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महामारी के समय बिजनेस कैसे चले?

Bhola Tiwari Mar 23, 2020, 8:30 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

हमलोग उस व्यवस्था में हैं, जहाँ हर हफ्ते कंपनी का आय-व्यय ईमेल पर रहता है। दिल की धड़कनें भी उससे नियंत्रित होती है। जैसी ही यह गिरता है, आपातकालीन बोर्ड-मीटिंग बैठ जाती है। अब तो यह रोज ही होती है, कि आगे क्या? 

जब दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी का शब्द है, तो कई लोगों ने विरोध किया। लेकिन, वह जानते थे कि उनकी व्यवस्था इन कंपनियों के बंद होते ही सड़क पर आ जाएगी। वह पकिया पूँजीवादी देश के मुखिया हैं। मुझे यकीन है कि डॉनाल्ड ट्रंप जैसे मँजे हुए पूँजीवादी भी लॉकडाउन नाम से ही हिल जाएँगे। कहावत है- ‘अमेरिका नेवर स्टॉप्स’। WTC क्रैश के अगली सुबह भी सब काम पर नॉर्मली गए। 

खैर, कुछ रणनीतियाँ जो योजना में है, या पहले की गयी है, उनका जिक्र कर रहा हूँ। इनमें अधिकतर भारत में संभव नहीं। 

1. मालिक की जिम्मेदारी- कंपनी के मालिक यह स्क्रीनिंग खुद कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया में तो कंपनी के दरवाजे पर ही बुखार होने पर ‘बज़र’ बज जाता है। यहाँ भी तापमान-स्कैनर और स्क्रीनिंग की व्यवस्था लगायी जा रही है। 

2. जॉब क्वारांटाइन- मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में यह करने की योजना है। एक जिले में शुरू हो चुका। इसमें हर आदमी दूरी बना कर रहेगा, उसका जॉब एरिया और कॉन्टैक्ट सीमित रहेगा। यह व्यवस्था भी मालिक की है। 

3. रोटेशन- यह महाराष्ट्र में शुरू किया जा चुका है कि बारी-बारी से लोग काम पर आ रहे हैं। स्वास्थ्य में यहाँ रोटेशन क्वारांटाइन है। यानी, जो कोरोना मरीज से संपर्क में रहा, वह क्वारांटाइन में जा रहा है, और उसके लौटने पर अगला जाएगा। यह मान कर कि बीमारी अभी लंबी चलेगी।

4. बल्क एस.एम.एस., ड्रोन मेसेज, प्रचार से एलर्ट बनाए रखना। 

5. GPS क्वारांटइन- यह भी इक्कीसवीं सदी की सुविधा है कि अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड भरने की बजाय केस को अपने घर में ही एक चिप दी जाए। और गतिविधि ट्रैक रखी जाए। यह दक्षिण कोरिया के बाद यूरोप में किया जा रहा है। कमाल की बात है कि इस लॉजिस्टिक में दिमाग भारतीय कंपनियों का भी है। 

6. कड़े जुर्माने- क्वारांटाइन से भागने की सजा लगभग आधी वेतन के बराबर है, अथवा जेल

7. नौकरी से निकालना- वर्कफोर्स घटा कर उनसे काम अधिक लेना। यह तो आर्थिक मंदी का प्रतिफल है ही। इस उम्मीद पर कि गाड़ी वापस पटरी पर आ जाएगी। 

8. वृद्धों का आइसोलेशन- यह भारत में असंभव है, लेकिन वृद्धाश्रम वाले देशों में यह किया जा रहा है।

9. अधिक और तेज जाँच- यह भी अमीर देशों के लिए ही। खर्च बीमा कंपनी, इंप्लॉयर और सरकार बाँट सकती है।

10. खरीद-बिक्री का रीटेल से ऑनलाइन शिफ्ट

11. कुछ क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम और टेली-एजुकेशन

इन सब पर सही-ग़लत की बात हो सकती है, लेकिन ध्यान रहे कि दुनिया में समाजवाद अगर है भी, तो उसकी नींव पूँजीवाद है। मानवीय मूल्य उसी ‘प्रॉफिट-लॉस’ के पास गिरवी हैं। दान-पुण्य भी बैंक-बैलेंस से ही छन कर आता है, और सरकारी खजाना भी।

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