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अनब्याही माँ : चपला के बहाने इतिहास को देखा

Bhola Tiwari Feb 24, 2020, 7:33 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : कालाहांडी जिले के मदनपुर रामपुर प्रखंड के गॉंव उरलादानी का नाम इतिहास में दर्ज है। देश के आदिवासों विद्रोहों को जानने की जिज्ञासु लोगों को शायद पता हो कि ओडिशा के कोंध आदिवासियों ने कैसे ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ रिन्डो मांझी की अगुआई में बगावत की थी। क्योंकि वहां के राजा पर दवाब डलवाकर अंग्रेजों ने उन आदिवासियों की प्रथाओं पर निशाना साधा था।अपनी वजहों से या कुदरत की पडी कभी किसी मार से कोंध आदिवासियों को अन्न नसीब नहीं हो सका, इसका उन्हें कोई गम नहीं और न ही किसी तरह का भय उनके अंदर आया। विभिन्न जमाने में महाकांतर-महावन-दक्षिण कोशल या त्रिकलिंगा की प्रजा कहलाने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं था। लेकिन नागरेजों ने जब समूचे इलाके को अपने कब्जे में लिया तो उसने वहां की प्रजा पर टैक्स बाँध दिया। 

इसके बाद इलाके में अंग्रेज सेना के जवान चहलकदमी करने लगे। कोंध धरती के प्रति उपकृत आदिवासी समाज रहा है। उनका मानना है कि धरती जो देती है तभी हम ज़िंदा हैं इसलिए उसके लिए हमारा भी उत्सर्ग जरूरी है। तभी खेती के लिए धरती के मनुहार और अपने कुल-देवता को प्रसन्न करने केलिए कोंध समाज नरबलि दिया करता था। किंतु अपनी सत्ता की स्थापना के बाद में कोंध लोगों को ब्रिटिशों ने जब नरबलि देने से रोकने की कोशिश की तो समूचा इलाका भड़क उठा।     

   इस ग़दर में व्यापक जानमाल का नुक्सान हुआ था लेकिन अंत में रिन्डो मांझी इसी गॉंव के पास अंग्रेजी सेना के साथ संघर्ष करते हुए पकड़े गए। हम इसी उरलादानी में स्थापित इस जननायक की मूर्ति के सामने 1855 के उक्त विप्लव की चर्चा कर रहे थे कि 1857 के ग़दर के पहले ही बग़ावत की चिंगारी इस कोंध आदिवासी बहुल इलाके में सुलग चुकी थी। यह मेरे लिए नयी जानकारी थी अन्यथा मैं तो चपला नामक एक अविवाहित माँ से मिलने के गरज से आज से कोई तेरह साल पहले यहां पहली बार यहां आया था। पत्रकार चेतभवानी अग्रवाल बताने लगे कि यह इलाका प्रिमिटिव ट्राइबल कोंध बहुल है। कोंध अपने समय के बेहद ज़िद्दी तबियत के आदिवासी रहे हैं और आज उनकी पहचान 'आदिम' के तौर पर होती है-- मतलब प्रारम्भिक और प्राचीन। पहली बार की अपनी उस यात्रा के दिनों में वहां की एक गैर-सरकारी संस्था सेबा जगत के कर्ता-धर्ता सत्यनारायण पटनायक के बारे में जानकारी मिली कि वह पहाड़ों से आते वर्षा जल के बहाव को रोककर संचित पानी के उपयोग का गुर वहां के आदिवासियों को सीखा रहे हैं। वह गॉंव में माटी की सेहत सुधारने केलिए जैविक खेती और आदमी के बेहतर सेहत केलिए अपने कुनबे के साथ टीकाकरण अभियान कई पंचायतों में चला रहे थे। 

उसके बाद मैं यहाँ कई बार आया। विदेशी दाता सस्थाओं द्वारा संचालित प्रोजेक्ट्स को देखने और उनके मूल्यांकन के चलते या आदिवासी जीवन को समझने की आरजू के साथ कालाहांडी के तमाम प्रखंडों में घूमने-भटकने का मौक़ा मिलता रहा। जब भी आया इस इलाके के बारे में कुछ पढ़कर, जानकारी लेकर। यहाँ के लोग, यहाँ की ज़मीन और जंगल की एक से एक कहानियां हैं जिनके बारे में अभी चर्चा होना बाकी हैं। यदि कोंध लोग 'मेरिया' नरबलि देते थे तो उन जंगलों में प्रेतात्माओं और वन-देवियों से जुड़ी एक से एक लोककथाएं ओडिशा के वाचिक महाकाव्य का रूप लेने के लायक हैं। इन वनों की अपनी प्राचीनता रही है और उस प्राचीनता में हिंसक जानवरों से बचने और अच्छी वर्षा केलिए कोंध लोग नरबलि दिया करते थे।

यह विश्वास उनके अंदर इतनी गहराई से बैठा था कि अन्य गाँवों से मेरिया उपलब्ध नहीं होने पर वे अपने ही बेटे या बेटियों की बलि देते थे। यह प्रथा उन्नीसवीं सदी तक जारी रही और अंग्रेजों के हस्तक्षेप के बाद जब बलि देनेवालों की धर-पकड़ शुरू हुई तो धीरे-धीरे इस प्रथा का अंत हो गया। इस सम्बन्ध में अंग्रेज अधिकारीयों मेजर कैम्पवेल और मैक्फर्सन की सराहनीय भूमिका रही।

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