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वी.के.मेनन ने कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आठ घंटे भाषण दिया था,क्या भूलूँ क्या याद करूँ

Bhola Tiwari Mar 23, 2020, 8:12 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

नई दिल्ली  : देश बंटवारे के बाद भी पाकिस्तान की नजर कश्मीर पर थी।भाषा,संस्कृति,भौगोलिक स्थिति और खान-पान के लिहाज से कश्मीरी खुद को पाकिस्तान के निकट पाते थे।दोनों की रिश्तेदारी दोनों तरफ थी और निकाह आम बात थी।पाकिस्तान किसी भी हाल में कश्मीर पर कब्जा करना चाहता था।कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने ये फैसला लिया था कि वो अपने राज्य का विलय भारत और पाकिस्तान किसी में नहीं करेंगे।सन् 1947,आजादी के थोडे हीं दिनों बाद जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर कबाइलियों का आक्रमण हो गया।राज्य की शाही सेना आधुनिक हथियारों से लैस कबाइलियों से मुकाबला नहीं कर सके और धीरे-धीरे कबाइलियों ने जम्मू-कश्मीर के दो तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया।

चिंतित महाराज हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी।भारत में विलय की शर्त पर भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर जाकर कबाइलियों को खदेड़ दिया,मगर एक तिहाई भू-भाग पर उनका कब्जा बरकरार रहा जो आज भी नासूर बन चुभता रहता है।युद्ध जीतने के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान की हिमाकत की शिकायत कर इस मुद्दे का अंतराष्ट्रीयकरण कर दिया।कुछ लोगों का कहना है कि अंग्रेजों के कहने पर नेहरू यूएन गए थे मगर इसकी क्या जरूरत थी मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कश्मीर पर चार प्रस्ताव पास किये जो प्रस्ताव नंबर 38,39,47 और 51 कहलाया।

पाकिस्तान के कहने पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल,1948 को प्रस्ताव संख्या 47 पेश किया।इस प्रस्ताव के मुताबिक कश्मीर में जनमत संग्रह होना था।भारत ने भी उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रस्ताव संख्या 47 पर अपनी सहमति दे दी थी।

1950 के दशक आते-आते भारतीय हुक्मरानों को अपनी गलती का ऐहसास हुआ।वे ये समझ गए थे कि अगर कश्मीर में जनमत संग्रह हुआ तो कश्मीर भारत के हाथ से निकल जाएगा।एक पत्रकार और लेखक के तौर पर मेरा आज भी ये मानना है कि अगर कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह होगा तो वे भारत के बजाय पाकिस्तान के साथ जाना ज्यादा पसंद करेंगे।खैर ये मेरा आज का विषय नहीं है।भारत ने ये कहते हुए जनमतसंग्रह से दूरी बना ली कि पाकिस्तानी सेना पूरी तरह राज्य से नहीं हटी है,जबकि शुरुआत में हीं ये तय हुआ था।इस तरह इस मामले को लटका दिया गया।

साल 1957,संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान ने फिर कश्मीर मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया।पाकिस्तान की तरफ से सर फिरोज नून खाँ ने कश्मीर में जनमतसंग्रह की माँग को बुलंद किया और एक जोरदार भाषण दिया।उन दिनों लोग मानकर चलते थे कि संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर पर पाकिस्तान का केस बहुत मजबूत है और आज नहीं तो कल कश्मीर पाकिस्तान की झोली में चला जाएगा।

भारत की तरफ से वी.के.मेनन ने मोर्चा संभाला और उन्होंने कश्मीर पर आठ घंटे का भाषण देकर लोगों की कश्मीर पर अवधारणा को बदल दिया।भारत के विरोधी देशों के प्रतिनिधियों ने वी.के.मेनन के भाषण की सराहना की।वी.के.मेनन अपनी भाषण पूरा करते हीं बेहोश होकर गिर पडे थे मगर उन्होंने वो कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।वे राष्ट्रीय हीरो बन गए।जब वे यूएन से भारत लौटे तो हजारों भारतीयों ने बंबई के सांताक्रूज हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया।

अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुऐ मेनन मुंबई से लोकसभा चुनाव लडा और बिना एक दिन भी प्रचार किए वो भारी मतों से जीत गए।नेहरू जी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में रक्षामंत्री बनाया।

"अ चीकर्ड ब्रीलियंस द मैनी लाइव्स आँफ वीके मेनन" के लेखक जयराम रमेश बताते हैं,"1952 से लेकर 1957 तक कृष्ण मेनन को फार्मूला मेनन कहा जाता था।कहीं भी कोई समस्या हो कोरिया में,अफ्रीका में,कांगों में,स्वेज में हर जगह मांग उठती थी कृष्ण मेनन को बुलाओ।"

आपको बता दें आजादी के बाद नेहरू ने मेनन को इंग्लैंड का पहला हाईकमिश्नर नियुक्त किया था।मेनन अपनी सेवा के बदले एक रूपया तनख्वाह लेते थे बाद में उन्होंने वो भी बंद कर दिया था।वे वामपंथी विचारधारा के बेहद करीबी थे और वामपंथी देशों को अपना पूर्ण समर्थन देते थे।उनकी बातों से परेशान होकर 1951 में इंग्लैंड की क्लेमेंट एटली की लेबर सरकार ने नेहरू को फरमान सुना दिया था कि वे वीके मेनन को हिंदुस्तान बुला लें।उनपर कम्यूनिस्टों से साठगांठ का आरोप लगाया गया था।अमेरिकी प्रशासन ने भी उनसे दो हाथों की दूरी बना ली थी।नेहरू को अमेरिका और इंग्लैंड के सियासतदां पसंद करते थे मगर वीके मेनन के अमेरिका और इंग्लैंड के खिलाफ बेबाकी और तेवर से नेहरू असहज हो जाया करते थे।नेहरू मेनन की क्षमता को जानते थे मगर उनकी बेबाकी और कम्युनिस्ट झुकाव से परेशान रहते थे।एक बार एक मशहूर अमेरिकी पत्रकार उनका साक्षात्कार लेने आया तो उन्होंने उससे साफ कह दिया था कि "आप मुझसे कुछ भी पूछिएगा, बस कश्मीर और कृष्णा के बारे में नहीं।"

वीके मेनन कम्युनिस्ट देश चीन को बेहद पसंद करते थे और उनके कट्टर हिमायती भी थे मगर इसी चीन ने भारत के पीठ में "हिंदी-चीनी भाई-भाई" कहते हुए छूरा भोंका।तत्कालीन सेनाध्यक्ष के.एस.थिमैया ने सीमा पर हलचल देखकर रक्षामंत्री मेनन को कहा था कि सीमा पर चीन की हरकत ठीक नहीं है, वो कुछ भी कर सकता है।रक्षामंत्री मेनन ने उनकी आशंकाओं को ठुकराते हुऐ कहा था कि भारत को पाकिस्तान से खतरा है चीन से नहीं।सेनाध्यक्ष ने रक्षामंत्री से सेना के आधुनिकीकरण के लिए बेल्जियम राइफल्स की मांग की थी,लेकिन मेनन ने कहा था कि वो सेना को नाटो के हथियार नहीं देंगे।

सेनाप्रमुख और रक्षामंत्री का विवाद उन दिनों बहुत चर्चित हुआ था।सन् 1962 के चीन-भारत के युद्ध में भारत की बुरी तरह पराजय हुई और लोगों के विरोध को देखकर वीके मेनन को इस्तीफा देना पड़ा था।

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