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"कोरोना वायरस" से भी खतरनाक था 1918 में फैला "स्पेनिश फ्लू",पाँच करोड लोग काल के गाल में समाए थे

Bhola Tiwari Mar 25, 2020, 8:30 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : प्रथम विश्वयुद्ध अपने ढ़लान पर था या यह कह लें कि वह अपना निर्णायक मुकाम हासिल कर रहा था।जनवरी 1918,अचानक पश्चिमी मोर्चे पर तैनात सैनिकों के तंग और भीड़ भरे ट्रेनिग कैंपों में फ्लू के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे।फ्रांस के साथ लगती सीमाओं पर स्थित सैनिक कैंपों में इसे पहले देखा गया।ये इतनी तेजी से फैला कि लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला।सैनिकों से ये पास के गाँवों में पहुँचा,फिर तो स्पेनिश फ्लू ने सरहदों की दीवार को लांघकर पूरे यूरोप में भारी तबाही मचाई।

आपको बता दें जनवरी में फैले स्पेनिश फ्लू से ज्यादा खतरनाक अगस्त में फैली स्पेनिश फ्लू की महामारी थी।जनवरी वाली फ्लू ने उम्रदराज लोगों की जान ली थी मगर अगस्त में फैले स्पेनिश फ्लू ने उम्र की सारी बंदिशों को किनारा कर जवान लोगों को अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया।गाँवों-शहरों में घर के घर साफ होने लगे,एक का अंतिम संस्कार किया जाता तो दूसरा दम तोड़ देता।स्पेन में तो ये हालात हो गए कि लाश का अंतिम संस्कार मुश्किल हो गया।घरों में लाशें सड़ने लगी थी,भयंकर दुर्गंध से जो जीवित थे,उनका रहना मुश्किल हो गया था।


कई देशों में सामुहिक कब्रिस्तान बनाए गए।कब्र के लिए गड्ढा खोदने वाला नहीं मिल रहा था।समुद्र के किनारे रेत में उन्हें दफनाया गया।

इसी बीच नवंबर में प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो गया और विभिन्न देशों से आए सैनिक अपने देश को स्पेनिश लौटने लगे और साथ में स्पेनिश फ्लू(एन्फ्लूएंजा)ले गए।स्पेनिश फ्लू ने दूनिया की करीब एक तिहाई आबादी को अपना शिकार बना लिया था।यह वायरस यूरोप, यूनाइडेट स्टेटस होते हुए एशिया में फैल गया।

बताते हैं कि जब गाँवों और शहरों में लोग मरने लगे तो भागकर दूसरे जगह शरण लेने की कोशिश की, मगर वहाँ के लोगों ने या तो उन्हें भगा दिया या उनकी सामूहिक हत्या कर दी गई।उन दिनों सर्दी-खांसी होना मौत की गारंटी थी।डाक्टरों के पास इस मर्ज की कोई दवा नहीं थी और जो दवा दी जा रही थी वो बेअसर साबित हो रही थी।यूरोप के कुछ डाक्टरों ने इस वायरस को H1N1 फ्लू का नाम दिया, जो कि खांसी,छीकने के दौरान निकलने वाले ड्रापलेट्स के संपर्क में आने से फैलता था।

गौरतलब है कि प्रथम विश्वयुद्ध के समय हवाई यातायात अपने शुरूआती दौर में था अन्यथा तबाही की कल्पना मुश्किल हो जाती।लोग हवाई जहाज के बजाय पानी के जहाज और रोड मार्ग द्वारा एक दूसरे जगह जाते थे।गंतव्य स्थान तक पहुँचने में हफ्तों या महीने लग जाते थे तब तक संक्रमित व्यक्ति या तो रास्ते में हीं दम तोड देता था या स्वस्थ्य हो जाता था।

कुछ रिपोर्ट्स बताते हैं कि उस समय के विकसित देशों ने डाक्टरों की चेतावनी को अनसुना किया, जिससे स्थिति और विभीत्स हो गई।कुछ लोगों ने लिखा है कि अगर देश की सीमा पर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई होती तो शायद इतनी मौतें नहीं होती।जापान में 23 मिलियन लोग प्रभावित हुऐ थे,जिनमें कम से कम 3,90,000 लोगों की मौत हुई थी।इंडोनेशिया में संक्रमित 15 लाख लोगों में से 1.5 मिलियन लोगों की मौत हुई।ताहिती में एक महीने के दौरान 13% आबादी काल के गाल में समा गई।सामोआ में 38,000 लोगों की 22% आबादी दो महीने के अंदर मर गई।न्यूजीलैंड में फ्लू ने छह सप्ताह में 6400 यूरोपीय और 2500 स्वदेशी माओरी को मार डाला।ईरान में तो रोज हजारों लोग मर रहे थे।एक अनुमान के अनुसार ईरान की कुल आबादी का 22% लोग स्पेनिश फ्लू के संक्रमण से मारे गए।

ताकतवर अमेरिका की 105 मिलियन की लगभग 28% आबादी संक्रमित हो गई और 5,00,000 से 7,50,000 लोग इस बीमारी से मारे गए थे।ब्राजील में 3,00,000 की मृत्यु स्पेनिश फ्लू से हो गई, जिसमें उनके राष्ट्रपति रोडि्ग्स अल्वेस भी शामिल थे।इस बीमारी से ब्रिटेन में 2,50,000 लोग मरे थे जब ब्रिटेन इलाज के मामले में सबसे आगे था।ताकतवर फ्रांस में 4,00,000 से अधिक लोग मारे गए।

विकसित देशों के अनुमान के मुताबिक तकरीबन पाँच करोड़ लोग संपूर्ण विश्व में इस महामारी से मारे गए थे। भारत में तकरीबन पचीस हजार लोग इस बीमारी से मारे गए।

कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ने अपने संस्मरण में स्पेनिश फ्लू की विभिषिका का मार्मिक वर्णन किया है।उन्होंने लिखा है कि "जब मैं डालामऊ में नदी के किनारे पहुँचा तो गंगा लाशों से पट पड़ी थी।मेरे ससुराल से खबर आई कि मेरी पत्नी बीमारी का शिकार होकर गुजर गई है।"यद्यपि भारत में ज्यादा फैलाव नहीं हुआ,जिससे व्यापक जनहानि नहीं हुई फिर भी पचीसों हजार आदमी मारे गए थे।

दिसंबर 1920 के महीने में आश्चर्यजनक रूप से ये बीमारी खत्म हो गई और मौतों का अंतहीन सिलसिला व्यापक जनहानि के बाद रूक गया था।

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