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भारत में दक्षिणपंथी विमर्श एक चिंतनधारा कम प्रॉपेगेंडा ज्यादा

Bhola Tiwari Feb 25, 2020, 7:45 AM IST टॉप न्यूज़
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दिनेश श्रीनेत

नई दिल्ली  : इसे दो तरीकों से समझा जा सकता है। मौजूदा दौर में दक्षिणपंथी विचारक और राजनीतिक पार्टियां जिस हिन्दुत्वाद की बात करते हैं, उसकी अवधारणा बड़ी अस्पष्ट है और उसमें बहुत से विरोधाभास हैं। हिन्दुत्व के नाम पर दक्षिणपंथी कुछ स्थूल प्रतीकों को चुनते हैं और बताते हैं कि दरअसल यही हमारी धार्मिक पहचान है। ये प्रतीक होते हैं अमूमन मंदिर, मठ, आरती, भगवा झंडे, चंदन-तिलक आदि। इस मामले में इनका विमर्श स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, रमण महर्षि और रामकृष्ण परमहंस की विवेचनाओं से भी पीछे है। जबकि ये सभी विचारक देश के पुनर्जागरण काल में ही हिन्दु धर्म और अनुशीलन की विशद व्याख्यायें दे चुके थे। 

भारतीय जनमानस उस तरीके से धार्मिक नहीं रहा जिस तरीके से यूरोप के ईसाई थे। जब सनातन धर्म का जिक्र होता है तो इसे ब्राह्णणवादी व्यवस्था से जोड़ दिया जाता है। जबकि ब्राह्णणवादी व्यवस्था को हिन्दू धर्म पर आरोपित किया गया है और इसने धर्म का काफी नुकसान किया है। इस बात को थोड़ा और गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। सनातन का अर्थ मनु की लिखी किताब के कायदे-कानून नहीं हैं बल्कि 'सनातन' अपने दार्शनिक अर्थ में प्रकृति की निरंतरता से मनुष्य का नाता है। नदियां हजारों साल से बह रही हैं। धर्म उनसे रिश्ता जोड़ता है। गंगा का महात्म्य है मगर देश की हर छोटी नदी का आसपास के गांवों से धार्मिक रिश्ता है। यही हाल वृक्षों का है। पीपल, आम, केले के पत्ते और बेल पत्र प्रकृति की आराधना का ही एक हिस्सा है। फिर पशु आते हैं। गाय की पूजा होती ही है, नंदी की भी, कुत्ता कालभैरव है तो कौवों का भी महत्व है। 

सामान्यतः हिन्दू धर्म में पूजा करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं थी। पूजा अपने पर्यावरण से रिश्ता बनाने की प्रक्रिया थी। हर समाज के अपने कुल देवता और देवियां होती थीं। उसके लिए भी किसी बाहरी व्यक्ति को नियम-कानून बनाने की जरूरत नहीं थी। दक्षिणपंथियों ने अपने विमर्श के जरिए हिन्दू धर्म के इस बहुलतावाद को कुचला है। उनकी दिलचस्पी धर्म के सार्वजनीकरण या वैयक्तिकता अथवा दार्शनिक ऊंचाइयों में नहीं रही है, बल्कि धर्म के जरिए ताकत हासिल करने और आक्रामक होने में रही है। यहां धर्म का हर वह रूप मुखर होकर सामाने आता है जहां उसके माध्यम से समाज के कुछ वर्गों पर स्थायी वर्चस्व हासिल किया जा सके। उदाहरण के लिए ज्यादातर दक्षिणपंथी नारीवादी विमर्श से चिढ़ते हैं। वे परिवार में सत्ता के केंद्रीयकरण के हिमायती हैं। 

भारत में मौजूदा हिन्दुत्ववादी लहर ने हमेशा अपने लिए शत्रु तलाशे हैं और उसके बहाने धर्म के भीतर आक्रामक तत्वों को मजबूती से स्थापित किया है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जनमानस के भीतर बसे तुलसी के राम को मिटाने का प्रयास किया गया। वे एक पारिवारिक राम थे, जिन्हें हम "सीता-राम" कहकर याद करते थे। वे जननायक के रूप में स्थापित थे। उसकी जगह अकेले धनुष लेकर निकलने 'राम' आ गए और "जय श्री राम" एक आक्रामक उद्घोष में बदल गया। राम तो कभी अकेले रहे ही नहीं। आप कोई पुरानी तस्वीर याद करें आपको राम हमेशा सीता, हनुमान, लक्ष्मण या अपनी पूरी वानर सेना के साथ दिखते हैं। हाल के दिनों में बलशाली मगर भोले रामदूत हनुमान की जगह पश्चिम की कॉमिक आर्ट से प्रभावित क्रुद्ध हनुमान कारों पर स्टीकर के रूप नजर आते हैं। 

दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी धार्मिक विमर्श में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, कबीर और जे कृष्णमूर्ति के लिए जगह नहीं हैं। भारत से निकलकर दुनिया के तमाम देशों में फैले बौद्ध धर्म को वे अपने देश की पहचान से नहीं जोड़ते। बल्कि बहुत से दक्षिणपंथी बौद्ध धर्म की आलोचना करते हैं और उनके अहिंसा के सिद्धांत को हिन्दू धर्म के लिए घातक बनाते हैं। आम तौर पर उग्र हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए यह तर्क रचा जाता है कि हिन्दू की सांस्कृतिक पहचान खतरे में हैं। जबकि हकीकत यह है कि इस देश में किसी भी हिन्दूू को अपनी पूजा पद्धति अथवा सार्वजनिक धार्मिक उत्सवों - जिनमें कुंभ, पदयात्रायें, देश के विभिन्न हिस्सों में तीर्थ आदि शामिल हैं - की पूुरी आजादी है। 

अब सांस्कृतिक पहचान का संकट दिखाकर अक्सर दो काम किए जाते हैं। पहला, सांस्कृतिक पहचान के नाम पर समाज के कुछ समुदायों पर अंकुश रखना। उदाहरण के लिए महिलाओं का पहनावा ही जैसे हिन्दुत्व के सांस्कृतिक पहचान की सबसे बड़ी रणभूमि है। विदेशी वस्त्र, कालेज में जींस पहनने का विरोध, स्त्रियों को परंपरागत खांचे में बनाए रखने की कोशिश- इसका हिस्सा होती है। सांस्कृतिक पहचान की आड़ में अन्य संस्कृतियों पर हमले किए जाते हैं। जैसे वैलेंटाइन डे का विरोध, ईसाइयों का विरोध, मुसलमानों की जीवनशैली पर कटाक्ष आदि। इस देश के दलित और आदिवासी भी अपने तरीके से पूजा करते हैं, मगर दक्षिणपंथी हिन्दुत्व में उनकी विविधता और उपासना की लिए भी जगह नहीं है। 

अब अगर गौर करेंगे तो यह पूरा विमर्श दरअसल अपरोक्ष रूप से एक सत्ता कायम करने के उपक्रम में रहता है। यह साबित करने का प्रयास किया जाता है कि कुछ ही प्रतीक ही हिन्दुत्व के वास्तविक प्रतीक हैं और उनके साथ रहने समुदाय खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे। लोगों को तथाकथित बाहरी (काल्पनिक) शत्रुओं से डराया जाता है, क्योंकि वास्तव में कोई बाह्य शत्रु है ही नहीं तो अंत में यह हिन्दुत्व अपने ही समुदाय पर हमला करने लगता है। ऊपर मैंने प्रोपेगेंडा की बात कही थी। सबसे प्रभावी प्रोपेगेंडा वह होता है जो ऊपरी तौर पर सत्य लगे मगर उसमें असत्य, अर्धसत्य या तार्किक दोष से भरे कथनों का घालमेल हो। उसका मकसद सूचना देने के बजाय एक खास हित के लिए लोगों के व्यवहार और राय को प्रभावित करना होता है। 

इसलिए, भारत में दक्षिणपंथी विमर्श एक चिंतनधारा कम प्रॉपेगेंडा ज्यादा है।

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