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"ग्लैमरस गर्ल आँफ पार्लियामेंट" कहा जाता था अद्वितीय सुंदरी तारकेश्वरी सिन्हा को

Bhola Tiwari Mar 25, 2020, 1:35 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : सन् 1952,आजाद भारत में पहला आम चुनाव हो रहा था।कांग्रेस ने पटना ईस्ट लोकसभा सीट से 26 साल की बेहद खूबसूरत और आधुनिक तारकेश्वरी सिन्हा को टिकट दिया।तारकेश्वरी सिन्हा ने पटना ईस्ट लोकसभा सीट पर जमकर पसीना बहाया और भारी अंतर से जीतकर लोकसभा पहुँचीं।तारकेश्वरी जितनी सुंदर थीं उससे ज्यादा बेहतरीन वक्ता भी थीं।बताते हैं कि संसद में पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसदों की उनसे मिलने या बात करने की होड लगी रहती थी।जवाहरलाल नेहरू उन्हें बहुत मानते थे और गंभीर विषयों पर उनसे बहस करवाया जाता था।कहते हैं कि जब वो बोलती थीं तो संसद थम सा जाता था।वो विद्वान वक्ता थीं तथा हिंदी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था।कहते हैं कि वो अपने भाषणों में उर्दू के लफ्जों और शायरी का प्रयोग कर विपक्षी नेताओं को बगलें झांकने के लिए मजबूर कर देतीं थीं।

उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि जिस कभी दिन वो लोकसभा में नहीं आतीं थीं,सन्नाटा पसर जाता था।सांसदों की निगाहें हमेशा उनको खोजती रहती थीं।

आपको बता दें तारकेश्वरी सिन्हा का जन्म 26 दिसंबर 1926 को हुआ था।आपके पिता बिहार के एक मशहूर सर्जन थे।तारकेश्वरी उनकी इकलौती लडकी थीं और उनकी परवरिश बेहद खूले माहौल में हुई थी।पढने में वो बेहद तेज थ़ी।काँलेज की पढाई के दौरान हीं उनकी दिलचस्पी छात्र राजनीति की तरफ हो गई थी।तारकेश्वरी सिन्हा बांकीपुर गर्ल्स कॉलेज जो अब अवध महिला काँलेज के नाम से जाना जाता है, की विद्यार्थी रहीं थीं।वे बिहार स्टूडेंट कांग्रेस, जिसका गठन एआईएसएफ से टूटकर हुआ था,की प्रेसिडेंट भी रहीं थीं।

उन्होंने 1942 के अंग्रेजों भारत छोडो आंदोलन में खूब बढ चढकर हिस्सा लिया और कई बार जेल गईं।उन दिनों लड़कियों को इतनी आजादी नहीं दी जाती थी, पिता ने चिंतित होकर तारकेश्वरी की शादी छपरा के धनाढ्य भूमिहार परिवार में तय कर दिया।तारकेश्वरी ने पहले विरोध किया मगर पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने शादी के लिए हामी भर दी।उनके पति निधिदेव सिंह तब बडे सरकारी वकील थे और वे राज्य सरकार के मुकदमे लड़ते थे।


शादी के बाद तारकेश्वरी अपने पति के साथ कलकत्ता की शानदार हवेली में रहने लगीं।दौलत की कोई कमी नहीं थी और बताते हैं कि दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे।थोडे दिनों के बाद तारकेश्वरी ने अपने पति से आगे की पढाई करने की इच्छा जाहिर की।पति ने उनका दाखिला लंदन स्कूल आँफ इकोनॉमिक्स के करा दिया।कहते हैं कि तार्किक बहस करने की असल शुरुआत वहीं से हुई थी।इस बीच भारत में उथल-पुथल चल रहा था वो कोर्स बीच में हीं छोड़कर भारत आ गई और पूर्ण रूप से आजादी के आंदोलन में कुद गईँ थीं।

देश आजाद हुआ तब तक उनकी पहचान बन गई थी।वो पंडित नेहरूऔर मोरारजी देसाई के बेहद करीबी थीं।लोकसभा में बहस के दौरान उनके जुबान पर हजारों शेरों-शायरी हुआ करती थी।कोई उन्हें बुलबुल कहता तो कोई उनकी तरफ टकटकी लगाए देखता हीं रहता।तारकेश्वरी की भी खासियतों की लंबी फेरहिस्त थी,वो एक से एक साडियां पहनतीं।लोगों का कहना था कि वह कभी एक बार पहनी हुई साडी दुबारा नहीं पहनतीं थी।वो अपने लुक के प्रति बेहद सचेत रहतीं।

दूसरा आम चुनाव 1957 में हुआ।कांग्रेस के केन्द्रीय पर्वेक्षक बनकर मोरारजी देसाई पटना पहुँचें।मोरारजी देसाई सभी उम्मीदवारों का इंटरव्यू ले रहे थे और उन्होंने तारकेश्वरी सिन्हा को कहा तुम लिपस्टिक लगाती हो,कीमती कपडे पहनती,चूडियां पहनती हो?मोरारजी देसाई की बात सुनकर तारकेश्वरी को गुस्सा आ गया और उन्होंने तुरंत कहा कि हमारे यहाँ(बिहार) चुडी पहनना अपात्रता नहीं बल्कि क्वालिफिकेशन माना जाता है।आप जो शाहहूश की बंडी पहने हैं,इसकी कीमत में मेरी छह साडियां आ सकती हैं।तारकेश्वरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मैं जब मोरारजी देसाई को ये सब बोल रहीं थीं तो वह चुपचाप मुझे सुनते रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया था।उन्होंने ये भी बतलाया कि कुछ दिनों बाद उन्होंने नेहरू को चिठ्ठी लिखी कि आप कैसे कैसे प्रेक्षक भेज देते हैं।

दूसरी लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने तारकेश्वरी सिन्हा को वित्त मंत्रालय में उपमंत्री बना दिया वो भी वित्तमंत्री मोरारजी देसाई के अंडर।शुरुआत में तो तारकेश्वरी को लगा कि वो उनके साथ काम नहीं कर पाएंगी मगर थोडे हीं दिनों में उनका ये भ्रम दूर हो गया था।देसाई उनके अभिवावक की तरह हो गए और वे तारकेश्वरी पर बहुत विश्वास करने लगे थे।

तारकेश्वरी सिन्हा के अनुसार मोरारजी को देखकर पंडित नेहरू कहते थे कि तारकेश्वरी ने मोरारजी को लकडी के कुंदे से इंसान बना दिया।तारकेश्वरी सिन्हा ने एक बार कहा था कि "रात के अंधेरे में भी मोरारजी के कमरे में जाकर कोई जवान और सुंदर महिला सुरक्षित वापस लौट कर आ सकती है।"उन दिनों तारकेश्वरी का नाम नेहरू और मोरारजी देसाई के साथ गलत संदर्भ में लिया जाता था मगर तारकेश्वरी ने कभी भी सार्वजनिक रूप से इसका खंडन नहीं किया था।इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी के साथ उनके बहुत से किस्से चलते रहते थे।एक बार एक पत्रकार के पूछने पर तारकेश्वरी ने कहा था कि किसी के साथ बैठकर बात कर लेने से या लंच कर लेने से यहाँ लोग निजी रिश्ते को बदनाम कर देते हैं, जबकि हकीकत कुछ और होती है।

बताते हैं कि इंदिरा गांधी इसी वजह से तारकेश्वरी को नापसंद करती थीं।इंदिरा गांधी पर जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रेंक ने अपनी किताब इंदिरा में लिखा है किसी जमाने में फिरोज गांधी का अफेयर खुलेआम तारकेश्वरी से चलता था।इंदिरा ने कभी इसे पसंद नहीं किया, यही वजह थी कि जितना नापसंद एक जमाने में उन्होंने तारकेश्वरी को किया, उतना शायद किसी महिला को किया हो।

तारकेश्वरी सिन्हा मोरारजी देसाई के बेहद करीबी मानी जातीं थीं और जब इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच सत्ता संघर्ष हुआ तो उन्होंने मोरारजी देसाई का पक्ष लिया।मोरारजी देसाई और सिंडिकेट के वरिष्ठ नेताओं के साथ तारकेश्वरी भी अलग दल में शामिल होकर चुनाव लडा मगर 1971 के बांग्लादेश उदय ने इंदिरा गांधी की लहर पूरे देश में पैदा कर दी थी।सिंडिकेट की तरफ से वो बाढ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लडीं और उनकी बुरी तरह पराजय हुई।ये उनकी पहली चुनावी हार थी और उसके बाद वो कभी चुनाव जीत न सकीं थीं।

इंदिरा गांधी ने तारकेश्वरी सिन्हा को हराने वाले धर्मवीर सिन्हा को कैबिनेट मंत्री बना कर अपनी नफरत का सार्वजनिक इजहार कर दिया था।अगले साल उन्होंने विधानसभा चुनाव में जोर आजमाया मगर फिर भी निराशा हीं हाथ लगी।थोडे हीं दिनों में उन्होंने इंदिरा गांधी से अपने सारे मतभेदों को भूलाकर कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली और कांग्रेस की तरफ से उन्होंनें बेगूसराय लोकसभा चुनाव 1977 में लडा,वहां भी वो हार गईँ।1978 में समस्तीपुर लोकसभा उपचुनाव लडा मगर यहाँ भी किस्मत दगा दे गई।

बताते हैं कि समस्तीपुर चुनाव की हार ने उन्हें अंदर तक तोड दिया था और एक तरह से उनका राजनीति से मोहभंग भी हो गया।उन्होंने हार के बाद राजनीति से सन्यास ले लिया और वे समाजसेवा करने लगीं।

एक जमाने में तारकेश्वरी सिन्हा को "बेबी आँफ हाउस" कहा जाता था तो कभी "ग्लैमर गर्ल आँफ इंडियन पाँलटिक्स"।मीडिया का पूरा अटेंशन मिलता था उन्हें, जब वो राजनीति से दूर हो गईं तो मीडिया ने भी उन्हें भूला दिया।14 अगस्त 2007 को मीडिया की चहेती तारकेश्वरी सिन्हा इस नश्वर शरीर को छोडकर अनंत में विलीन हो गई मगर उनके निधन की खबर अखबारों की सुर्खियां नहीं बटोर पायीं।कारण भारत में उगते सूर्य की उपासना की जाती है और तारकेश्वरी ने त़ बहुत पहले लाइमलाइट लाइफ को अलविदा कह दिया था।

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