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नदी जो कभी बहती थी : नमामि गंगे की हो चुकी है अकाल मौत

Bhola Tiwari Mar 24, 2020, 10:29 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

पटना  :.हॉलीवुड के फ़िल्म निर्माता रोबर्ट रेडफोर्ड ने एक नदी का मुआयना करते हुए मछुआरों की ज़िन्दगी पर फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया। कोई तीन साल बाद जब वह फ़िल्म यूनिट लेकर शूटिंग के लिए उक्त नदी के किनारे पहुंचे तो उन्हें वहां नदी के बदले नाला नहीं पनाला मिला। इस कारण रोबर्ट को नकली सेट लगाकर अपनी फिल्म ' रिवर्स रन थ्रू इंट' का निर्माण पूरा करना पड़ा। फ़िल्म 1992 में आई और खूब चर्चित रही। 


आज पटना के गंगा किनारे जब भी जाता हूँ तो रोबेर्ट रेडफोर्ड की मनःस्थिति में जीने लगता हूँ। हर साल पटना जाता हूँ। हर बार कुछ नए घाट पहुंचता हूँ-- चाहे महेंद्रू घाट हो,अंटा घाट हो,बीएन कॉलेज घाट हो या अदालत घाट हो, गंगा का हाल सदमा देता है। गंगा नदी पटना में बांस घाट से लेकर कृष्णा घाट तक दो से पांच किलोमीटर दूर चली गयी है।जिस महेंद्रू घाट से हम कभी स्टीमर पकड़कर पहलेजा घाट होकर वहाँ से मुजफ्फरपुर अपने गांव जाते थे, उस महेंद्रू घाट के सामने पटना शहर का नाला बह रहा है। इस घाट के किनारे कभी बीस से पच्चीस मीटर की गहराई तक पानी होता था। तभी तो बड़े बड़े यात्रीवाहक स्टीमर यहां लगते थे। लेकिन अब इस नाला को देखकर यकीन ही नहीं होता कि कभी यहां एक संस्कृति बसती थी। सामने सरसों की खेती होती है। 


यही नाला रानी घाट होकर गाय घाट तक बहकर गंगा में गिरता है। उस नाले के पार अवैध तरीके से गेहूं और सरसों की खेती मचल रही है। पता चला कि मलगज निस्तारण संयंत्र दो साल से बेकार पड़े है। गंगा को बर्बाद करने में मानव मन ज्यादा जिम्मेवार है। पटना के हर तबके के लोगों से मिल रहा हूँ। पर्यावरणविद, पत्रकार, रसायन विज्ञानी से लेकर नदियों के स्वभाव और सेहत पर काम करनेवाली विभूतियां। दबे स्वर में सभी दुख जताते हैं। 


पत्रकार Arun Singh, Imran Khan और सीटू तिवारी खुलकर अपनी बात कहते हैं, कोई लाग लपेट नहीं। गंगा कितनी निर्मल रहेगी यह ऊपर की बातों से महसूस होता है। लेकिन अविरल क्यों रहेगी जब शहर का कंक्रीट निर्माण गंगा को लतिया रहा है। गंगा के किनारे 479 ईंट भठ्टे हैं। उनका कचरा गंगा में गिराने का प्रचलन है। इस बात का सही जवाब बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास नहीं है। बोर्ड के चेयरमैन साहब से मिलकर लौटा हूँ। महोदय इस बात पर खुलकर कुछ नहीं कहते लेकिन रिवर बेड पर बिछती बस्तियों को लेकर उनका कहना वाजिब है कि एक दिन सबको हटना होगा।

सवाल है कब। जब बर्बादी के रूपक का भरतवाक्य लिखा जाएगा तब?

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