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फेसबुक, ट्विटर पर उभरता साहित्य;दशा और दिशा-परिचर्चा

Bhola Tiwari Feb 17, 2020, 8:38 PM IST कॉलमलिस्ट
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प्रशान्त करण
रांची : विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में काफी सरकारी खर्च पर एक परिचर्चा रखी गयी।विभागाध्यक्ष के साले युवा कवि उग्र जी मुख्य अतिथि थे।उग्र जी अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य उत्थान केंद्र,ग्राम दहिपारा के अध्यक्ष की हैसियत से आए थे।विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी के छोटे भाई कवि क्रांतिकारी जी विशिष्ट अतिथि थे।दोनों अतिथि एक-एक लाख देकर बुलाए गए थे।स्नातक और स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के कुल पाँच छात्रों में से दो आ पाए थे,इसलिए नाश्ते की बात पर विज्ञान और कला के ढेर सारे छात्र बुलवाकर बिठा दिए गए।
विभागाध्यक्ष डॉ0 निरक्षर जी ने विषय रखते हुए कहा-आज हम फेसबुक,ट्विटर पर उभरते हिंदी साहित्य की दशा और दिशा पर चर्चा करेंगे।
सबसे पहले विशिष्ट अतिथि से अनुरोध है कि वे अपनी बात रखें।क्रांतिकारी जी उठकर खड़े हुए।फिर खिड़की से बाहर गुटका थूक कर बोलने लगे-देखओ भैया,हमा के सभी कवि बोलत हौं।कवि बनने में ज्यादा मेहनत नहीं हओ भैया।फेसबुक, ट्विटर क जमाना हउए।ओकरा म कविता खोजो।फिर एक आध शब्द बदल लियो।फिन अपन नाम लिख के चिपकाये दियो।अब व्याकरण,छन्द का झमेला नहीं हओ।चार पांच शब्द लिखके लाइन बदल देओ।दिखने में कविता लगन लगेगा।फिन जब बीस पच्चीस हो जावे तब कउनो संस्था के पैसा ढेहुआ दे के मन माफिक सम्मान लेइ लियो।दुइ चार सम्मान का जुगड़वा होई जाए तब अपन नाम के आगे कवि लिखो।साहित्य के चिंता छोड़ो,अपन चिंता करो।बाकी हमारे भैया सब देख लेंगे।इतना कहकर क्रांतिकारी जी ने जेब से तम्बाकू की डिबिया निकाली।तम्बाकू रगड़ कर फांक लिए।फिर बोले-वैसे निराला जी के मुक्त छन्द के आविष्कार के बाद बड़ी आसानी होई गवा।अब साहित्य में कठिन शब्द कौन सीखे भैया।अंग्रेजी के शब्द भी, बोलचाल वाली भाषा भी सभै ठोंक डालो।हो गवल साहित्य सृजन।कहिए विभागाध्यक्ष महोदय,ठीके नु कहत हैं जी।विभागाध्यक्ष महोदय हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
फिर मुख्य अतिथि की बारी आई।उग्र जी चीखते हुए बोले-है कोई माई का लाल जो कह सके कि हम घटिया लिखते हैं?अरे हम जो कछु लिखत हैं ओके छपाए जात हैं।मतलब कछु निकले,न निकले।ई हम्मर जिम्मा थोड़े है।बाकी जिज्जा जी देख लेंगे।हम त गाम में गरु चराते थे।क्रांतिकारी जी हमको कवि आउर साहित्यकार बनना सीखा दिए।अब हमहूं कवि लिखते हैं अपना नाम के आगे।ढेर इज्जत है हमार।तीस पुरस्कार और बीस सम्मान मिल गवा है।बाकी साहित्य के चक्कर हम का जानें।फेसबुक और ट्विटर जिंदाबाद।कछु नहीं होता है तब कालेज के प्रोफेसर से जिज्जा जी हमर नांव से कछु लिखवाकर छपवा देते हैं।भैया हम एकदम साँच बोलत हैं।हमारा छल प्रपंच नाहीं।कोई यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़े लिखे वाला मिलता नहीं है।तब हम लोगों को ही न हिंदी को कंधा देना है।सो दे रहे हैं।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा समाप्त हुई।
दूसरे दिन अखबारों में छपा-परिचर्चा में उग्र जी ने बताया कि फेसबुक और ट्विटर से हिंदी साहित्य का उत्थान हो रहा है।नवोदितों की पीढियां तैयार हो रही हैं।साहित्य में गुणात्मक प्रगति पाई जा रही है।क्रांतिकारी जी ने फेसबुक और ट्विटर के जरिये साहित्य को व्यापक करने पर प्रकाश डाला।नई पीढ़ी को उत्साहित करते हुए उन्हें हिंदी साहित्य में योगदान के लिए प्रोत्साहित किया।विश्वविद्यालय की ओर से दोनों अतिथियों को हिंदी विभूषण से सम्मानित कर एक एक लाख रुपये के नगद पुरस्कार भी दिए गए।

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