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कनपुरिया गंगा, कनपुरिया गुटखा, डबल हाथरस का मिष्ठान और हरजाई माशूका सी साबरमती एक्सप्रेस..

Bhola Tiwari Feb 21, 2020, 10:33 AM IST टॉप न्यूज़
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राजीव मित्तल 

नई दिल्ली : ओम थानवी की थेथरई के चलते चंडीगढ़ की जनसत्ताई छोड़ी तो घनश्याम पंकज ने पुरानी खुंदक निकालते हुए लखनऊ ऑफिस में न रख कानपुर भेज दिया ( कारण: आठ साल पहले उनके केबिन के बाहर लगे लाल बल्ब पर पेपरवेट से निशाना साधना और बदकिस्मती से उनके स्टाफ की ललनाओं के दिल में अपन के गायन से गुदगुदी होना).. निहायत अवसाद वाले कानपुर के उन दिनों में एकमात्र राहत थी संपादक नवीन जोशी का होना..

स्वतंत्र भारत की नौकरी रात दो बजे खत्म होती..उसके बाद मेस्टन रोड की मिश्रा लॉज में हम स्वतंत्रभारतीयों का एक समूह वहां की खटिया तोड़ने के हर रात दस रुपये देता..कुछ दिन गुजरे और अपन के मुरझाए चेहरे पर रंगत लौटी तो एकसुबह साथी धीरेंद्र श्रीवास्तव के नेतृत्व में हम पांच गंगा स्नान को गए.. वहां पहुंच कर लगा कि यहां तो केवल शौच क्रिया को ही आया जा सकता है..दूर दूर तक फैले गंगा के पूरे विस्तार में डूब मरने तक की जगह नहीं..हर तरफ या तो कूड़ा या मुर्दा जीव तैर रहे..काफी देर तलाशने के बाद एक धारा दिखी जहां तौलिया डुबो के बदन पोंछा गया..

दो चार दिन बाद ही ऐसे निकृष्ट गंगा स्नान की पवित्र भावना से पीछा छुड़ाया गया..हालांकि एक साल बाद कंपनीबाग में बहती गंग नहर और बिठूर की गंगा ने साबित कर दिखाया कि वो शिवजी की जटा से मेरे जैसे पापी को मोक्ष दिलाने को ही धरती पर उतरीं..

कानपुर जैसे "दुर्दांत" शहर में एक बड़ी राहत वहां विभिन्न किस्म की देशज मिठाइयों ने प्रदान की..शुरुआत हुई लॉज के बगल वाली गली में एक छोटी सी दुकान से, जहां सुबह सात बजे देसी घी की जलेबी और खस्ता को भकोसने को चंदा इकट्ठा किया जाता..फिर तो मूलगंज की विभिन्न गलियों में हाथरस, डबल हाथरस, ट्रिपल हाथरस में आला दर्जे का मिष्ठान इस पापी पेट को हासिल हुआ..

दोपहर के भोजन की सर्वोत्तम व्यवस्था भारत रेस्तरां ने कर दी, जहां बुजुर्ग मालिक टंडन जी बेेरे को इशारों इशारों में ताक़ीद करते दिखते कि देखो यह पवित्र आत्मा अतृप्त न जाये हमारे यहां से..कई बार तो अपने केबिन में बैठा कर डोसा खिलवाते और रसमलाई चखवाते..

बाकी रहा डिनर का सवाल, तो श्रीवास्तव जी की रिपोर्टिंग वाली पार्षद बीट बहुत काम आयी..जिसके चलते आएदिन सुरापान के साथ सामिष भोजन के दीदार होते..कई रविवार तो दिन में ही टल्ली हुए..

अब आइये इस पोस्ट के सबसे सुर्खरू हिस्से यानी ताम्बुल सेवन पर..चंडीगढ़ के पान ने गर अपन के होठों को लाली प्रदान की, तो कानपुर के गुटखे ने जीवन को सरस और कनपुरिया समाज में उठने बैठने लायक बनाया..अपन ने सवा सौ प्रतिशत योगदान दिया वहां की सड़कों, गलियों, ऑफिस की दीवारों, रेलवे प्लेटफॉर्म, और ट्रेन के अंदर के रंगरोगन में...स्वतंत्र भारत की चीफसबी में न जाने कितने कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से पैर छुआए और चढ़ावे में न जाने कितने सैंकड़ा वाह गुटखा खाया..

एक बार तो कमाल हो गया..महोबा ब्यूरो वाला टोकरा भर पान ले आया..तब नवीन जोशी के साथ मिल बैठ कर डिसाइड किया गया कि पान की वो छाबड़ी किसी पान वाले को सौंप दी जाए और दस दिन तक 24 घंटे में पांच बार उसकी दुकान पर जा कर पान चबाया जाए..

कानपुर के वो तीन साल सतरंगी साबित हुए..बाबरी का ढहना अपनी आंखों से देखा..उसके बाद कानपुर में गोलीबारी और हफ्ते भर के कर्फ़्यू के बीच खंदक में बैठ अख़बारनवीसी करनी पड़ी..लातूर के भूकंप और वहां की महामारी का असर सन्नाटा मारती साबरमती एक्सप्रेस में झेला.. बम्बई के बम धमाके तक कानपुर में सुनाई दिए..

वो दो महीने पूरी तरह विभिन्न आपदाओं में गुजरे.. उसके बाद, संडे मेल दिल्ली से अपने पूर्वजों के शहर में स्वतंत्रभारत की नौकरी करने आये संजय द्विवेदी का साथ पूरा एक साल रहा.. संजय के चलते मेस्टन रोड का लॉज छूटा और फिर उसके साथ कंपनी बाग के सन्नाटे में तीसरी मंज़िल पर जगजीत सिंह, तलत महमूद और हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ के तरन्नुम में निशासंगीत का जम कर आनंद लिया गया..या फिर रात भर सुजुकी पे सवार हो कानपुर की सड़कें, बिठूर की गंगा, शुक्लागंज में पत्रकार मित्रों के घरों में हंगामा..

ऐसे ही एक रात्रिउत्सव में कानपुर की जानीमानी शख्सियत प्रमोद तिवारी टकरा गए..उसी रात दो बजे शुक्लागंज की एक दुकान से रम की बोतल खरीद किसी ढाबे में रंगारंग कार्यक्रम हुआ..और फिर इस हाल में पहुंच गए कि प्रमोद तिवारी को हम दो के लिए कोई आसरा तलाशना.. सुबह उनके उस मित्र के घर से जब निकले तो हम आंखें तक नहीं मिला पा रहे थे..

कानपुर से जुड़ने को एमएसटी धारक होना एक जोरदार अनुभव...यानी परिवार की चिक-चिक और दफ्तर के तनावपूर्ण माहौल से निकल राहत पाने का दैवीय वरदान...मीटर गेज से लेकर ब्रॉड गेज तक की इस एमएसटी के दो छोर हुआ करते थे..एक तरफ लखनऊ तो दूसरी तरफ कानपुर..लखनऊ में चित्रकूट एक्सप्रेस घरवाली से ज्यादा अपनी लगती थी, तो रात दो बजे कानपुर स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस हरजाई माशूका सी.. पता नहीं कहाँ-कहाँ मुंह मारती आती थी कमबख्त..चित्रकूट छूटती हमेशा शाम 4.20 पर ही थी.. जहां तक साबरमती का सवाल है, उसका टाइम ऑफिस से फोन कर पूछना पड़ता था, क्योंकि अगर राइट टाइम हुई तो स्टेशन पहुंचने तक छूट जाएगी और रात तीन बजे अगली ट्रेन होती थी वैशाली, जो एमएसटी वालों की सूरत तक देखना पसंद नहीं करती थी..सो, साबरमती को खड़ा रखने के लिये कहना पड़ता था कि ट्रेन में बम है..

चूँकि अपनी नौकरी सरकारी नहीं थी इसलिये हम खांटी एमएसटीधारक कभी नहीं कहलाये..मिलावटी इसलिये थे कि जिस तारीख को जाते थे उससे अगली तारीख को लौटते थे..इसलिये ताश खेलते, ब्रीफकेस को पीट कर गाना गाते, शेर ओ शायरी करते या अपने मोहक दिनों की गाथा सुनाते गुटों के बीच अपन मदारी के खेल में दर्शकनुमा थे..

कानपुर में साबरमती का हरजाईपन प्लेटफार्म से दोस्ती करने को मजबूर कर गया..इसलिये चाहे टीटी हो या कुली या चायवाला या पान मसाले वाला या फिर एच व्हीलर्स वाला, सब -हिंदोस्तां हमारा- जैसे थे.. खास कर किताब विक्रेता.. न जाने कितनी रातें उसे कम्बल उढ़ा नींद में गाफिल कर उसकी किताबें और मैगजीन बेचते और बांचते गुजारीं.. कई शीत ऋतुओं की काली रातों में लम्बी इंतजारी के बाद मिली ट्रेन में ऐसी कसी हुई नींद आती कि बचपन में क्या लोरी सुन कर आती होगी..इसके चलते कई बार जब किसी स्टेशन पर नींद खुली तो वो लखनऊ से दो-चार कदम आगे ही होता था..

आखिर एक सुबह गोमती एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहे एक सहयोगी के साथ हम भी लद लिए....उस बगैर टिकट की यात्रा ने दिल्ली में BITV की नौकरी दिलवा दी और कानपुर केवल एक स्टेशन बन कर रह गया..14 साल बाद 2009 में फिर लौटना हुआ..उस पर फिर कभी...

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