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दौरा उठो द्रौपदी का

Bhola Tiwari Feb 20, 2020, 7:45 AM IST कॉलमलिस्ट
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 प्रशान्त करण

  आज मुँह अंधेरे मेरी कॉल बेल बजी।खिड़की का पर्दा हटाकर देखा तो साफ होने लगा था।फरवरी की ठंढ में कम्बल में लिपटे मैंने घड़ी देखी।प्रातः के सवा पाँच बजे थे।सोचने लगा कि इतनी सुबह तो कोई नहीं आता।किसी अतिथि के आने की कोई पूर्व सूचना भी नहीं है।हालांकि दूर की अधिकतर ट्रेनें और बस प्रातः आती तो हैं।घर के लोग खर्राटे ले रहे थे।स्वागत कक्ष में जाकर बत्ती जलाई।मैंने आंखें मलते दरवाजा खोला।लगभग धक्के देते हुए रामलाल जी मेरे स्वागत कक्ष में घुसकर धम्म से बैठ गए।मैं हतप्रद रह गया।दरवाजा बन्द कर मैं भी अलग दूसरी कुर्सी पर बैठ गया।रामलाल जी सुबकने लगे।फिर कुर्ते की जेब से रुमाल निकालकर,ऐनक उतारकर उन्होंने आँसू पोछे।मैं उनके इस हमले के लिए तैयार नहीं था।स्वाभाविक प्रक्रिया में दुःखद अनहोनी की कल्पना कर पूछ बैठा-सब कुशल तो है?वे रुंधे गले से बोले-फिर से द्रौपदी उठ गई।कल रात तो उठकर खड़ी हो गयी।शस्त्र भी उठा लिए।शस्त्र चला भी दिया।जब कि चीरहरण की बात तो बहुत दूर,न चौपड़ खेला गया,न वह हारी गयी, न सभा तक में बुलाई ही गयी,न कोई सभासद थे,न धृतराष्ट्र,न गांधारी,न दुःशासन, न ही भीष्म पितामह थे,न कोई और, न गोविंद को पुकार लगाई गई,एकाएक द्रौपदी ने शस्त्र उठा कर जबरदस्त तरीके से शस्त्र को भांजना शुरू कर दिया।उसके मुखमंडल से,हाव-भाव से यह साफ झलक रहा था कि उसमेँ स्वयं रानी लक्ष्मीबाई की आत्मा इसे युद्धभूमि समझकर बिना अपने घोड़े के प्रवेश कर चुकी है।वहाँ दैविक संयोग से साक्षात गोविंद स्वयं पहले से विराजमान थे,स्वयं गोविंद भी हतप्रद थे।पर द्रौपदी रुकी नहीं।वार पर वार करती रही।जब थक गई तबतक मैं मरणावस्था के करीब पँहुच चुका था।किसी तरह छिप कर रोते- रोते, बिलखते रात काटी गई।फिर आपसे सलाह मांगने आया हूँ।मैंने कहा-रामलाल जी आप गलत जगह आ गए हैं।मेरा इस मामले में कोई अनुभव नहीं है।रामलाल जी हार नहीं माने।बोलने लगे-सलाह तो दे सकते हैं कि मुझे क्या करना चाहिए।मेरे पास न तो कोई गवाह है और न कोई साक्ष्य,इसलिए फौजदारी भी नहीं कर सकता।फिर मेरी बात मानेगा कौन?सब मुझे ही दोषी ठहराएंगे।फिर उल्टा मुझे फौजदारी झेलनी होगी।मामला पेंचीदा है।मैंने कहा-समझौता कर लो।वे बोले-इसी के प्रयास में वर्षों से द्रौपदी के शस्त्र से लहूलुहान होता रहा हूँ।सहता रहा।पर इससे उसे ही बल मिलता रहा।इसी सहनशीलता के कारण मेरी स्थिति तो पहले हिंदुस्तान जैसी थी।सीमा पार से हमले दर हमले होते।हम चुप रहते।द्रौपदी पहले सुई चुभाती थी।थोड़ा दर्द होता।सह लेता।उसका हौसला बढ़ता गया।सुई कब सुए में बदल गयी,पता ही नहीं चला।उस समय कुछ सयानों ने समझाया कि चमड़ी मोटी कर लो।रवि बाबू से यह साधना भी सीखी और चमड़ी मोटी कर ली।द्रौपदी ने सुए को तलवार बना डाला।अब वह शस्त्र उठाने के पहले गुनगुनाती भी है-उठो द्रौपदी शस्त्र उठा लो,अब गोविंद न आएंगे।मैं अब धुन पकड़ लेता हूँ और सतर्कता बरतने लगता हूँ।हर दस-पंद्रह दिनों में इसकी गुनगुनाहट सुनाई देने लगी।अब स्वर तेज राग में कानों में बजता है।कल रात तो सबसे तेज स्वर था।जितना तेज स्वर उतनी धार तलवार की।हमेशा की तरह कल भी कोई चौपड़ नहीं खेला जा रहा था।सच पूछिए तो हमने कभी चौपड़ तक नहीं खेला है।किसी तरह का कोई जुआ भी नहीं।पर समय समय पर अकारण ही द्रौपदी शस्त्र उठा ही लेती है।मेरी हालत उस इमरान खान की हो गयी जो बालाकोट के बाद उसकी हुई थी।इधर तो हालात उससे भी खराब हैं।पुलवामा तक कभी नहीं हुआ , पर लगातार बालाकोट पर बालाकोट।शुरू शुरू में जब यह शस्त्र उठाने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था तो मैं आंखें बन्द कर लेता था कि दिखाई न दे।कानों में रुई डालकर रहने लगा था।फिर देखकर भी अनदेखा करने लगा,सुनकर भी अनसुना।पर शस्त्र था कि उठता ही रहा।चलता रहा,निरंतर।रुकने का नाम तक न ले रहा है।शस्त्रचालन में तेजी और निशाना अचूक होता जा रहा है।कोई जगह नहीं बची है जो आहत न हुआ हो।अंग-प्रत्यंग तक आघातों से सूजे हुए हैं।उनसे खून रिस कर टपक रहे हैं।दर्द से रो भी नहीं सकते।नहीं तो फिर जुबान की शस्त्र से जोरदार हमला हो जाएगा।रामलाल जी अभी दुखड़ा सुना ही रहे थे कि मेरे अंतःपुर से कड़ी आवाज़ आयी-चाय अभी तक क्यों नहीं बनी?क्या हो रहा है?इसके पहले की बात आगे बढ़े,मैंने रामलाल जी को हाथ पकड़कर अपने स्वागत कक्ष से बल पूर्वक बाहर कर दिया और अन्दर से कुंडी लगा दी।

      बात खत्म हुई।अब मुझे चाय भी बनानी है।रामलाल जी की बात अब फिर कभी।

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