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जाबालि ऋषि...

Bhola Tiwari Mar 26, 2020, 8:09 AM IST कॉलमलिस्ट
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एसडी ओझा

नई दिल्ली : वह दासी पुत्र था । नाम उसका था सत्यकाम । उसे विद्या अध्ययन करने की उत्कट इच्छा थी । एक दिन वह बालक गौतम ऋषि के आश्रम पहुँचा । गौतम ऋषि ने उसके पिता का नाम और गोत्र पूछा था । बालक को पिता का नाम मालूम नहीं था । उसकी माँ बहुत घरों में काम करती थी । उस दौर में वह कई पुरुषों के सम्पर्क में रही । इनमें से कौन सत्यकाम का बाप था , उसकी माँ को पता नहीं था । हाँ , माँ का नाम जबाला था । उसने गौतम ऋषि को माँ का नाम बता दिया । गौतम ऋषि उसकी इस साफगोई से काफी प्रसन्न हुए थे । उन्होंने कहा था कि सत्य बोलने वाला हमेशा ब्राह्मण होता है। आज से तुम ब्राह्मण हुए । 

सत्यकाम को उसकी माँ के नाम से जाना जाने लगा। लोग उसे सत्यकाम जबाला कहने लगे । उसे गौतम ऋषि ने कुछ गायें देकर कहा था - इन्हें वन में चराने ले जाओ । जब ये एक सहस्त्र हो जाएँ तब लेके आना । सत्यकाम जबाला वन गमन कर गया । वह गायों की खूब सेवा करने लगा । गायों की संख्या बढ़ती गयी । जब उनकी संख्या एक सहस्त्र हो गयी तब सत्यकाम लौटा । गौतम ऋषि बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने सत्यकाम को विद्या दान देना स्वीकार कर लिया । सत्यकाम विद्या के सभी विधाओं में पारंगत हुआ । उसे जाबालि ऋषि कहा जाने लगा ।

जाबालि ऋषि की विद्वता की कीर्ति चारों तरफ फैल गयी । उनसे प्रभावित हो राजा दशरथ ने उन्हें अपनी सभा में रखा था । जब राम वन गये । भरत उन्हें मनाने पहुँचे । साथ में जबालि ऋषि भी थे । वे चर्वाक दर्शन को मानते थे । उन्होंने राम को समझाया - राम आपके विना अयोध्या नगरी एक चोटी की नायिका बनकर रह गयी है । आप जब तक आओगे नहीं तब तक उस नायिका की दो चोटी नहीं बन सकती । ज्ञातव्य है कि शास्त्रों में दो चोटी बनाने वाली स्त्री को सुंदर कहा जाता है ।

जाबालि ने राम से कहा था - आपके पिता ने जो वचन दिया उसे भूल जाओ और अयोध्या लौट चलो। यहां कोई किसी का न बाप न किसी का बेटा है । राजा दशरथ के दिए गये वचन उनके साथ हीं चले गये । वे आपके पिता एक प्राकृतिक नियम के अंतर्गत बने थे । आप भी उसी नियम के अंतर्गत पिता बनोगे । इसमें किसी का कोई एहसान नहीं है । यह दुनिया एक सराय है । लोग आते हैं चले जाते हैं। आप इस सराय में रहते हुए सारे सुखों का उपभोग करो । वन में रहना आप जैसे राजा को शोभा नहीं देता ।

जाबालि ऋषि की इस तरह की नास्तिकता भरी बातों को सुनकर राम कुपित हो गये । उन्होंने कहा - मुझे दुःख है कि मेरे पिता ने आप जैसे नास्तिक को अपनी सभा में रखा था । राजा जैसा आचरण करता है वैसा हीं आचरण प्रजा भी करती है । आज मैं अपने पिता का दिया गया बचन नहीं निभाऊंगा तो प्रजा क्या सोचेगी ? मैं कौन सा आदर्श प्रजा के सामने प्रस्तुत करुंगा ? कौन सा मुंह लेकर अयोध्या जाऊँगा ?

राम की डांट से क्षुब्ध हो जाबालि ऋषि वापस अयोध्या नहीं गये । वे वहीं रहकर किसी कंदरा में ध्यान करने लगे । भरत राम का खड़ाऊं लेकर अयोध्या लौट गये थे ।

जाबालि ऋषि के नाम पर आज जबलपुर शहर बसा हुआ है । बाद में राम पुनः जाबालि ऋषि से मिले थे। उन्होंने उनसे नास्तिकता छोड़ने का आग्रह किया था। उन्हें रेत के शिवलिंग प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया में शामिल किया था , लेकिन जीवन पर्यंत जाबालि ऋषि चर्वाक दर्शन को मानते रहे थे । उनका कहना था - 

 अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जनः।

अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति ।।14।।

(बाल्मीकिविरचित रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग 108)

अष्टकादि श्राद्ध पितर-देवों के प्रति समर्पित हैं, यह धारणा व्यक्ति के मन में व्याप्त रहती है, इस विचार के साथ कि यहां समर्पित भोग उन्हें उस लोक में मिलेंगे । यह तो सरासर अन्न की बरबादी है । भला देखो यहां किसी का भोगा अन्नादि उनको कैसे मिल सकता है वे पूछते हैं, और आगे तर्क देते हैं:

यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति ।

दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं तत्पथ्यमशनं भवेत् ।।15।।

(पूर्वोक्त संदर्भ स्थल)

वास्तव में यदि यहां भक्षित अन्न अन्यत्र किसी दूसरे के देह को मिल सकता तो अवश्य ही परदेस में प्रवास में गये व्यक्ति की वहां भोजन की व्यवस्था आसान हो जाती – यहां अन्न कोई और भक्षण करता , सुख परदेश में बैठे अन्य व्यक्ति को मिलता ।

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