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सेवा परमो धर्म:

Bhola Tiwari Mar 21, 2020, 8:12 AM IST टॉप न्यूज़
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नीरज कृष्ण 

पटना : सवे रहीम नर धन्य हैं पर उपकारी अंग,

           बाॅटन बारे को लगे ज्यों मेंहदी को रंग ।

अर्थात वह मनुष्य धन्य है जिसका शरीर परोपकार में लगा है जैसे मेंहदी पीसने बाले को हाथ में लग कर उसे सुन्दर बना देती है।

सेवा किसलिए करनी चाहिए? स्वामी शिवानन्दजी ( डिवाइन लाइफ सोसायटी, ऋषिकेश) का मानना था कि मनुष्य जीवन भर कर्म करता है, जिसका प्रयोजन स्वार्थपूर्ति होता है। लेकिन जब उसी कर्म को हम स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं, बल्कि परोपकार की भावना से करते हैं, तो वह कर्म सेवा का रूप ले लेता है। जब हम अपने लिए भोजन करते हैं, तो परमार्थ कर्म हुआ। जब हम अपना उपचार करते हैं, तो वह सेवा कर्म हुआ।

प्रारम्भ में मनुष्य का कर्म स्वार्थ से थोड़ा अलग होकर परमार्थ से जुड़े, तो उतना ही पर्याप्त है। उससे ज्यादा नहीं चाहिए। सौ प्र्रतिशत स्वार्थ से जुड़े हुए कर्म में बीस प्रतिशत परमार्थ जोड़ दो, वह कर्म सेवा बन जाएगा। वह कर्म तुम्हारी आत्म-संतुष्टि या स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं, परोपकार के लिए होगा और सेवा का रूप लेगा। जब सेवा का रूप लेगा, तब तुम्हारे कर्म से दूसरों के जीवन में प्रसन्नता आएगी, खुशी आएगी। तुम्हारे कर्म से वे अपने आपको धन्य मानेंगे और उनका आशीर्वाद तुम्हें प्राप्त होगा।(Bliss Divine)

जीवन के स्वाभाविक कर्मों में संतुलन लाने के लिए स्वामी शिवानन्दजी ने कहा कि कर्म करो, लेकिन कर्म को सेवा का रूप दे दो। अस्सी प्रतिशत कर्म, अपने और अपने परिवार के लिए करो और बीस प्रतिशत कर्म परोपकार की भावना से करो। इससे एक नई सोच, व्यवहार और आचरण की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। एक बार एक कदम लेने पर, दूसरा कदम स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ जाएगा।

रामचरित मानस की एक लाइन है, 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई।' आम आदमी को धर्म का मर्म सरल ढंग से समझाने के लिए मानस की चौपाई बहुत ही उपयुक्त है। सार यह है कि दूसरों की भलाई करने जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है। 

सभी धर्म की सभी परिभाषाओं और व्याख्याओं का निचोड़ है अच्छा बनना और अच्छा करना। और दूसरों की भलाई करना तो निस्संदेह अच्छा करना है। सभी मजहबों ने एकमत होकर जिस बात पर जोर दिया है, वह है मानवता की सेवा यानी 'सर्वभूत हितेरता' होना। भूखे को भोजन कराना, वस्त्रहीनों को वस्त्र देना, बीमार लोगों की देखभाल करना, भटकों को सही मार्ग पर लगाना आदि धर्म का पालन करना है, क्योंकि धर्म वह शाश्वत तत्व है जो सर्व कल्याणकारी है। 

परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं। परोपकार की भावना ही वास्तव में मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है। कभी किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय चेहरे पर व्याप्त सन्तुष्टि के भाव से जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, वह अवर्णनीय है ।

किसी वास्तविक जरूरतमंद व्यक्ति की नि:स्वार्थ भाव से अभाव की पूर्ति करने के बाद जो सन्तुष्टि प्राप्त होती है, बह अकथनीय है । परोपकार से मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है।

व्यक्ति ‘स्व’ की सीमित संकीर्ण भावनाओं की सीमा से निकलकर ‘पर’ के उदात्त धरातल पर खड़ा होता है, इससे उसकी आत्मा का विस्तार होता है और वह जन-जन के कल्याण की ओर अग्रसर होता है।

प्रकृति सृष्टि की नियामक है, जिसने अनेक प्रकार की प्रजातियों की रचना की है और उन सभी प्रजातियों में सर्वश्रेष्ठ प्रजाति मनुष्य है, क्योंकि विवेकशील मनुष्य जाति सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह स्वयं से परे अन्य लोगों की आवश्यकताओं की भी उतनी ही चिन्ता करती है, जितनी स्वयं की।

इसी का परिणाम मनुष्य की सतत विचारशील, मननशील एवं अग्रगामी दृष्टिकोण सम्बन्धी मानसिकता के रूप में देखा जा सकता है। प्रकृति के अधिकांश जीव सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही स्वयं को सीमित रखते हैं, अपनी एवं अपने बच्चों की उदरपूर्ति के अतिरिक्त उन्हें किसी अन्य की चिन्ता नहीं रहती, लेकिन मनुष्य स्वयं के साथ-साथ न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे समाज को साथ लेकर चलता है एवं उनके हितों के प्रति चिन्तित रहता है।

नदियां लोक कल्याण के लिए अपना जल बहाती हैं, वृक्ष दूसरों को अपनी छाया और फल देते हैं, बादल वसुन्धरा पर जनहित में पानी बरसाते हैं। इसी प्रकार सत्पुरुष स्वभाव से ही परहित के लिए कटिबद्ध रहते हैं। परहित नि:स्वार्थ होना चाहिए। जहां स्वार्थ का भाव आ गया, वहां परहित रहा ही नहीं। यदि किसी की भलाई, बदले में कुछ लेकर की तो वह भलाई नहीं एक प्रकार का व्यापार है। परहित तो वह है, जिसमें दधीचि मुनि देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियां दे देते हैं। अर्थात स्वयं का बलिदान कर देते हैं। जिसमें राजा दिलीप गाय को बचाने के लिए सिंह का भोजन बन जाते हैं। और विलाप करती हुई जानकी को रावण के चंगुल से बचाने के लिए संघर्ष करते हुए जटायु अपने प्राण निछावर कर देते हैं। परहित में प्रमुख भाव यह रहता है कि ईश्वर द्वारा दी गई मेरी यह शक्ति और सार्मथ्य किसी की भलाई के काम आ सके।

रहिमन पर उपकार के करत न यारी बीच

मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच।

अर्थात परोपकार करने में स्वार्थ; अपना पराया मित्रता आदि नही सोचना चाहिये।

राजा शिवि ने कबूतर की प्राण रक्षा हेतु अपने शरीर का मांस और दधीचि ऋषि ने अपनी हड्डियां दान दी थी।

परोपकार में जीवन का बलिदान करने से भी नही हिचकना चाहिये ।

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