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अनब्याही माताएं : नरमुंड दरवाजे पर टांगकर जश्न मनाया करते थे....

Bhola Tiwari Feb 23, 2020, 9:22 AM IST टॉप न्यूज़
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अमरेंद्र किशोर

नई दिल्ली  : पत्रकार चेतभावनी अग्रवाल ने बालीगुड़ा चलने का मन बनाया क्योंकि वहां के बनवासी सेवा आश्रम में कई अनब्याही माताएं शार्ट-स्टे होम में ठहरी हुई थीं। हमें शार्ट स्टे होम में हमें दो अनब्याही माताओं से मिलना था और साथ में गौरी अम्मा का ख़ास बुलावा आया था । गौरी अम्मा ने यहाँ प्रचलित नरबलि प्रथा को मिटाने में अपना जीवन खपा दिया था। इसके पहले आश्रम के संस्थापक माननीय बिश्वनाथ पटनायक ने आने का बुलावा पहले ही भेजा था। उरलादानी से बालीगुडा की दूरी 60 किलोमीटर के आस-पास है। कालाहांडी के जिला मुख्यालय भवानीपटना या उसके आगे तेल नदी के किनारे बसे जिले के व्यापारिक केंद्र केसिंगा से भुवनेश्वर जाने के रास्ते पड़ता है बालीगुडा। इस दूरी को पूरा करने केलिए बीच जंगलों से गुजरते हुए, घाटियों को पार करना इतना आसान आज भी नहीं है। लेकिन आजादी की लड़ाई में स्थानीय आदिवासियों को लामबंद करनेवाले बिश्वनाथ पटनायक से मिलने का मौका हम किसी भी सूरत में चूकना नहीं चाहते थे। 


ओडिशा के आदिवासी बहुल कंधमाल ज़िले के साथ अपना वास्ता बहुत पुराना रहा है। कभी पुतुडी जलप्रपात के चारों ओर के घनघोर जंगलों में कहीं अजगर सांप के झुण्ड का पानी पीने केलिए किसी झील की तरफ जाते देखना, कभी मनोज साहू के साथ मोटरसायकिल पर सवार होकर बालीगुड़ा से दरिंगबाड़ी जाने के रास्ते सीमानबाडी के जंगलों में चीता से आमने-सामने होना या पोडापोड़ा गाँव में नशे में धुत्त उत्सव मनाते पचास के करीब आदिवासियों द्वारा भैंस के गर्दन पर तेज़-धारदार हथियार की चोट से अनुष्ठान को अंजाम देते देखना-- ऐसे तमाम दृश्य ओडिशा को भारत के पूर्वी छोर के राज्यों से अलग पहचान देते हैं। अभी हाल में पता चला जलंधर के बारे में-- एक दुर्गम गांव के रहने वाले इस जलंधर नायक ने कभी 'बिहार के माउंटेन मैन' कहे जाने वाले दशरथ मांझी के बारे में नहीं सुना। मगर दशरथ की तरह जलंधर भी बीते दो साल से अपने गांव में पहाड़ काटकर रास्ता बनाने के लिए जुटे हुए हैं। इस वजह से कंधमाल आना और यहाँ रहना मेरे लिखे ख़ास साबित होता है। 


इस जिले का एक ख़ास आकर्षण संजोये यह कस्बा बालीगुड़ा अब शहर बनने की छटपटाहट में है किन्तु इसका आदिवासीपन अपनी जगह कायम है। अनब्याही माताओं को लेकर चेतभवानी ने बताया कि कंधमाल का आदिवासीपन आज भी कहीं ज्यादा पारम्परिक है इस वजह से वहां अनब्याही माताओं की संख्या बहुत ज्यादा है। बिश्वनाथ पटनायक ने अनब्याही माताओं के राहत और पुनर्वास को लेकर सराहनीय काम किया था, इसलिए उनसे मिलकर परिस्थितियों और कारणों की पड़ताल करना जरुरी था।      


याद रहे ओडिशा में गांधी विचारधारा के प्रचार-प्रसार करने आजादी के तुरंत बाद पालकी में सवार होकर और कहीं पैदल चलकर गंजाम से बालीगुड़ा में जा पहुंचे थे बिश्वनाथ पटनायक और वहीं बस भी गए। इसके पहले वह कोरापुट में खादी के प्रचार-प्रसार में अच्छी सफलता हासिल कर कोरापुतिया गांधी के नाम से सम्बोधित किये जाने लगे थे। (ट्राइबल पापुलेशन इन फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ़ रायगड़ा डिस्ट्रिक्ट एंड रोल ऑफ़ बिश्वनाथ पटनाइक/रघुनाथ रथ-ओडिशा रिव्यु-अगस्त 2012) इन कोरापुतिया गांधी ने कोंध आदिवासियों के बीच सराहनीय काम किया था। जानकारी यह भी मिली कि कभी मुंड आखेटक के नाम से कुख्यात कोंध लोगों को गाँधी की अहिंसा से हत्या की जीवन-शैली से उन्हें खेती-बाड़ी करना विश्वनाथ पटनायक ने सिखाया। उन्होंने खेतों में टंगे इंसानी खोपड़े के बिजूका को प्यार-प्यार से उखड़वाकर पहले भैंस और बैल के खोपड़े के प्रयोग केलिए कोंध आदिवासियों को मनाया और बाद में खोपड़ी वाले बिजूका लगाना कोंध भूल गए। अन्यथा नरबलि देनेवाले आदिवासी इंसान को ख़ास अनुष्ठान के बाद मारकर उसके खून से धान सने धान का बिचड़ा खेतों में डालते थे और नरमुंड दरवाजे पर टांगकर जश्न मनाया करते थे। जब धान की फसल लहलहाने लगती थी तबतक खोपड़ी से चमड़ी और मांस सूखकर अलग हो जाता था तो फिर अनुष्ठान के साथ बिजूका खेतों में खोंस दिया जाता था। 

कोंध और बाकी आदिवासी समाज में किसानी एक अनुष्ठान आज भी है। लेकिन गौरवशाली इतिहास, यहाँ की भौगोलिक खूबियों और चारों ओर कायम सामाजिक समृद्धि के बीच उमंग में डूबे गॉंवों में अनब्याही माताओं की आबादी को देखना दुखद आश्चर्य देता है। 

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