके हैं। इन हालातों में उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी पूरा समर्थन मिला है-- लिहाजा सर्वदानन्द बेहद कठोरता के साथ अपनी बात कह चुके हैं कि 'बांग्लादेश की सीमाएं सील करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।'

 बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ असम में एक बड़ा राजनीतिक और संवेदनशील मुद्दा रहा है। दुःख और दुर्भाग्य की बात है कि सरकार ने इस मुद्दे को लेकर किसी तरह का कोई सख्त कदम उठाना तो दूर उलटे इंदिरा गांधी के समय में अवैध प्रवासी पहचान ट्रिब्यूनल (आईएमडीटी) एक्ट के बहाने घुसपैठियों और बाहर से आये लोगों को राहत मिल गई थी। आजादी मिलने के बाद यह बहस लगातार जोर पकड़ता रहा कि घुसपैठियों को लेकर सरकार का रवैय्या इतना नरम क्यों है ? बीती सदी के साठवें दशक के प्रारंभ में जब असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीपी. चलिहा ने सीमा पार से घुसपैठ को रोकने की पहल की तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से मना किया था। इतना ही नहीं जब बीपी. चलिहा ने प्रिवेंशन ऑफ इनफिल्टरेशन फ्रॉम पाकिस्तान एक्ट-1964, कानून लाने की घोषणा की तो कांग्रेस पार्टी के तक़रीबन 20 मुस्लिम विधायकों ने सरकार से बाहर जाने की धमकी दे डाली। उनसब ने इस कानून को वापस लेने तक का अतिरिक्त दबाव राज्य सरकार पर बनाया। आखिरकार चलिहा ने विवादित विधेयक को ठंडे वस्ते में डाल दिया। असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का बोलबाला कुछ इस तरह से है कि जब 10 अप्रैल, 1992 को राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने असम में 30 लाख अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम के मौजूद होने की बात कही तो कांग्रेसी कार्यकर्ताअब्दुल मुहिब मजुमदार की अगुआई में ‘मुस्लिम फोरम’ ने सैकिया को पांच मिनट के अंदर सरकार गिरा देने की धमकी दे दी। वैसे तो 27 जुलाई, 2005 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की खंडपीठ ने आईएमडीटी एक्ट को निरस्त कर दिया था और इसके बदले केंद्र और राज्य सरकार को फॉरेन ट्रिब्यूनल आर्डर- 1964 के तहत ट्रिब्यूनल स्थापित करने और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित करने का आदेश दिया था। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-355 का हवाला देते हुएयह भी ध्यान दिलाया था कि किस तरह असम में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ राज्य की आंतरिक अशांति एवं बाह्य चिंता का सबब बन चुकी है। लेकिन सैकिया की सरकार चुप बैठी रही।    

सर्वदानन्द इतिहास के ऐसे हादसों से बखूबी वाकिफ हैं और इस बात को भली-भांति समझते हैं कि चुनावी वादे, प्रतिबद्धताएं जमीनी तौर से लागू करने में कई तरह की अड़चनें सामने आएंगीं। चूँकि असम के कछारी जनजातीय समुदाय से आते हैं और उन्हें 'जातीय नायक' भी कहा जाता है। घुसपैठियों के जुल्म और उनकी अतिवादिता सर्वदानन्द लम्बे समय से देखते चले आ रहे हैं। आज सर्वदानन्द मूल वाशिंदों के अंतर्मन में विश्वास कैसे भरें जब अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसी वजह से बोडो और बांग्लादेशी मुस्लिमों के बीच हिंसात्मक संघर्ष भीषण होता जा रहा है । नतीजतन, बोडो जनजातियों में यह आशंका घर कर गई कि कहीं वे अपनी जमीन न खो दें। स्मरण होगा कि 15 जुलाई, 2004 को भारत के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि 31 दिसम्बर, 2001 तक के आंकड़े के अनुसार 1,20,53,950 बांग्लादेशी अवैध तरीके से भारत के 17 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में रह रहे हैं। 

सवाल इच्छा शक्ति है। राजनीति इच्छा-शक्ति के रथ पर सवार होकर लडा जानेवाला ऐसा छाया युद्ध है, जिसकी अपनी कोई सीमाएं या प्रतिमान नहीं होते। लिहाजा, कांग्रेस के सन्दर्भ में यह कहना मुनासिब होगा कि उसने मौके गवाएं हैं या लेदेकर उसके पास इच्छा-शक्ति का अकाल था। ‘असम समझौता’ तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के लिए ऐतिहासिक मौका था, जिसके जरिये बांग्लादेश से गैर कानूनी घुसपैठ रोकने के सख्त कदम उठाये जा सकते थे। इसके पहले इंदिरा गांधी संसद के माध्यम से आईएमडीटी एक्ट के तहत विदेशी पहचान के संदिग्ध आरोपी व्यक्ति को ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने का प्रावधान लेकर आई थीं, लेकिन वह भी व्यावहारिक नहीं बन पाया। यह सन्दर्भ आज तक पहेली है कि 1971 को निर्धारक वर्ष मानकर 1951 से 1971 के बीच बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ कर आए लोगों को भारत का नागरिक मान लिया गया, ऐसा क्यों ? आज स्थिति बेकाबू हो रही है और ऐसे हालात में मुख्यमंत्री सर्वदानन्द सोनोवाल को समय-समय पर शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दी गयी चेतावनी को गौर से समझना होगा । उल्लेखनीय है कि 1996 में आईबी के पूर्व प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल टीवी. राजेश्वर ने अपने लेखों के माध्यम से बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर भारत के तीसरे विभाजन की आशंका जाहिर की थी। ऐसी ही आशंका 1998 में असम के तत्कालीन राज्यपाल एसके. सिन्हा ने भी व्यक्त की थी। सिन्हा ने सावधान किया कि असम में हो रहे अवैध घुसपैठ के कारण राज्य के भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्व वाले निचले हिस्से के जिले को खोना पड़ सकता है। पूर्व सीबीआई प्रमुख जोगिन्दर सिंह के मुताबिक़ अभी तक करीब पांच करोड़ से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठ कर भारत आ चुके हैं। खबर है कि बांग्लादेशी कट्टरपंथी और चरमपंथी एक ‘वृहोत बांग्लादेश’ की योजना को अंजाम देने की रणनीति में जुटे हैं। इनमें पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और झारखंड को शामिल करने की बात है।   

यह सच है कि बांग्लादेशी घुसपैठ से इन जिलों में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। जब टीवी. राजेश्वर और एसके. सिन्हा ने चेतावनी दी थी, तब से लेकर आज तक मुस्लिम आतंकवाद का चेहरा कहीं ज्यादा भयानक और वीभत्स हुआ है। स्थिति की गंभीरता इससे भी समझी जा सकती है कि असम के 40 विधानसभा सीट और पश्चिम बंगाल में कुल 294 में से 53 विधानसभा की सीटें बांग्लादेशी मुस्लिम बाहुल्य वाली हैं। हाल ही में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या को स्वीकार किया है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि कुछेक राज्यों में घुसपैठिए ही सरकार का भविष्य निर्धारित करेंगे। यह एक खतरनाक सन्देश है-- धर्मनिरपेक्ष भारत केलिए। लिहाजा, पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इन राज्यों में चरमपंथी ताकतों को रोकने के मकसद से पंचायत स्तर पर लोगों को जागृत किया ताकि इस क्षेत्र को बांग्लादेश में मिलाने की मांग जोर न पकड़ने लगे। संघ से लेकर मुख्य्मंत्री सर्वदानन्द मामले की गम्भीरता को समझते हैं कि बांग्लादेश सीमा से सटा भारत का पूर्वी हिस्सा बांग्लादेशी मुस्लिम बहुल (करीब ५० फीसदी) हो चुका है। यह तो साल 2001 के जनगणना की रिपोर्ट है। चूंकि 2011 जनगणना के आंकड़े इतने भयावह हैं कि तरुण गगोई सरकार इसे जारी कर अपनी फजीहत करवाना नहीं चाहती थी। 

आज सर्वदानन्द सोनोवाल सरकार असम से बांग्लादेशी घुसपैठ के समापन का मन बना चुकी है-- इसलिए स्वीकार्य है कि प्रतिरोध में राज्य नस्लीय संघर्ष जैसे प्रतिरोध सामने आएंगे क्योंकि बांग्लादेशियों का भारत में आकर बसना यदि राष्ट्रीय मुद्दा है तो उनके खिलाफ की गयी कार्रवाई कहीं अंतर्राष्ट्रीय मंच का प्रपंच बन सकता है। लेकिन उन संभावनाओं से भी इंकार नहीं है कि सोनोवाल सरकार यदि इन घुसपैठियों को निकालने का मन बना रही है तो यह उन्हें मजबूत छवि के साथ अंगद के पाँव जैसी मजबूत स्थिति भी देगा, क्यों कि संघ की मेहनत और भाजपा को मिला जनादेश एक बेहतर माहौल बनाने और मूल वाशिंदों की पहचान और वजूद बचा पाने में सरकार सफल होगी। 

असम में हासिल जनादेश मुस्लिम घुसपैठ और आतंकवाद के खिलाफ का जनादेश है-- यहां से भाजपा मूल वाशिंदों के हितों केलिए घुसपैठ नेटवर्क को तबाह करने का सही मौक़ा है। संघ के काम को आगे बढ़ाने का बीड़ा सोनोवाल उठा रहे हैं तो वाजिब सी बात है कि उनकी छवि खैरात बांटनेवाले अन्य क्षत्रपों की तुलना में कहीं बेहतर और सम्माननीय होगी।

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