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कोरोना वायरस : मास क्वारांटाइन

Bhola Tiwari Mar 20, 2020, 7:39 AM IST टॉप न्यूज़
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डॉ प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

इसकी जरूरत अमूमन नहीं पड़ती, लेकिन बड़े देशों में यह कभी-कभी जरूरी होता है। जैसे चीन और भारत बड़े देश हैं, जहाँ अगर संक्रमण का केंद्र मालूम है, तो उसे बाकी के देश से काट कर ‘क्वारांटाइन’ करना पड़ता है। चीन में इसमें कुछ देर हुई, लेकिन पहले वूहान और आस-पास के शहरों के रास्ते बंद कर दिए गए, फिर पूरे हूबइ प्रांत के। इस वजह से काफी हद तक संक्रमण उस इलाके तक सीमित रह गया, और पूरे चीन में उस विकराल रूप में नहीं पसरा। इसका प्रबंधन भी सुलभ होता है कि पूरे देश की बजाय एक क्षेत्र पर फोकस करना। और आज चीन इस स्थिति में पहुँच रहा है कि एक भी नए केस नहीं मिल रहे। यह भारत में भी पहले गुजरात प्लेग के समय किया जा चुका है।

नॉर्वे में मेरे जिले में पिछले हफ्ते में मात्र एक केस मिला। मेरे पड़ोस के दो जिलों में भी बस एक-एक केस हैं। लेकिन ठीक अगले दो जिलों को मिला कर एक हज़ार केस हैं! ऐसा कैसे संभव है कि दो जिले मिला कर हज़ार केस हों, और पड़ोसी में बस एक? यह तो कोई तार्किक अनुपात ही नहीं। और ऐसा भी नहीं कि ट्रेन-बस बंद कर दिए गए। यह ‘मास क्वारांटाइन’ से संभव हो पाता है, जब उस क्षेत्र के लोगों को आवा-जाही बंद करने कह दिया जाता है। अब बीमारी पूरी गति से पसरेगी, लेकिन एक सीमित क्षेत्र में। वहाँ सरकारी फंड और संसाधन भी केंद्रित किए जाएँगे। इससे कुछ बीमारियों में एक सामूहिक इम्यूनिटी भी बनती है, जिसे ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। लेकिन, कोरोना में यह संभव नहीं हो सका है।

भारत में भी यह पद्धति लागू है ही, और हो भी रही है। महाराष्ट्र से यातायात घटाने के प्रयास चल रहे हैं। जिन शहरों में एक भी केस मिल रहे हैं, वहाँ धारा 144 लगाने की कवायद चल रही है। यानी, उस शहर के लोग सामूहिक रूप से क्वारांटाइन पर चले जाएँ और आगे पसरने न दें।

यह ब्रह्मास्त्र है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सबसे कारगर उपाय है। क्योंकि पूरे देश में पसरने के बाद संसाधन का वितरण असंभव होता जाता है, जिस समस्या से अमरीका जैसा शक्तिशाली और धनी देश अब जूझ रहा है।

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